बुधवार, 20 अक्तूबर 2010

दीप्ति परमार की उपन्यास समीक्षा : छिन्नमस्ता - नारी मुक्ति की संघर्ष गाथा

deepti b parmar

( प्रभा खेतान के उपन्यास पर केन्द्रित )
विशिष्ट प्रतिभा की धनी प्रभा खेतान (1 नवम्बर 1942 से 19 सितम्बर 2008 )
ने दर्शन शास्त्र् से एम. ए. कर ज्याँ पोल सार्त्र् के अस्तित्ववाद पर पीएच. डी. की।
'अपरिचित उजाले','कृष्णधर्मा मैं' सहित छह कविता संग्रह,'आओ पेपे घर चलें'
और 'छिन्नमस्ता' सहित सात उपन्यास, दो उपन्यासिकाएँ, 'शब्दों का मसीहा सार्त्र्'
और 'बाजार के बीच : बाजार के खिलाफ' सहित पाँच चिंतनपरक पुस्तकें, तीन
संपादक पुस्तकें, एक आत्मकथा तथा अनेक दक्षिण अफ्रीकी कविताओं के हिन्दी
अनुवाद के लिए ख्याति प्राप्त और राहुल सांकृत्यायन तथा बिहारी पुरस्कार जैसे
विशिष्ट पुरस्कारों से सम्मानित प्रभा खेतान का हिन्दी समकालीन लेखन में
चिरस्मरणीय योगदान हैं।

'छिन्नमस्ता' प्रभा खेतान का मारवाड़ी समाज की नारी जीवन से सम्बन्धित वो
संघर्ष और मुक्ति की गाथा है जो अब तक साहित्य में अप्रस्तुत थी। उपन्यास की
नायिका प्रिया लड़की होने के कारण बचपन से ही अवहेलना एवं घरेलू बलात्कार का
भोग बनी हुई है। विवाह के बाद उसे मारवाड़ी समाज में होनेवाले बहुविवाह की
कुप्रथा के कारण दुसरी औरत का स्थान प्राप्त होता है। पति का कठोर शाशन,
संपत्ति समझकर अनवरत होनेवाले बलात्कारों का सिलसिला आदि स्थितियां उसे
अनेक यातनाओं से भर देती है। अनेक यातनाओं को छिन्नमस्ता देवी की तरह
अपने उपर झेलकर प्रिया उन्हीं यातनाओं के सामने अपना संहारक, विद्रोही एवं
आत्मनिर्भर रूप दिखाकर दयनीय स्थिति से मुक्ति पाती है। पौराणिक गाथाओं के
अनुसार छिन्नमस्ता दस महाविद्याओं में पांचवी देवी है। यह अपना ही कटा हुआ
सिर अपने बायें हाथ में लिये हुए है। मुंह खुला और जीभ निकली हुई है। अपने
ही गले से निकली रक्तधार को वह चाटती है। इनके हाथ में खड़ग, गले में मुण्डों
की माला रहती है। छिन्नमस्ता निर्वस्त्र् रहती है। इसका यह रूप भयंकर अवश्य है
किन्तु शक्ति का प्रतिरूप है। छिन्नमस्ता वह शक्ति है जो संसार बनाती भी है और
उसका नाश भी करती है। जो महामाया षोडशी, भुवनेश्वरी बनकर संसार का पालन
करती हुई अन्तकाल में छिन्नमस्ता बनकर सर्वनाश कर डालती है। महाप्रलय की
प्रक्रिया में छिन्नमस्ता की महत्वपूर्ण भूमिका रहती है।

प्रिया को छिन्नमस्ता का प्रतीक बनाकर प्रभाजी ने उपन्यास में नारी जीवन की यातना,
संघर्ष, विद्रोह एवं मुक्ति को अधिक सशक्तता से प्रस्तुत किया है।
'छिन्नमस्ता' कलकत्ता में रहनेवाले उच्चवर्गीय मारवाड़ी परिवार की कथा है, जहाँ घर
में काम करने के लिए ढेरों नौकर है, परिवार की आन, बान और शान देखते ही
बनती है। किन्तु 'छिन्नमस्ता' की किसी भी औरत के जीवन को जरा सा खुरेचो, तो
उसमें दर्द, पीड़ा और आँसुओं का दरिया मिलेगा। यद्यपि उसकी अलमारी में हजारों
साड़ी, ब्लाउज, ढेर सारा मेकअप का सामान और हीरों के कीमती आभूषण मिलेंगे
किन्तु शारीरिक एवं मानसिक अत्याचारों से भीतर से टूट चुकी है। इस परिवार में
लड़की के जन्म को अशुभ, बोझ और हुंडी माना जाता है। प्रिया इस परिवार की
स्त्री कस्तुरी की अनचाही चौथी बेटी है। अतः माँ ने न उसे कभी गोद लिया, न पास
सुलाया, न बीमार होने पर कभी डॉक्टर को बुलाया। वह सदैव एक शाश्वत दूरी
बनाएं रखती है। चौथी लड़की का होना प्रिया की माँ कस्तुरी के लिए भाररूप है।
अतः प्रिया दाई माँ की बेटी के रूप में पहचानी जाती है कस्तुरी की बेटी के रूप में
नहीं। प्रिया को पढ़ा लिखाकर स्वयं की पहचान बनाने के लिए नहीं किन्तु सिर्फ
विवाह के लिए बड़ा किया जाता है। सिर्फ विवाह ही उनका भविष्य है। साथ ही उसे
'काली लड़की' से पहचाना जाता है। पढ़ने लिखने की उसकी इच्छा का कोई मूल्य
नहीं, विवाह के बाजार में उसकी बौद्धिक क्षमता नहीं उसकी चमड़ी का रंग
महत्त्वपूर्ण भूमिका अदा करेगा। इसी वैचारिक परिवेश में प्रिया की परवरिश होती है।

प्रिया को जन्म से ही विद्रोहिणी बनाने के मूल में पारिवारिक वैचारिकता के साथ साथ
अनेक यातनाओं की भी लंबी सूची है। उसका शैशव अनवरत बलात्कारों की कड़ी
है। सौतेले भाई द्वारा बार बार किये गये बलात्कारों ने दस वर्षीय प्रिया के अन्दर
भय एवं घृणा भर दी है। जैसे जैसे प्रिया बड़ी होती गयी उसका मन विद्रोह के उफान
से भरता जाता है।

प्रिया को छिन्नमस्ता बनाने में मारवाड़ी परिवार में चल रही बहुविवाह की कुरीति एवं
उसको मिलने वाला दूसरी औरत का दर्जा भी महत्त्वपूर्ण है। बहुविवाह प्रथा के
चलते प्रिया करोड़पति घराने के नरेन्द्र की दूसरी औरत बन जाती है। दूसरी औरत
का दर्जा देनेवाला नरेन्द्र एक हैल्दी एनिमल से ज्यादा कुछ नहीं है। उसका मशीनी
यौनावेग प्रिया की संवेदनाओं को मार डालता है अतः प्रिया पति द्वारा बनाये गये
हरबार के सम्बन्ध को बलात्कार की तरह झेलती है। अनवरत बलात्कारों का
सिलसिला और पति का कठोर शासन प्रिया को विद्रोहिणी बनाने में अपना प्रगाढ़
योगदान देता है। प्रभा खेतान ने उच्चवर्गीय, सामन्ती परिवारों में पुरुष की
अधिकार भावना, पुरुषीय वासना, पुरुषसत्ता की निरंकुशता, संपत्ति पर एकाधिकार
की भावना, स्त्री के प्रति तिरस्कृत एवं तुच्छ दृष्टिकोण आदि का वर्णन करते हुए
उनकी बखिया उधेड़ कर रख दी है- जहाँ स्त्री के पास पैसे हैं, जेवरात है, महेंगी
पार्टियां हैं, जिसमें पैसे खर्च किये जा सकते हैं। यदि व्यवसाय के लिए उन जेवरों
को बेचना चाहे तो संयुक्त परिवार की संपत्ति होने के कारण कोई संभावना नहीं।
व्यक्ति के निज कोने पर कोई अधिकार नहीं, उसकी अभिरुचियों का कोई सम्मान
नहीं, वह कपड़ों पर खर्च कर सकती है, किताबों पर नहीं। चूंकि कमाती नहीं
इसलिए गरीब नौकर की मौके पर मदद का हक उसे नहीं। अपने सिद्धांतों के
क्रियान्वयन, मानवीयता की भावना के तहत यदि कुछ करना चाहें तो स्त्री को कमाना
होगा अथवा गुलाम की तरह पति की दया पर जीवित रहना होगा। 1

पति के धनाढ्य परिवार में पति के नाम से जानना प्रिया को स्वीकार्य नहीं, किन्तु
'व्यक्ति के तौर पर बड़ा होना और हर एक का अपनी प्रतिभा का भरपूर दोहन
करने का तर्क परंपरागत परिवारों में समझा या समझाया नहीं जा सकता। बौद्धिक
क्षमता का उपयोग होना चाहिए अथवा 'काम' स्त्री के लिए जीवन शक्ति हो सकता
है।' 2 'यह न प्रिया के पिता का परिवार समझता है न पति का।' 3 नरेन्द्र तो यह
भी स्वीकार करने के लिए तैयार नहीं कि स्त्री होने के कारण प्रिया का अपना भी
कोई वजूद हो सकता है, उसकी अपनी भी कुछ इच्छाएँ और वैचारिकता भी हो
सकती है, वह भी अपनी प्रतिभा से कुछ कर सकती है। वह मारवाड़ी बिजनेसमेन
है जो अमरीका जाकर शोपिंग करता है किन्तु पत्नी के ओफिस आने पर कहता है
'श्रृंगार पटार करो और रंडियों सी जा कर ओफिस में बैठो।' 4

नरेन्द्र प्रिया को व्यवसायिक क्षेत्र में प्रवेश देने के लिए बिलकुल तैयार नहीं है, किन्तु
अनायास जब प्रिया को नरेन्द्र के व्यवसाय में 'डमी पार्टनर' बनने का मौका मिल
जाता है, तब वह अनेक विराधी परिस्थितियों में भी अपना व्यवसाय, नाम और पैसा
बनाने के लिए पूरे सामर्थ्य से लग जाती है। नीना के यह कहने पर कि 'माँ हम
लोगों को रुपयों की तो जरूरत नहीं' प्रिया का उत्तर है 'मुझे तो है बेटा' 5 प्रिया
अपनी प्रतिभा से अपनी अलग पहचान बनाती है। प्रिया की यह विशेषता स्त्री को
सिर्फ घर गृहस्थी के लायक समझने वाले नरेन्द्र के लिए चुनौती बन जाती है और
प्रिया का संघर्ष बढ़ जाता है। नरेन्द्र की बच्चों को छीन लेना, घर से निकालना,
रिजर्व बैंक में पत्र लिखकर बिजनेस बंद करवाने की धमकियाँ प्रिया को अधिक
विद्रोही बना देती है। अपने पिता की मृत्यु के बाद घर में भी लड़कियाँ लानेवाला
नरेन्द्र प्रिया की बिजनेस ट्रिप को 'अकेले मोज करने की आदत' कहता है और
कहता है 'मैं सीरियस हूँ' फिर कहता हूँ यदि आज तुम लन्दन गई तो मेरे घर में
तुम्हारी जगह नहीं है। यह भी साली कोई जिन्दगी है जब देखो तब बिजनेस।
कल कस्टमर आ रहे है। तो आज सैम्पल बंधवाने में ही फैक्टरी में रात के दस
बज गये। फिर रात को साली फोन की घंटी बजती रहती है। घर न हुआ
पागलखाना हो गया।' 6 घर नरेन्द्र का है उसमें प्रिया रहे या नहीं यह निर्णय नरेन्द्र
का अधिकार क्षेत्र है। फिर सुन लो, यहाँ मत आना। आओगी तो मैं धक्के देकर
बहार निकलवा दूँगा। 7

स्त्री की परंपरागत भूमिका से भिन्न रुप परिवार एवं समाज को स्वीकार्य नहीं है।
पुरुषों के अधीनस्थ की भूमिका वाले कार्य स्त्री सदियों से कर रही है, किन्तु स्त्री जब
पुरुष के बराबर रहकर कुछ करना चाहे तो प्रश्न खड़े हो जाते है। पुरुष की इसी
मानसिकता पर अलका सरावगी की टिप्पणी है- 'ऐ औरत तूने जब भी किसी भी
कोने में पुरुष से अलग अपना कुछ बनाया है तो तुझे इसकी कीमत देनी पड़ी है 8
प्रिया ने भी जब अपने लिए पैसे कमाने चाहे अपने स्वतंत्र अस्तित्व के विषय में
सोचा, ऐसे में उसके हिस्से में सजा का आना निश्चित ही था। नरेन्द्र प्रिया को
परिवार और बिजनेस दोनों में से एक विकल्प चुनने के लिए कहता है, प्रिया
बिजनेस को चुनती है, क्योंकि वह जान चुकी है कि परिवार, प्यार, समर्पण,
वफादारी आदि शब्दों का उपयोग स्त्री को भ्रमर में फँसाने के लिए ही है। नारी के
सम्बन्ध में प्रयुक्त मानवाचक संबोधन नारी आहुति परंपरा को कायम रखने के लिए
ही होते हैं।

पुरुष सर्वोच्च वादी परिवार में प्रिया छिन्नमस्ता बनकर मुश्किल राहों में भी अपना
मार्ग बना लेती है। देश विदेश में अपना बिजनेस फैलाकर सफलता प्राप्त कर के
राष्ट्रपति पुरस्कार से सम्मानित होती है। 'इन्डिया टुडे' में उसका फोटो छपता है-
'ए ग्रेट बिजनेस इन्टरप्राइझर मिसेस प्रिया।' प्रिया अपने व्यक्तित्व को एक विशेष
उँचाई पर पहुँचाकर पति परिवार एवं समाज को मुंह तोड़ जवाब देती है वहीं अपने
साहस से नारी समाज को भी एक नयी पहचान देती हुई संघर्ष द्वारा मुक्ति का मार्ग
खोजने की प्रेरणा देती है। मैंने दुःख झेला है। पीड़ा और त्रासदी में झुलसी हूँ,
जिस दिन मैंने त्रासदी को ही अपने होने की शर्त समझ लिया उसी दिन, उस
स्वीकृति के बाद, मैंने खुद को एक बड़ी गैर जरूरी लड़ाई से बचा लिया। कुछ के
प्रति मेरा समर्पण था। सारे जुल्मों के सामने सलीब पर लटकते मैंने पाया कि अब
पूरी तरह जिन्दगी की चुनौतियों का सामना करने के लिए तैयार हूँ। 9

'छिन्नमस्ता' काश ! इस उपन्यास को मैं फिर से लिख पाऊँ' लेख में प्रभा खेतान
लिखती है साधारण मानवीय रूप में मेरी नायिका प्रिया अपनी व्यथा को कहती है
और हमें कहते कहते अपने एक त्रासद अतीत से उबारती है। समाज के अनुसार
उसे मर जाना चाहिए था, टूट जाना चाहिए था। उसका सर तो पहले ही कट चुका
था, लेकिन फिर भी वह छिन्नमस्ता देवी अपने रक्त से परिवेश से और अन्ततः
अपने पति से लड़ती हुई अपनी जिन्दगी बनाती है क्योंकि मेरे जीवन की सबसे बड़ी
प्रेरणा रही है कि स्त्री अपनी मानवीय गरिमा के लिए संघर्ष करे, उसे जगत में अपने
होने के माध्यम से हासिल करके रहे।

'छिन्नमस्ता' उपन्यास में प्रभा खेतान ने नारी मुक्ति की संघर्ष गाथा को उसकी
मानवीय गरिमा के साथ प्रस्तुत किया है। छिन्नमस्ता बनकर अपने लिए रास्ता
तलाश ने का नारी का प्रयत्न समाज का तिलमिलाने वाला कटु यथार्थ है।

संदर्भ :
1 'छिन्नमस्ता' प्रभा खेतान पृष्ठ, 194 , 197
2 वही पृष्ठ, 157
3 वही पृष्ठ, 215
4 वही पृष्ठ, 154
5 वही पृष्ठ, 15
6 वही पृष्ठ, 14
7 वही पृष्ठ, 14
8 'शेष कादम्बरी' अलका सरावगी पृष्ठ, 78
9 'छिन्नमस्ता' प्रभा खेतान पृष्ठ, 10

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समीक्षक :
डॅा. दीप्ति बी. परमार प्रवक्ता - हिन्दी विभाग
श्रीमती आर. आर. पटेल महिला महाविद्यालय, राजकोट

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  1. आधुनिक नारी, अपने स्‍वाभिमान की रक्षा करना जानती है, उसे अपनी सामाजिक सता का पूर्ण भान है, उसकी दैहिक,सामा‍जिक व आध्‍यात्मिक चेतना समग्र रुप में, समूची संरचना का केंद्र बिंदु है । वर्तमान सामाजिक संदर्भ में नारी करवट बदलते परिवेश में पारिवारिक बिखराव, मुल्‍यहीनता, यौन-संबंधों का मांसल सतहीपन,शोषण से मुक्ति पाने की छटपटाहट व्‍यक्‍त कर रही है,एवं धीरे-धीरे अपने इस प्रयास में सफल भी हो रही है । नारी-जीजिविषा के चलते वर्तमान सामाजिक संदर्भ में उसका अबला रूप निश्चित ही बदल चुका है, नारी सबल हो रही है, उर्जावान बनी है और यह स्थिति कुल मिलाकर सुखद है ।

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  2. aap ki lekani me aesi bat hai ki samixa padhane ke bad ham upanas padhe bina nahi rah sakate.
    -sanjay chavda

    उत्तर देंहटाएं

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