शनिवार, 16 अक्तूबर 2010

रामनारायण उपाध्याय का व्यंग्य - ऊँट और स्त्री का भरोसा नहीं किस करवट बैठे

stree by ravikumar (Custom)

हते हैं ऊँट और स्त्री की चाल का पता नहीं वे किस करवट बैठें. वैसे, मृग, मछली, चावल और नारी की पहचान कोई खेल नहीं है.

एक बार किसी ने भगवान से पूछा, “इतनी सुन्दर धरती की रचना करने के बाद आपको सबसे अधिक आनन्द और सबसे अधिक परेशानी कब हुई?”

वे बोले – “मैंने जब धरती की सर्वश्रेष्ठ कृति आदमी की रचना की तो मुझे अधिक आनन्द मिला. लेकिन मैंने जब से अपनी सबसे सुन्दर कृति नारी की रचना कर उसे आदमी को सौंपा है, तब से न तो आदमी सो सका है और न मैं.”

कहते हैं, एक माँ को अपने बच्चे को आदमी बनाने में पच्चीस वर्ष लगते हैं जबकि विवाह के बाद उसकी पत्नी उसे पाँच मिनट में बेवकूफ बना देती है.

कुछ लोग मण्डप में लड़की को रोते देखकर दुःखी होते हैं लेकिन उसका कहना है कि “मैं रो धोकर चुप हो जाऊँगी, लेकिन मुझे तो उस पति की चिन्ता है जिसे जिन्दगी भर रोना पड़ेगा.”

यह सच है कि विवाह के बाद पति-पत्नी में किचकिच मची रहती है. लेकिन यदि कोई बीच में आए तो परस्पर आमने-सामने जुड़े कैंची के दो सिरों की तरह वे उसे ‘कच्च’ से काट देते हैं.

वैसे विवाह से पूर्व स्त्री अपने सिर पर छाया के बतौर विवाह रूपी छत को स्वीकार करती है, लेकिन बाद में बढ़ती हुई सन्तान के इतने खम्भे खड़े हो जाते हैं कि उसे सिर छिपाने को जगह ही नहीं मिलती.

एक युवती ने विवाह करना इसलिए स्वीकार नहीं किया कि उसका कहना था कि ‘मिस’ याने सिर्फ एक गलती याने शादी नहीं की / जबकि ‘मिसेज’ का अर्थ है अनेक गलतियाँ.

उधर एक दार्शनिक का कहना है कि ‘मैंने शादी इसलिए नहीं की कि एक बार ट्रेन से यात्रा करते समय मेरे पाँव से एक युवती का पाँव कुचल गया था. इस पर उसने बेतहाशा गालियाँ दीं, लेकिन जब घूमकर देखा तो बोली, “माफ कीजियेगा, मैं समझी मेरे पतिदेव थे”.’

तुलसी जैसे कवि के द्वारा विवाह को गा-बजाकर काठ में पाँव देने की कठोर उपमा देने के बावजूद भी जाने क्यों आदमी उस विवाह रूपी किले में जाना चाहता है जिसमें जो बाहर है उनका मन अन्दर जाने को ललकता है और जो अन्दर है वे बाहर आने को छटपटाते हैं.

स्त्री अच्छा पति पाने के लिए इसलिए चावल चढ़ाती है क्योंकि वह जानती है कि स्त्रियाँ तो सब अच्छी होती हैं. चावल चढ़ाकर पुरुषों में से ही अच्छा पति छांटना पड़ता है.

स्त्री शृंगार में इसलिए ज्यादा समय लगाती है क्योंकि वह जानती है कि पुरूष गुण से ज्यादा रूप पर रीझता है और अक्ल से ज्यादा आँख का प्रयोग करता है.

जाने क्यों आदमी घर चलाने का दावा करता है, जबकि स्त्री का कहना है, मैं तो पति को चलाती हूं, घर किधर लगा?

एक राजस्थानी कहावत में कहा गया है कि ‘आदमी तभी तक टेढ़ी पगड़ी लगाता है जब तक घर में स्त्री नहीं आती. स्त्री के आते ही टेढ़े आदमी और टेढ़ी पगड़ी दोनों सीधे हो जाते हैं.’

एक बँगला कहावत में तो यहाँ तक कहा गया है कि ‘अपने से हारे हुए और स्त्री से मारे हुए का कहीं इलाज नहीं है.’

किताबों में जिसे ‘अबला’ कहा गया, उसी ने समय आने पर ‘मही’ को हिलाते हुए अपना ‘महिला’ नाम सार्थक किया है.

लिखते समय भी ‘पति’ में छोटी ‘इ’ की मात्रा लगती है और ‘पत्नी’ में बड़ी ‘ई’ की.

जिसे पुरूष ने ‘वामांगी’ कहा उसी ने ‘लेफ़्टिस्ट’ बनकर पुरूष को अपने राइट में लेकर उसे ‘दक्षिणपन्थी’ बना दिया.

अन्त में एक बात से सदा सावधान रहिएगा. कभी भी स्त्री की निगाह में शरीफ बनने का प्रयास मत कीजिए, क्योंकि उसका कहना है कि “शरीफ वह है जिसे देखकर मोहल्ले वालों को यह पता नहीं चले कि यह पति है या नौकर.”

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व्यंग्य संकलन – मुस्कराती फ़ाइलें से साभार.

व्यंग्यकार – रामनारायण उपाध्याय

प्रकाशक – प्रतिभा प्रतिष्ठान, सुभाष मार्ग नई दिल्ली -2

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(चित्र – रविकुमार, रावतभाटा की कलाकृति)

3 blogger-facebook:

  1. लेख तो आपका बहुत सुंदर है पर शीर्षक (!)...काहे आफ़त को बुलावा देते हैं भाई आप.

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  2. kya khoob likha hai--satya vachan .kahi ye aap ka experience to naho bol raha hai--sunder rachna badahai

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  3. विजयादशमी की बहुत बहुत बधाई !!

    उत्तर देंहटाएं

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