उदयकरण ‘सुमन’ की ग़ज़ल

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वो कितने बेचारे होंगे

जीती बाजी हारे होंगे

 

खुद के सगा सहोदर ने भी

ताने पत्थर के मारे होंगे

 

माँ जाए भी ऐसे निर्मम

कमर तोड़ हत्यारे होंगे

 

नींद न होगी आँखों में जब

सपनों के बटवारे होंगे

 

भान नहीं था, डूबेंगे जब

बिल्कुल पास किनारे होंगे

 

सच को फिर सच कौन कहेगा

कलमगार जब हारे होंगे

 

रात जगेगी दिन सोचेगा

सुख के जब ‘सन्थाने’ होंगे

 

जो शिखरों में टूटे होंगे

पत्थर वो कुछ मारे होंगे

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सुमन सेवा सदन, पो. रामसिंह नगर, जिला श्रीगंगानगर

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(दिव्यालोक – अंक 14, वर्ष 2010 से साभार)

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2 टिप्पणियाँ "उदयकरण ‘सुमन’ की ग़ज़ल"

  1. बहुत अच्छी रचना मुबारकबाद।

    उत्तर देंहटाएं
  2. सच को फिर सच कौन कहेगा
    कलमगार जब हारे होंगे...
    kya baat hai..bahut gazab..badhaaee...

    उत्तर देंहटाएं

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