शनिवार, 30 अक्तूबर 2010

पुरुषोत्तम विश्‍वकर्मा के दो व्यंग्य

बस बाजीगरों की कमी रह गई

वैसे तो चाचा दिल्‍लगी दास ने आज भी अपने चेहरे पर खासी नकली मुस्‍कान पोत रखी थी मगर मैं अच्‍छी तरह से वाकिफ था कि हकीकत बयान करे तब पता चले कि आखिर माजरा क्‍या है? चाचा बिन किसी पूछ-कछ के खूद ही बताने लगे। बात कुछ यूं थी।

चाचा बोले भतीजे अब जाकर इतमीनान की सांस ले पाया हूं। पिछली शिकस्‍त से एक सबक सीखा था, उस वर अमल भी किया। नतीजतन अब पक्का यकीन हो गया है इस बार बाजी मार लूंगा। और ये कोई मुंगेरी लाल के हसीन सपने नहीं है बल्‍कि एक ठोस आधार पर सुनहरे भविष्‍य की तामीर की उम्‍मीद हैं अब तुम ही देख लो न, मेरे साथ पाक साफ दामन वाले लोग भी हे, और टेप की रोल में लिपटे लम्‍पट भी। रथों पर सवार होने वाले महारथी भी हैं तो साइकिल पर संघर्ष करते सवार भी।

चाचा ने फख्र से छाती फुलाकर आगे कहा-कुछ फिल्‍मी सितारे तो मेरे यहां पहले भी चमक रहे थे, कुछ को और पटा लिया। जो जो भी मिस वर्ड', ‘मिस इंडिया' मिली, पहुंचा पकड़ कर साथ ले आया। कोई क्रिकेटर दिखा पकड़ कर खींच लिया। वैसे हॉकी, फुटबाल, बेड मिन्‍टन, पोलो, टेनिस, बास्‍केट बाल, बॉलीबाल, हेमर थ्रो, डिश थ्रो, जेवलिंग, जिमनास्‍टिक, वेट लिफ्‍टर, तैराकी, रेस, स्‍केटिंग, बोक्‍सिंग, जूड़ो, कराते, कूंगफू, कैरम, शतरंज, आदि खेलों के खिलाड़ियों ने भी ऑफर भेजा था, मगर मैंने उन्‍हें घास तो क्‍या घास का तिनका भी नहीं डाला। वो ठीक भी रहा उन्‍हें कौन जानता हैं ? उन्‍हें मिलाता तो अपना प्रचार छोड़ कर उनकी पहचान करानी पड़ती। धावकों पर विश्‍वास करना खाण्‍डे की धार जैसा है। क्‍या पता कब उठ का दौड़ पड़े ? तैराकों का भी क्‍या भरोसा, डुबकी लगाई और अपने खेमे से बाहर निकल प्रतिपक्षी के डेरे में। ऐसे में केवल क्रिकेटर ही भरोसे मंद रहते है। वे जीत जाएं तो इज्‍जत पाते हैं, हार भी जाएं तो उनको कौन कहने वाला है।

अब देखना इनके मजे। बिना बुलाए ही दौड़े चले आ रहे है। भीड़ इतनी कि तिल धरने को भी जगह नहीं । इससे एक बड़ा फायदा तो ये होगा कि आम सभा व रैलियों में भीड़ जमा करने के लिए पार्टी को फ्री के वाहन भेजने का खर्चा नहीं उठाना पड़ेगा। बस अखबार में एक छोटा सा इश्‍तेहार शाया करवाना ही काफी रहेगा। जनता इनके ठुमकों पर ही लट्टू हो जाएगी। ऐसे में पार्टी को अपना एजेंडा भी बताने की जरुरत नहीं। डॉयलोग इनको जो लिख कर देंगे, उनको रट कर बोलने का इन्‍हें पहले से ही अच्‍छा अभ्‍यास है। जमा भीड़ सम्‍मोहित सी एकटक उन्‍हें देखती रह जाएगी और भूल जाएगी कि वो भूख, भ्रष्‍टाचार, भय, बेरोजगारी, अशिक्षा,आतंकवाद जैसी भी कोई समस्‍या से वो त्रस्‍त है।

चाचा ने जब थोड़ा सा ब्रेक दिया तो मुझे भी मौका मिल गया। मैंने कहा चाचा वैसे तो सब इंतजामात दुरुस्‍त है। बस थोड़ी सी कसर रह गई है चंद बाजीगरों की। अगर कुछ बाजीगर भी जुटा लेते तो बेहतर रहता। भारत अभी भी गांवों में रहता है और इसकी एप्रोच किए बगैर तुम्‍हारी पार्टी सिर्फ और सिर्फ शहरी लोगों तक ही प्रभावित कर पाएगी,सो कुछ बाजीगरों को और जमा कर लिया होता तो पूरे पांच साल आराम से गुजर जाते।

पुरुषोत्तम विश्‍वकर्मा

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ये भी मातम के मसीहा निकले

मेरे चाचा दिल्‍लगी दास की विचार तंत्री के तार इतने कसे हुए हैं कि उन पर एहसास की हर छोटी से छोटी चोट के पड़ते ही उनमें झनझनाहट पैदा हो जाती है और चाचा शुरु हो जाते है सोचना। सोचते-सोचते वो उस मुकाम पर पहुंच जाते हैं कि जहां से धरातल पर उतरने के लिए उन्‍हें मेरी समझ की सीढ़ी का इस्‍तेमाल करना पड़ता है। आज की ही बात लो, बोले कि भतीजे मुझे उनकी यह बात चुभ रही है कि उनको हमारी फरियाद सुनने के लिए उनका दरबार लगाना कचोट रहा है। शुक्र करो अभी तो सिर्फ फरियाद ही सुनी है हमारी, और उनकी यह हालत हो रही है, जब हमारे दुःख-दर्द दूर कर दिये जाएंगे तब तो शायद वो अपने कपड़े फाड़ते नजर आएंगे।

तुम्‍हें याद तो होगा कि जनाबे आला ने क्‍या कहा था ? कहा था, ”अस्मत के खिलाफ है यह गरीबों की फरियाद के लिए लगाया गया दरबार।“ ”इस जन सुनवाई में राजनीति है।समझे उन्‍होंने क्‍या कहा, ‘सुनवाई में राजनीति' और राजनीति में गरीब की सुनवाई का क्‍या काम। राजनीति तो उन्‍होंने भी की है मगर यूं दरबार लगा-लगाकर जन सुनवाई करके नहीं। अगर किसी को एतराज न हो तो प्रमाण देकर साबित कर सकते हैं। हां किसी चुनाव सभा में अपवाद स्‍वरुप औपचारिकता के नाते किसी को दुःख-दर्द पूछ लिया हो वो राजनीति में नहीं आता। हां गरीबों के दरबार में पांच-पांच बरस के अन्‍तराल से वोट मांगने जरुर जाते रहे है।

वो एक बात और कह रहे है कि हमारे सूबे की सिर्फ दो ही महीनों में बद से बदतर हालत हो गई हैं। कुछ ही दिनों पहले की तो बात है, पूरे सूबे में हर तरफ खुशहाली ही खुशहाली थी, ऊंची-ऊंची अट्‌टालिकाएं थीं, सुन्‍दर-सुन्‍दर फ्‍लाई-ओवर, चौड़ी साफ-सुथरी सड़कें, सड़कों पर दौड़ती लेटेस्‍ट मॉडल की इम्‍पोर्टेड कारें, रोजगार ज्‍यादा काम करने वाले हाथ कम मगर इनके विपक्ष में बैठते ही सब-कुछ उल्‍टा हो गया। एक तंदुरुस्‍त सूबा देखते ही देखते बीमारु हो गया। रिआया की भीड़ अपनी पीड़ा लिए दरबार में पंहुची, यह हुक्‍मराना जमात की नाकामयाबी नहीं तो क्‍या है, अब इतना तो तुम भी समझते होंगे कि इसके कब्‍ल रिआया पीड़ित नहीं थी या उसकी पीड़ा सुनने वाला कोई नहीं था अथवा उसे अपनी फरियाद लेकर दरबार में पंहुचने नहीं दिया जाता था।

सच पूछो भतीजे में उस दरबार में जाकर आया हूं। वाकई मानना पड़ेगा कि अबकी बार यहां कोई राज करने नहीं आया, प्रजा की सेवा करने आया है। अरे भाई किसी का दुःख-दर्द सुनना भी क्‍या कम बात है। अगर ऐसे ही दरबार गांव-गांव में लगाए जाएं तो मजा आ जाए। एक तो सरकार को पता लग जाएगा कि कौन-कौन दुःखी हैं, कितने-कितने दुःखी हैं, कब से और किसके कारण दुःखी हैं। मगर इसमें फरियाद करने वाला और फरियाद सुनने वाला आमने-सामने हो तो ही बात बनेगी। अगर कोई जरिया बना दिया गया तो दुःखी लोगों के दुःख में और वृद्धि हो जाएगी। और अगर दीन-दुःखियों का सही-सही अन्‍दाजा लगाना है तो छद्‌म वेश में घूमना पड़ेगा, जैसा पूर्व में कभी होता था।

पुरुषोत्तम विश्‍वकर्मा

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