बुधवार, 20 अक्तूबर 2010

मंजरी शुक्ल की कविता - जिसका था इंतजार मुझे वही ना मिला

manjari shukla (Custom) 
जिसका था इंतजार मुझे वही ना मिला
सबसे मिला रोज मैं पर खुद से ना मिला
 
आँखें ढूँढती रही तुझे हर अक्स में
मिले तमाम दोस्त ,तुम जैसा न मिला
 
हर कदम पर सोचा ना आगे बढ़ूं
पर हर मोड़ तेरे घर को जा मिला
 किस्मत ही मेरी ऐसी थी  ऐ दोस्त
मैं तुझसे और तू मुझसे ना मिला
 खूबसूरत चेहरों   की कमी नहीं थी
तो क्यों मुझे तुझ सा दूसरा ना मिला
 मंदिर में ढूँढा तुझको मस्जिद भी गया
क्यों मेरी दुआओं को किनारा ना मिला
 तमाम ख़त तुझे लिखकर फाड़ दिए मैंने
क्या करता कभी तेरा पता नहीं मिला
 कमी नहीं है दोस्तों की महफ़िल में
पर मुझे सिर्फ तू ही नहीं मिला
 समझा  लेता हूँ  अपने दिल को यह बताकर
किस्मत से पहले किसी को कुछ नहीं मिला
  

7 blogger-facebook:

  1. समझा लेता हूँ अपने दिल को यह बताकर किस्मत से पहले किसी को कुछ नहीं मिला

    Bahut sunder bhav....Ek safal prayas apne dil ko fusla lene ka.....is kavita mein ujagar hoti hai.

    उत्तर देंहटाएं
  2. मै आपकी हर कविता पढ़ता हूँ I
    "समझा लेता हूँ अपने दिल को यह बताकर किस्मत से पहले किसी को कुछ नहीं मिला"

    बिलकुल सही लिखा है आपने

    उत्तर देंहटाएं
  3. Kea likha hai ma'am apne, very nice, lz keep it up....keep posting such type of ghazals

    उत्तर देंहटाएं
  4. ग़ज़ल के अन्दाज़ में लिखी दिलकश कविता के लिये मन्जरी जी को मुबारक बाद।

    उत्तर देंहटाएं
  5. बहुत सुन्दर लिखा है आपने ............मनमोहक

    उत्तर देंहटाएं
  6. एक तलाश है जिंदगी,जब तक रहें ढूंढें,वह मिले नहीं,

    उत्तर देंहटाएं
  7. santosh11:26 am

    Manjari ma'am as a poet is maturing day by day. Great work ma'am.

    उत्तर देंहटाएं

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