मंगलवार, 26 अक्तूबर 2010

दामोदर लाल जांगिड़ की ग़ज़लें

ग़ज़ल 48

आदमी या रुप खोटा, आदमी का आदमी।

कब उतारेगा मुखौटा, आदमी का आदमी॥

 

आदमी जो कि गया था आदमी को ढूंढ़ने ,

और कर के कत्‍ल लौटा, आदमी का आदमी।

 

आदमी की रुह आखिर तिलमिला कर रह गयी,

रख रहा गिरवी लंगोटा, आदमी का आदमी।

 

इतनी भारी भीड़ में भी हैं अकेला आदमी।

कर रहा महसूस टोटा, आदमी का आदमी।

 

आदमी का कद अगर दें आदमी को नापने,

नाप दे छोटे से छोटा, आदमी का आदमी ।

 

ग़ज़ल 7

अपना तो देखा भाला था।

सच कब चुप रहने वाला था॥

 

और अर्थ थे खामोशी के,

क्‍यों माना मुँह पे ताला था।

 

कौन गवाही देगा उसकी,

झूठ ने झूठा भ्रम पाला था।

 

उबटन के उपरांत भी उसका,

चहरा ज्‍यों का त्‍यों काला था।

 

ऐसे कब तक टल सकता था,

ले दे के अब तक टाला था।

 

इस साँचे को किसने ‘जांगिड'

कौन से साँचे में ढ़ाला था।

 

ग़ज़ल 55

गिनता हैं हर सांस बही में लेता रोज उतार।

बड़ा काईयां हैं ये उपर वाला लेखाकार ॥

 

कुछ दिन आयी खुशियां लौटी दे यादों के घाव,

दुखियारे दुःख पास बैठ के करते अब उपचार।

 

सांसे जितनी ले कर आये कम पड़ती देखी,

अधिक सूद का लालच दे कर ले ली और उधार।

 

ये रस्‍ता तो बस्‍ती से सीधा मरघट को जाता है,

न जाने किस रस्‍ते पर हैं स्‍वर्ग नर्क के द्वार।

 

चंदे के मंदिर में बैठा निर्भर नित्‍य पुजारी पर,

भक्‍त खड़े हैं कितने उसके आगे हाथ पसार।

 

जिसकी भी चाहे जैसी वो किस्‍मत लिख देता है,

किसने दिये विधाता को ये ‘दामोदर‘ अधिकार।

 

ग़ज़ल 18

इक सचेतक सजग गुप्‍तचर लेखनी।

और बजी सर्वदा बन गज़र लेखनी॥

 

जब ये विरही के मन की तहों में गयी,

तब गयी दौड़ पी के नगर लेखनी।

 

जब भी बस्‍ती में निर्बल कराहें सुना,

तो सुना रोयी हैं रात भर लेखनी।

 

हासिये तू भी सुर्खी तक आ सका

जब चली तुझपे कस के कमर लेखनी।

 

जो इतिहास लिख्‍खी थी तलवार ने

मिट गयी होती होती न गर लेखनी।

 

जुर्म सहकर बगावत क्‍यों खामोश है,

इससे वाकिफ हैं ये जादूगर लेखनी।

 

जो भी ढ़र्रे से हट के चली है कभी

विश्‍वकर्मा हुई वो अमर लेखनी।

--

दामोदर लाल जांगिड़

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