मंगलवार, 26 अक्तूबर 2010

राजेश विद्रोही की ग़ज़लें

ग़ज़ल

कुछ के ख़ातिर मददगार है जिन्‍दगी।

पर अमूमन तो दुश्‍वार है जिन्‍दगी॥

 

मौत को यूं ही मुज़रिम समझते रहे।

जबकि असली ख़तावार है ज़िन्‍दगी॥

 

चार दिन की नियामत बड़ी चीज है।

यूं समझ लो तो फिर पार है ज़िन्‍दगी॥

 

भक्त भी है स्‍वयं और भगवान भी।

एक अद्‌भुत सा अवतार है ज़िन्‍दगी॥

 

वो पहेली जिसे कोई समझा नहीं।

धार भी है तो पतवार है ज़िन्‍दगी॥

 

आख़िरी सांस तक जो ना समझा गया।

वो कसैला सा किरदार है ज़िन्‍दगी॥

 

कब कहां टूट जाये नहीं कुछ पता।

इक अधूरा सा इकरार है ज़िन्‍दगी॥

 

ताकते है भटकते जहाजी जिसे।

वो मुनव्‍वर सी मीनार है ज़िन्‍दगी॥

 

ग़ज़ल

क्‍या बतायें तुम्‍हें हम किधर जाएँगे।

दिल कहेगा जिधर बस उधर जाएँगे॥

 

एक आवारा शाइर की हस्‍ती भी क्‍या।

कौन है जिससे अब रुठकर जाएँगे॥ 

 

एक मुद्दत से जिसको संभाला किये।

वो अमानत तुम्‍हें सौंपकर जाएँगे॥

 

ज़िद के पक्के मग़र कच्‍चे मनुहार के।

तुम कहोगे तो कैसे मुकर जाएँगे॥

 

धूप तो रोक पाये ये मुमकिन नहीं।

छांव जो मिल गई तो ठहर जाएँगे॥

 

कांच के मर्तबानों की क़िस्‍मत भी क्‍या।

टूट जाएँगे और फिर बिख़र जाएँगे॥

 

ग़ज़ल

क़ायदे ज्‍यों ज्‍यों कड़े होते गये।

नित नये फ़ितने खड़े होते गये।

 

दिन ब दिन कुनबा बिखरता ही गया।

अनगिनत इसमें धड़े होते गये॥

 

ज़ब से आजादी मिली अहले वतन।

आदतन चिकने घड़े होते गये॥

 

धज्‍जियाँ उड़ने लगी कानून की।

क़ायदों के चीथड़े होते गये॥

 

हम जहाँ पर थे वहीं पर रह गये।

सिर्फ बच्‍चे ही बड़े होते गये॥

 

ग़ज़ल

कैसी जादूगरी हो गई।

ख़िदमतें अज़गरी हो गई॥

 

फिर सदाकत को फाँसी लगी।

झूठ फिर से बरी हो गई॥

 

मुफ़लिसी को मिटा देंगे हम।

आम ये मसख़री हो गई॥

 

था दुपट्टा तवायफ़ का जो।

पॉलीटिक चुनरी हो गई॥

 

साफग़ोई सभी के लिए।

आँख की किरकिरी हो गई॥

 

जब भी सूखा पड़ा मुल्‍क में।

उनकी तबीयत हरी हो गई॥

 

हादसों की हवालात में।

ज़िन्‍दगी अधमरी हो गई॥

 

ग़ज़ल

जब जब मौसम में तब़्‍दीली होती है।

सुबह सुरीली शाम नशीली होती है॥

 

जिन राहों से मंजिल का याराना है।

वो राहें अक्‍सर रेतीली होती हैं॥

 

तब तब मेरी दांयी आँख फड़कती है।

माँ की आँखें जब-जब गीली होती है॥

 

तंज निगारों की बस्‍ती में बड़े मियां।

जाने क्‍यों हर बात नुकीली होती है॥

 

मुखिया के बेटे के मर्जीदानों में ।

अक्‍सर कोई छैल छबीली होती है॥

 

फल फूलों से जो रहती है लदी फदी।

केवल वो ही शाख लचीली होती है॥

 

विष के दांत उखाड़ो लेकिन याद रहे।

सांपों की सांसे ज़हरीली होती है॥

 

चाहे जितना रोको आ ही जाती है।

कुछ यादें भी अजब हठीली होती है॥

 

ग़ज़ल

झुके सर खुद ब खुद वो सज़्‍दागाहें और होती हैं।

जो सीधे दिल से निकले वो दुआएँ और होती हैं॥

 

जहाँ में यूँ तो कहने को हजारों रहगुजारें हैं।

सरे मंजिल जो जाती हैं वो राहें और होती हैं॥

 

ज़िगर को पार कर जाता है हर तीरे-नज़र लेकिन।

उतर जाये जो ज़ेहन में निगाहें और होती हैं॥

 

कदम तेरा ना हिल जाये किसी की बद्दुओं से।

हिला दे अर्श का दामन वो आहें और होती हैं॥

 

लबो-रुख़सार के तेवर तो बदले हैं हवाओं ने।

बदल दे वक्त का रुख वो हवायें और होती हैं॥

 

अभी तक तुमने कुचली हैं फ़कत कमजोर आवाजें।

क़यामत तक जो गूंजे वो सदायें और होती हैं॥

 

कभी इस ऱाख के मलबे से तुम खिलवाड़ मत करना।

छिपा रखती हैं शोले वो रिदायें और होती हैं॥

 

गुजारी है उमर हमने हसीं जुल्‍फों के साये में।

भुला दे रंजो-ग़म सारे वो बाँहें और होती हैं॥

 

ग़ज़ल

जहां पेड़ पर चार दाने लगेंगे।

परिन्‍दे वहीं चहचहाने लगेंगे॥

 

जिन्‍हें याद करते गई उम्र सारी।

उन्‍हें भूलने में ज़माने लगेंगे॥

 

मेरी बेबसी पूछकर क्‍या करोगे।

तुम्‍हें तो वो सारे बहाने लगेंगे॥

 

भले आज तुमको ना रास आये लेकिन।

ये मंजर किसी दिन सुहाने लगेंगे॥

 

ग़ज़ल

हम सलामत रहें ग़म सलामत रहें।

बेख़ुदी का ये आलम सलामत रहे॥

 

हम उलझते रहें इसका कुछ गम नहीं।

तेरी जुल्‍फों के ये ख़म सलामत रहे॥

 

बर तरफ सारी दुनियां के रंजो-अलम।

बस दुआ है कि दमखम सलामत रहे॥

 

साजो-आवाज़ को सिन दराज़ी मिले।

ये सिसकता सा सरगम सलामत रहे॥

 

होश आने की हसरत मुबारक तुम्‍हें।

मैकशी का ये मौसम सलामत रहे॥

 

ग़ज़ल

कैसी अज़ब मशीन कैमरे।

सिर्फ तमाशबीन कैमरे॥

 

बटन होल में छिप जाते हैं।

इतने हुए महीन कैमरे॥

 

वक्त, वार, तारीख़-महीने।

रखते याद ज़हीन कैमरे॥

 

शुरु शुरु में श्‍वेत श्‍याम थे।

मग़र आज रंगीन कैमरे॥

 

जो देखेंगे वही कहेंगे।

हैं पूर्वग्रह हीन कैमरे॥

 

इधर उधर ना कभी ताकते।

अपनी धुन में लीन कैमरे॥

 

सब कुछ देख लिया फिर भी चुप।

हैं कितने शालीन कैमरे॥

 

उनकी नज़र बचाकर रक्‍खो।

ज़ालिम लेते छीन कैमरे॥

 

ग़ज़ल

सब कुछ रखती याद डायरी।

सुधियों का संवाद डायरी॥

 

लिखो मिटाओ फिर से लिक्‍खो।

खुद अपनी नक़्‍क़ाद डायरी॥

 

नहीं किसी की दाब धौंस में।

है असली आज़ाद डायरी॥

 

कभी किसी को माफ ना करती।

जबरदस्‍त ज़ल्‍लाद डायरी॥

 

गलत हाथ में पड़ जाये तो।

कर देती बरबाद डायरी॥

 

जब चाहो तब इसे टटोलो।

पूरी करे मुराद डायरी॥

-----------------

1 blogger-facebook:

  1. जिंदगी का यह कड़वा सच, इस ग़ज़ल को 'अलग हट के' वाली ग़ज़लों में शुमार करने में सक्षम है - राजेश जी| आप जैसे स्थापित फनकार से हमें ऐसी ही विश्लिष्ट रचनाओं की अपेक्षा रहती है| आपका स्नेह बनाए रखिएगा|

    उत्तर देंहटाएं

रचनाओं पर आपकी बेबाक समीक्षा व अमूल्य टिप्पणियों के लिए आपका हार्दिक धन्यवाद.

स्पैम टिप्पणियों (वायरस डाउनलोडर युक्त कड़ियों वाले) की रोकथाम हेतु टिप्पणियों का मॉडरेशन लागू है. अतः आपकी टिप्पणियों को यहाँ प्रकट होने में कुछ समय लग सकता है.

----

1.5 लाख गूगल+ अनुसरणकर्ता, 1500 से अधिक सदस्य

/ 2,500 से अधिक नियमित ग्राहक
/ प्रतिमाह 10,00,000(दस लाख) से अधिक पाठक
/ 10,000 से अधिक हर विधा की साहित्यिक रचनाएँ प्रकाशित
/ आप भी अपनी रचनाओं को विशाल पाठक वर्ग का नया विस्तार दें, आज ही नाका से जुड़ें. नाका में प्रकाशनार्थ रचनाओं का स्वागत है.अपनी रचनाएँ rachanakar@gmail.com पर ईमेल करें. अधिक जानकारी के लिए यह लिंक देखें - http://www.rachanakar.org/2005/09/blog-post_28.html

विश्व की पहली, यूनिकोडित हिंदी की सर्वाधिक प्रसारित, समृद्ध व लोकप्रिय ई-पत्रिका - नाका

मनपसंद रचनाएँ खोजकर पढ़ें
गूगल प्ले स्टोर से रचनाकार ऐप्प https://play.google.com/store/apps/details?id=com.rachanakar.org इंस्टाल करें. image

--------