रविवार, 3 अक्तूबर 2010

राजेश विद्रोही की ग़ज़लें

(1)

यूँ अपनी दास्तां हर इक को बतलाया नहीं करते।

जिग़र के ज़ख्म चौराहों पे दिखलाया नहीं करते॥

 

किसी की सर्द आहों में सिसकता नाम रह जाये।

तसव्वुर में किसी के इस क़दर आया नहीं करते॥

 

निभाना ग़र न चाहो तो नहीं बंदिश है कोई भी।

वफ़ाओं को किसी की यूं तो झुठलाया नहीं करते॥

 

तुम्हा़री बेरुखी को भी न जाने क्यान समझ बैठे।

खुदा का वास्ता देकर क़सम खाया नहीं करते॥

 

भंवर में जब से उलझे हैं ये माना नाखुदाओं ने।

हर इक तूफान की मौजों से टकराया नहीं करते॥

 

ज़हाँ में हम सा भी कोई भला क्या बदनसीब होगा।

जिन्हें हम याद करते हैं वो याद आया नहीं करते॥

 

यही है इल्तिमज़ा टूटे हुए दिल की खुदावन्द।।

किसी मज़बूर की फ़रियाद ठुकराया नहीं करते॥

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(2 )

यकीनन ये गिले-शिकवे अगर बाहम हुए होते।

दिलों के फ़ासले यारों कभी के कम हुए होते॥

 

कभी इक दूसरे को हमने पहचाना नहीं वरना।

न हम शिकवा व लब होते ना तुम बरहम हुए होते॥

 

कभी मिलकर के हमने काश खुशियाँ बाँट ली होती।

कभी इक दूसरे के हम शरीके ग़म हुए होते॥

 

ये माना मज़हबी दंगे कुछेक शैतान करते हैं।

अकेले क्या ये करते ग़र ना पीछे हम हुए होते॥

 

कभी मिलती नहीं इन्सान पे तरजीह मज़हब को।

न जो पैदा ज़मीं पर मुल्ला औ ब्रह्मन हुए होते॥

 

सिसकती क्यों भला इन्सानियत दुनियाँ में इस दर्ज़ा।

न जो दैरो-हरम होते ना ये परचम हुए होते॥

 

कहा था डार्विन ने सच ये नस्ल औलाद-बन्दर है।

भला हैवान बन जाते तो तिफ़ल-आदम हुए होते॥

 

वो श्‍ौ तामीर ना होती जो बांटे मुल्कों-मिल्लात को ।

खुदाया तेरी जगहा ग़र कसम से हम हुए होते॥

 

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( 3)

वक्त बदला मग़र वो बदल ना सके।

रस्म के तौर भी साथ चल ना सके॥

 

लड़खड़ाये हुए तो संभल भी गये।

जब से भटके कदम फिर संभल ना सके॥

 

आ गई रास क़ैदे-क़फ़स इस कदर।

चाह कर भी जहाँ से निकल ना सके॥

 

आफ़ताबे-मुकद्दर तो ढ़ल भी गया।

चन्द साये ग़मों के जो ढ़ल ना सके॥

 

सांस तो आखिरी दम निकल जायेगी।

चंद अरमान शायद निकल ना सके॥

 

बेरुखी शम्अन की उन से पूछे कोई ।

जो न जिंदा रहे और जल ना सके॥

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( 4)

थक गई है जुबाँ दास्ताँ कहते-कहते।

सूखते जा रहे, अश्क भी बहते-बहते॥

 

तबस्सुम के तेवर ज़ुदा हो चुके हैं।

ज़माने के जुल्मों सितम सहते-सहते॥

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किसी इन्कार की खातिर, किसी इकरार की खातिर।

सितारे हैं गवाह जिसके, उसी इकरार की खातिर॥

 

कभी के कर चुके होते, किनारा ज़िन्दगानी से।

जिये जाते हैं बस केवल, तेरे दीदार की खातिर॥

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शिकायत है यही सबको किनारों ने डुबाया है।

मग़र अपना तो शिकवा है या रब! मँझधार ले डूबी॥

 

जिसे समझा था इस क़ाबिल किनारे पे लगायेगी।

फ़क़त अफसोस इतना है वही पतवार ले डूबी॥

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थी खता मेरी बहुत पर कुछ तुम्हारी भी तो थी।

ये हंसी शिकवे-शिकायत याद ऐ साकी रहे॥

 

मेरे हिस्से का बराबर हो ना पायेगा हिसाब।

नाम लिख देना मेरे खाते में जो बाक़ी रहे॥

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(5)

तेरी नवाजिशों को भुलाएं तो किस तरह ?

माज़ी के नक्श दिल से मिटायें तो किस तरह ??

 

वैसे भी इस जहां में किसी का हुआ है कौन ?

इल्ज़ा म तेरे सर पे लगायें तो किस तरह ??

 

कुछ इस अदा से उनसे हुआ तर्के तआल्लुक,

रुठे हुओं को फिर से मनायें तो किस तरह ??

 

मक्कारियों पे खुद के अंगूठों के हैं निशां,

अंगुली किसी की ओर, उठाएं तो किस तरह ??

 

दे देके जिसको हमने जलाया है खूने-दिल।

उस शम्अे-जिन्दगी को बुझायें तो किस तरह ??

 

खु़द्दारियों का आखिर होना था हश्र ये ?

हम ये सरे नियाज़ झुकाएं तो किस तरह ??

 

हिस्सा है इक हयात का ये दौरे-बेख़ुदी।

रुखसत के वक्त होश में आयें तो किस तरह ??

 

जिन की इबारतों में निहाँ है सुकूने-दिल।

‘राजेश' उन ख़्रातों को जलायें तो किस तरह ??

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(6)

ये जानी पहचानी ग़ज़लें।

खालिश हिन्दुंस्ता़नी ग़ज़लें॥

 

कान्हा की मुरली में खोई।

मीरा सी दीवानी ग़ज़लें॥

 

नानक, सूर, कबीरा गाते।

भाव भरी रुहानी ग़ज़लें॥

 

क़ाफ़िर का फतवा पाकर भी।

रुकी नहीं रसखानी ग़ज़लें॥

 

सोंधी खुश्बू से महकेगी।

ओढ़े चूनर धानी ग़ज़लें॥

 

भारत की अनमोल विरासत।

ग़ालिब की लासानी ग़ज़लें॥

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4 blogger-facebook:

  1. ज़िंदगी के आंगन में इधर उधर बिखरी सच्चाइयों को आपने शब्दों और भावों के रंगों के द्वारा शे‘रों की तूलिका से खूबसूरत ग़ज़लों की आकृतियां बनाई है...बधाई।

    उत्तर देंहटाएं
  2. सराहनीय पोस्ट के लिए बधाई .

    कृपया इसे भी पढ़े - -

    बीजेपी की वेबसाइट में हाथ साफ http://www.ashokbajaj.com

    उत्तर देंहटाएं
  3. भवर में उलझे हैं जब से ये माना नाख़ुदाओं ने,
    हर इक तूफ़ान की मौजों से टकराया नहीं करते। बेहतरीन शे'र मुबारकबाद। " हर इक " पे आपने अलिफ़-वस्ल का सहारा लिया है शायद। इसे लय के हिसाब से कैसे पढा जायेगा क्रिपया समझायें ।

    उत्तर देंहटाएं
  4. सोंधी खुश्बू से महकेगी।

    ओढ़े चूनर धानी ग़ज़लें॥



    भारत की अनमोल विरासत।

    ग़ालिब की लासानी ग़ज़लें॥

    Bahut hi manmohak bhasha mein shabdon ki kasawat aur bunawat apni ek alag chavi banane mein safal hui hai..badhayi

    उत्तर देंहटाएं

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