शनिवार, 30 अक्तूबर 2010

कृष्‍ण कुमार चन्‍द्रा की कविता - वृक्षारोपण

Image056 (Mobile)

पेड़-पौधे तो,

हमने भी लगाये हैं।

फर्क केवल इतना कि,

हमने फोटो नहीं खिचवाये हैं।

 

क्‍या सबूत कि हमने,

धरा को हरा बनाया है?

ये और बात है कि,

हमारे लगाये पेड़,

फल रहे हैं, फूल रहे हैं।

 

गांव के बच्‍चे आज भी,

उन पर झूल रहे हैं।

कौन करेगा विश्वास हम पर ?

हमने पेपर में जो, नहीं छपवाये हैं।

 

नाम तो उनका चला,

जो पेड़ लगाते फोटो खिंचवाये हैं।

उनसे ही हरियाली है,

क्‍योंकि उन्‍होंने पेपर में भी छपवाये हैं।

 

ये और बात है कि,

उनके लगाये पेड़ कूड़ेदान में पड़े हैं।

हरियाली के नाम पर मैदानों में,

बड़े बड़े कारखाने और-

भव्‍य इमारत खड़े हैं।

 

हमने फोटो नहीं खिंचवाया,

कोई बात नहीं।

हमने पेपर में नहीं छपवाया,

कोई बात नहीं।

 

खुशी तो इस बात की है कि,

हमारे लगाये पेड़,

लहलहाते हुए आज भी खड़े हैं।

-----

कृष्‍ण कुमार चन्‍द्रा (शिक्षक)

मुकाम- बेलाकछार

पोष्‍ट- बालको नगर

जिला- कोरबा (छ.ग.)

मो.- 9926150892

इमेल- kckrishnchandra270@gmail.com

4 blogger-facebook:

  1. मान्यवर कृष्ण कुमार चंद्रा जी बहुत ही सही कहा है आपने| आज कल असल काम से ज़्यादा तवज्जो दी जा रही है काम करने वालों के मार्केटिंग को| पर काया करें दोस्त, समय ही ऐसा है|

    उत्तर देंहटाएं
  2. बेनामी11:09 pm

    kaafi acchi kavita hai. so thanks to write this poem.

    उत्तर देंहटाएं

रचनाओं पर आपकी बेबाक समीक्षा व अमूल्य टिप्पणियों के लिए आपका हार्दिक धन्यवाद.

स्पैम टिप्पणियों (वायरस डाउनलोडर युक्त कड़ियों वाले) की रोकथाम हेतु टिप्पणियों का मॉडरेशन लागू है. अतः आपकी टिप्पणियों को यहाँ प्रकट होने में कुछ समय लग सकता है.

------------------------------------------------------------

प्रकाशनार्थ रचनाएँ आमंत्रित हैं...

1 करोड़ से अधिक पृष्ठ-पठन, 1.5 लाख गूगल+ अनुसरणकर्ता, 1500 से अधिक सदस्य

/ 2,500 से अधिक नियमित ग्राहक तथा 2000 से अधिक फ़ेसबुक प्रसंशक
/ प्रतिमाह 10,00,000(दस लाख) से अधिक पाठक
/ 10,000 से अधिक हर विधा की साहित्यिक रचनाएँ प्रकाशित
/ आप भी अपनी रचनाओं को इंटरनेट के विशाल पाठक वर्ग का नया विस्तार दें, आज ही नाका से जुड़ें. नाका में प्रकाशनार्थ रचनाओं का स्वागत है.किसी भी फ़ॉन्ट, टैक्स्ट, वर्ड या पेजमेकर फ़ाइल में रचनाएँ rachanakar@gmail.com पर ईमेल करें. अधिक जानकारी के लिए यह लिंक देखें - http://www.rachanakar.org/2005/09/blog-post_28.html

विश्व की पहली, यूनिकोडित हिंदी की सर्वाधिक प्रसारित, समृद्ध व लोकप्रिय ई-पत्रिका - नाका

मनपसंद रचनाएँ खोजकर पढ़ें
गूगल प्ले स्टोर से रचनाकार ऐप्प https://play.google.com/store/apps/details?id=com.rachanakar.org इंस्टाल करें. image

--------