रविवार, 17 अक्तूबर 2010

राजेश विद्रोही की ग़ज़लें

 

ग़ज़ल

ग़र खयालों में यूँ तुम जो आये ना होते।

खुश्‍क आँखों में अश्‍कों के साये ना होते॥

 

सात जन्‍मों तलक ना बिछुड़ते कभी।

ग़र वफ़ा से कदम डगमगाये ना होते॥

 

ग़र अपनों से इतने छले जो न जाते।

खुदा की कसम हर पराये ना होते॥

 

हासिल होती हमें भी ये अमराइयाँ।

ग़र सितम यूँ जमाने ने ढ़ाये ना होते॥

 

ये खिली धूप होती मयस्‍सर हमें।

ग़र क़फ़स क़हकशाँ ने सजाये ना होते॥

 

पूछता कौन शम्‍मा की खोजे दिली को ?

ग़र ये तरीक़ियां और साये ना होते॥

 

खुल ना पाता कभी दोस्‍ती का भरम।

दोस्‍तों को अग़र आज़माये ना होते॥

 

ग़र ये मालूम होता कि काम आयेंगे।

यूँ ही अश्‍कों को हमने बहाये ना होते॥

 

उठ के मुँह नोच लेते जमाने का हम।

क़ब्र पर जो ये पत्‍थर लगाये ना होते॥

 

किसलिये राज' मायूस होते भला।

ग़र कदम तेरे दर पे जो आये ना होते॥

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ग़ज़ल

ग़ो तवारीखी रहा है बाअमल मेरा शहर।

सिर्फ बस्‍ती ही रहा है आजमेल मेरा शहर॥

 

चिमनियों का स्‍याह धुंआं और डीजल का गुबार।

जाने क्‍या क्‍या पी रहा है आजकल मेरा शहर॥

 

ग़ो ज़रा सी बात पर तुफान आते थे यहाँ।

खामुशी में जी रहा है आजकल मेरा शहर॥

 

पिछले दंगों में फटकर हो चुका है तार-तार।

वो गिरेबां सी रहा है आजकल मेरा शहर॥

 

कै़फ़ियत खबरों की सारी खत्‍म हो जाने को है।

स्‍याह सुर्खी ही रहा है आजकल मेरा शहर॥

 

दूरियां दस्‍तूर बनती जा रही है हर तरफ।

ये हलाहल पी रहा है आजकल मेरा शहर॥

 

आग को नाबूद करने या बुझाने की बजाय।

डाल उसमें घी रहा है आजकल मेरा शहर॥

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ग़ज़ल

ग़ज़लों की हैं जान काफिये।

शाइर की पहचान काफिये॥

 

सबसे अलग नज़र आते हैं,

उम्‍दा , आलीशन काफिये।

 

अक्‍सर अमर बना देते हैं,

ग़ज़लों को आसान काफिये।

 

कई बार यूं भी होता हैं,

कर देते हलकान काफिये।

 

रचना अगर बहर में हो तो,

खुद बनते अर्कान काफिये।

 

मौलिक और अछूते हो तो,

पाते हैं सम्‍मान काफिये।

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 ग़ज़ल

दूर रहकर करीब होते हैं।

लोग कितने हबीब होते हैं॥

 

हाँ ये माना मैं मसीहा तो नहीं।

अपने-अपने सलीब होते हैं॥

 

रुख पे अन्‍दाज है रफ़ाक़त का।

कैसे कैसे ऱकीब होते है॥

 

साफग़ोई मिली विरासत में।

हमसे कम ही अदीब होते हैं॥

 

एक दिन तुम भी मान जाओगे।

हम से भी बदनसीब होते हैं॥

 

ज़िन्‍दगी बेवफ़ा नहीं लगती।

आप जब-जब क़रीब होते हैं॥

 

कौन किसका हुआ है राज' मगर।

चन्‍द रिश्‍ते अज़ीब होते हैं॥

 

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ग़ज़ल

हमने जीवन खास जिया है।

पूरा हर प्रश्‍वास जिया है॥

 

कोई माने या न माने।

पतझर में मधुमास जिया है॥

 

कविता ही क्‍या जीवन में भी।

पग पग पर अनुप्रास जिया है॥

 

शंकाओं के शीश महल में।

विस्‍थापित विश्‍वास जिया है॥

 

जीवन की आपाधापी में।

ग़म के संग उल्‍लास जिया है॥

 

युग युग में छलिया कान्‍हा ने।

हर गोपी संग रास जिया है॥

 

नहीं कहीं कुछ जीने लायक।

फिर भी, है शाबास! जिया है॥

 

लक्ष्‍मण और उर्मिला ने ही।

सचमुच का वनवास जिया है॥

 

अपनी तो ये राम कहानी।

सुधियों का संत्रास जिया है॥

 

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ग़ज़ल

जो तर्के-तआल्‍लुक की हद जानते हैं।

वो ही टूटने का दरद जानते हैं॥

 

जो ईंटों से ऊंचाइयां आंकते हैं।

वो हर्ग़िज किसी का ना कद जानते हैं॥

 

कोई सांस उन पर उधारी नहीं है।

जो देना व लेना नकद जानते हैं॥

 

वो हरदम चलेंगे किनारे किनारे।

जो दरअसल तूफां की ज़द जानते हैं॥

 

मुहब्‍बत मुहब्‍बत मुहब्‍बत मुहब्‍बत।

हुनर बस यही अदद जानते हैं॥

 

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2 blogger-facebook:

  1. सभी ग़ज़लें एक से बढ़कर एक हैं।
    यह शे‘र सबसे जयादा पसंद आया-

    उठ के मुंह नोच लेते जमाने का हम,
    कब्र पर जो ये पत्थर लगाए न होते।

    उत्तर देंहटाएं
  2. बहुत सुन्दर लिखा है आपने ............मनमोहक

    उत्तर देंहटाएं

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