मंगलवार, 26 अक्तूबर 2010

विजय वर्मा की दो कविताएँ – सलीब व धोखा

     [१]

सलीब

ना रिश्तों की अहमियत है

ना भावनाओं पे  गौर है,

एक अज़ब की बेकसी है

एक गज़ब का दौर है।

क्या कहूँ, किससे कहूँ

सभी ने तो है यहाँ

अपने ज़ख्मों के सौदा किये.

एक तुम्हीं नहीं हो 'विजय'

दर्द के सलीब पे टंगे हुए,

इस ज़माने ने हजारों

मसीहा हैं पैदा किये .

   [२]

धोखा
क्यूँ  हर शख्श में

अपनत्व ढूंढता हूँ मैं?

क्यूँ हर बेगाने मुझे

अपने से लगते है ,

जबकि यह बस्ती है बेगानों की

बेगानी यह दुनियाँ है .

यह सौहार्द एक छलावा है

यह हंसी एक धोखा है.
--
v k verma,sr.chemist,D.V.C.,btps
vijayvermavijay560@gmail.com

4 blogger-facebook:

  1. दोनों कवितायें बहुत सुन्दर ! आज से समय को विम्बों में कहती हुई !

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  2. दोनो की दोनो कविताएँ दमदार हैं, विजय जी|

    उत्तर देंहटाएं
  3. aap sabo ko comments ke liye bahoot bahoot dhanyawad.

    उत्तर देंहटाएं

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