शनिवार, 2 अक्तूबर 2010

दामोदर लाल जांगिड़ की ग़ज़लें

ग़ज़ल

गांव में जब भी किसी के घर में चूल्‍हा न जल पाता था।

जो भी होता जिसके घर में वो उसको दे आता था॥

 

पड़ा किसी भी एक में दुःख वो चौपालों पर आकर के,

थोड़ा थोड़ा करते करते सारा ही बंट जाता था।

 

सम्‍बोधन ऐसे कि जिनमें अपनेपन की सौरभ थी,

कोई काका, बाबा, दादा, या भाई कहलाता था।

 

किसी जात के घर की बिटिया की शादी के मौके पर,

सारा गाँव घराती बन कर बढ़ चढ़ हाथ बँटाता था।

 

भोर की बेला में हर घर की घट्‌टी का घर्राहट ही,

किसी भी घर के कुशलक्षेम का शुभ संदेश सुनाता था।

 

टपरी झूंपे की छावन या खेत जोतने की खातिर,

मदद परस्‍पर कर देने को कब कोई कतराता था।

 

कल तक धर्म न दीवारें बन बँटवारा कर पाया था,

ईद मुबारक हिन्‍दू देता मुस्‍लिम होली गाता था।

 

पनघट पर अल्‍हड़पन को देखा तो समझा ‘दामोदर‘,

क्‍यों मटकी भंजन करने को मन कान्‍हा का ललचाता था।

---

 

ग़ज़ल

तेरा विप्लव में तो शीर्ष पर था नाम विद्रोही।

जँचा है क्‍या समर्पण को कभी उपनाम विद्रोही॥

 

घटा क्‍या क्‍या नहीं हो और घटने प्रतीक्षा में ,

मचा चारों दिशाओं में तुमुल कोहराम विद्रोही।

 

तुम्‍हें आदर्श माना था चुने पद चिन्‍ह तेरे ही,

हम चल रहे उस मार्ग पर अविराम विद्रोही।

 

सहन करता है उसको लोग अब कायर बताते हैं,

हमें संयम बरतने का न दो पैगाम विद्रोही ।,

 

सतत चलना पथिक की प्रायः कर पहचान होती हैं,

कहीं अस्‍तित्‍व को डस जाय ना विश्राम विद्रोही।

 

हठीले गर्व के पुतले को तुम कुछ भी न समझाना,

कसौटी बन चिढ़ाएंगे इसे परिणाम विद्रोही।

 

हरा कर कंस को इतिहास जीता हैं 'दामोदर '

सहोदर चाहिए बस साथ में बलराम विद्रोही।

--

ग़़ज़ल

छोटा सा कटोरा था उसका, दो मुठ्ठी ले भर आया हैं।

पर देख के मेरी झोली को, सर दाता का चकराया है॥

 

उन चाँद सितारों को पा कर ,इतराये वो भरमाये वो ,

रस्‍ते का रोड़ा मान जिन्‍हें,बहुधा हमने ठुकराया है।

 

दिल अंकबूत हैं सपनों, ताना बाना बनता रहता,

किसको दोष मढ़ें जिसने, इसमें हमको फंसवाया है।

 

चीखी थी हदें तानाजन कि, हद होती हैं लाचारी की,

कूवत होती हैं जिसमें वो,इक हद तक ही रुक पाया है।

 

जब जब भी खुदा से रुठा मैं, हर बार मनाने आया वो,

रुठा है खुदा उसका उससे,कर अरदासें उकताया है।

 

मत भाग भरोसे बैठ कभी,कुछ कर के ही कुछ पायेगा,

हाथों की लकीरें देख,नजूमी ने अक्‍सर समझाया है।

--

ग़ज़ल

खो रहे पहचान हम गुमनामी कसती फब्‍तियां ।

अब हमारी रह गयी पहचान केवल तख्‍तियां ॥

 

हट सड़क से इक गली में फिर गली उसमें गली,

रहते हो गोया कि छुप के जी रहे हो बस मियां ।

 

खुद को भी पहचानने से कल मुकर जायेंगे वो,

जिनकी बस पहचान होती कुर्सी, तमगे, कुर्सियां।

 

जानता न डाकिया कि कौन है रहता कहां ,

दो जनों की दे गवाही रखी हैं अर्जियां ।

 

खो चुके पहचान को पहचान पाने के लिए ,

हाथ धोया हासियों से मिल न पायी सुर्खियां।

 

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दामोदर लाल जांगिड़

पो लादड़िया

नागौर राज 341617

3 blogger-facebook:

  1. सारे गज़लियात अच्छे लगे, बधाई। आपके अंदर ग़ज़ल की रूह तो है पर उसे छंद (बहर) का जामा पहनायें तो उसकी काया मुमताज सी लगेगी।

    उत्तर देंहटाएं
  2. JANAB DANI SAHEB INMEN SABHI GAZALEN CHAND O BAHAR MEN HI HAI,BRAYE MAHARVANI KE VAPIS PADHEN
    PURUSHOTTAM VISHAVKARMA

    उत्तर देंहटाएं
  3. अच्छी ग़ज़लें...अच्छे भाव...बधाई।

    उत्तर देंहटाएं

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