सोमवार, 18 अक्तूबर 2010

दामोदर लाल जांगिड़ की ग़ज़लें

ग़ज़ल 48

आदमी या रुप खोटा, आदमी का आदमी।

कब उतारेगा मुखौटा, आदमी का आदमी॥

 

आदमी जो कि गया था आदमी को ढूंढ़ने ,

और कर के कत्‍ल लौटा, आदमी का आदमी।

 

आदमी की रुह आखिर तिलमिला कर रह गयी,

रख रहा गिरवी लंगौटा, आदमी का आदमी।

 

इतनी भारी भीड़ में भी हैं अकेला आदमी।

कर रहा महसूस टोटा, आदमी का आदमी।

 

आदमी का कद अगर दें आदमी को नापने,

नाप दे छोटे से छोटा, आदमी का आदमी ।

 

ग़ज़ल 7

अपना तो देखा भाला था।

सच कब चुप रहने वाला था॥

 

और अर्थ थे खामोशी के,

क्‍यों माना मुँह पे ताला था।

 

कौन गवाही देगा उसकी,

झूठ ने झूठा भ्रम पाला था।

 

उबटन के उपरांत भी उसका,

चहरा ज्‍यों का त्‍यों काला था।

 

ऐसे कब तक टल सकता था,

ले दे के अब तक टाला था।

 

इस साँचे को किसने ‘जांगिड'

कौन से साँचे में ढाला था।

 

ग़ज़ल 55

गिनता हैं हर सांस बही में लेता रोज उतार।

बड़ा काईयां हैं ये उपर वाला लेखाकार ॥

 

कुछ दिन आयी खुशियां लौटी दे यादों के घाव,

दुखियारे दुःख पास बैठ के करते अब उपचार।

 

सांसें जितनी ले कर आये कम पड़ती देखी,

अधिक सूद का लालच दे कर ले ली और उधार।

 

ये रस्‍ता तो बस्‍ती से सीधा मरघट को जाता हैं,

न जाने किस रस्‍ते पर हैं स्‍वर्ग नर्क के द्वार।

 

चंदे के मंदिर में बैठा निर्भर नित्‍य पुजारी पर,

भक्‍त खड़े हैं कितने उसके आगे हाथ पसार।

 

जिसकी भी चाहे जैसी वो किस्‍मत लिख देता हैं,

किसने दिये विधाता को ये ‘दामोदर‘ अधिकार।

 

 ग़ज़ल 18

इक सचेतक सजग गुप्‍तचर लेखनी।

और बजी सर्वदा बन गज़र लेखनी॥

 

जब ये विरही के मन की तहों में गयी,

तब गयी दौड़ पी के नगर तेखनी।

 

जब भी बस्‍ती में निर्बल कराहें सुना,

तो सुना रोयी हैं रात भर लेखनी।

 

हासिये तू भी सर्खी तब आ सका

जब चली तुझपे कस के कमर लेखनी।

 

जो इतिहास लिख्‍खी थी तलवार ने

मिट गयी होती होती न गर लेखनी।

 

जुर्म सहकर बगावत क्‍यों खामोश हैं,

इससे वाकिफ हैं ये जादूगर लेखनी।

 

जो भी ढ़र्रे से हट के चली हैं कभी

विश्‍वकर्मा हुई वो अमर लेखनी।

---

दामोदर लाल जांगिड़

लादड़िया

नागौर राज

2 blogger-facebook:

  1. EK ALAG ANDAZ,NAYE TEWAR AUR ALHADA MOUZUAT PAR KHHOBSOORAT GAGALEN HAI,ESI TANAFEESH KO TAJEEH DENE KE LIYE BHAI RAVI RATALAMI KA SHUKRIYA
    RAJESHVIDROHI

    उत्तर देंहटाएं

रचनाओं पर आपकी बेबाक समीक्षा व अमूल्य टिप्पणियों के लिए आपका हार्दिक धन्यवाद.

स्पैम टिप्पणियों (वायरस डाउनलोडर युक्त कड़ियों वाले) की रोकथाम हेतु टिप्पणियों का मॉडरेशन लागू है. अतः आपकी टिप्पणियों को यहाँ प्रकट होने में कुछ समय लग सकता है.

------------------------------------------------------------

और दिलचस्प, मनोरंजक रचनाएँ पढ़ें-

प्रकाशनार्थ रचनाएँ आमंत्रित हैं...

1 करोड़ से अधिक पृष्ठ-पठन, 1.5 लाख गूगल+ अनुसरणकर्ता, 1500 से अधिक सदस्य

/ 2,500 से अधिक नियमित ग्राहक तथा 2000 से अधिक फ़ेसबुक प्रसंशक
/ प्रतिमाह 10,00,000(दस लाख) से अधिक पाठक
/ 10,000 से अधिक हर विधा की साहित्यिक रचनाएँ प्रकाशित
/ आप भी अपनी रचनाओं को इंटरनेट के विशाल पाठक वर्ग का नया विस्तार दें, आज ही नाका से जुड़ें. नाका में प्रकाशनार्थ रचनाओं का स्वागत है.किसी भी फ़ॉन्ट, टैक्स्ट, वर्ड या पेजमेकर फ़ाइल में रचनाएँ rachanakar@gmail.com पर ईमेल करें. अधिक जानकारी के लिए यह लिंक देखें - http://www.rachanakar.org/2005/09/blog-post_28.html

विश्व की पहली, यूनिकोडित हिंदी की सर्वाधिक प्रसारित, समृद्ध व लोकप्रिय ई-पत्रिका - नाका

मनपसंद रचनाएँ खोजकर पढ़ें
गूगल प्ले स्टोर से रचनाकार ऐप्प https://play.google.com/store/apps/details?id=com.rachanakar.org इंस्टाल करें. image

--------