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मंजरी शुक्ल की कविता – गए थे परदेस में रोटी कमाने…

manjari shukla (Custom)

गए थे परदेस में रोजी रोटी कमाने
चेहरे वहां  हजारों थे पर सभी अनजाने

 
दिन बीतते रहे महीने बनकर
अपने शहर से ही हुए बेगाने

 
गोल रोटी ने कुछ ऐसा चक्कर चलाया
कभी रहे घर तो कभी पहुंचे  थाने

 
बुरा  करने से पहले हाथ थे काँपते
पेट  की अगन को भला दिल क्या जाने

 
मासूम आँखें तकती रही रास्ता खिड़की  से
क्यों  बिछुड़ा बाप वो नादाँ क्या जाने

 
दूसरों के दुःख में  दुखी होते कुछ लोग
हर किसी को गम सुनाने  वाला क्या  जाने

 

डॉ. मंजरी शुक्ल   
श्री समीर शुक्ल       
सेल्स  ऑफिसर (एल.पी.जी.)
इंडियन ऑइल कॉरपोरेशन
गोरखपुर  ट्रेडिंग कंपनी
गोलघर
गोरखपुर (उ.प्र.)
पिन - २७३००१

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दूसरों के दुःख में दुखी होते कुछ लोग
हर किसी को गम सुनाने वाला क्या जाने
Wah! Bahut sundar!

प्रशंसनीय पोस्ट .

कृपया ग्राम चौपाल में पढ़े - " भविष्यवक्ता ऑक्टोपस यानी पॉल बाबा का निधन "

Bahut sunder Manjari ji..... har pankti man ko chhoo gayi

हमेशा की तरह बेहतरीन आपका फ़ोन न. क्या है

पेट की अगन को भला दिल क्या जाने,
सुन्दर पंक्ति, अच्छी ग़ज़ल्। बधाई।

behatarin post, badhai aapko manjari ji


your frd

Rajendra Rathore
bureau chief patrika
janjgir-champa

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