गुरुवार, 14 अक्तूबर 2010

विजय शर्मा का आलेख - होसे सारामागो : चला गया खरी-खरी कहने वाला

स्मृति लेख

किसी ने कहा है कि स्मृति (मृत्यु) लेख लिख या पढ़ कर हम इस पृथ्वी पर बेहतर जीवन व्यतीत करने की राहें जान सकते हैं. ज्यादा अर्थपूर्ण जीवन जीने के तरीके खोज सकते हैं.


‘दुनिया कितनी सुन्दर है और कितने दुःख की बात है कि मुझे मरना है.’ होसे सरामागो ने अपने एक उपन्यास में अपने एक पात्र के मुँह से यह कहलवाया है और आज वे स्वयं इस दुनिया से जा चुके हैं. जाते समय उन्हें जाने का कितना दुःख था पता नहीं. हाँ, उनके पाठकों को उनके जाने का दुःख अवश्य है. वैसे दुःख उस व्यक्ति की मृत्यु का करना चाहिए जिसने जीते जी वह नहीं किया जो उसका दायित्व था. इस मायने में सारामागो की मृत्यु पर शोक प्रकट किया जा सकता है, दुःखी होने की आवश्यकता नहीं है.
हालाँकि वे सदा सत्ता की आँख की किरकिरी रहे मगर 18 जून 2010 को उनकी मृत्यु पर पुर्तगाल के प्रधानमंत्री ने अफसोस जताते हुए कहा, ‘‘सारामागो हमारे महान सांस्कृतिक व्यक्तित्व थे. उनके जाने से हमारी संस्कृति की हानि हुई है.’’ सत्ताधारियों को सार्वजनिक रूप से कहना पड़ता है.


1998 के नोबेल पुरस्कर विजेता ने अपने जीवन में सबसे बुद्घिमान जिस आदमी को जाना था वह लिखना-पढ़ना नहीं जानता था. जब फ्रांस की जमीन पर एक नए दिन की संभावना झूलती होती थी यह व्यक्ति चार बजे भोर में अपने तखत से उठता और खेतों की ओर जाता. अपने साथ अपने पालतु आधा दर्जन सूअरों को भी चराने ले जाता. सूअर जिनसे उसका और उसकी पत्नी का भरण-पोषण होता था. यह व्यक्ति और कोई नहीं होसे के नाना थे. सारामाओ की माँ के माता-पिता न्यूनतम पर जीते थे, सूअरों को पाल कर गाँव के बाजार में बेचते और उससे जो आ-मद-नी होती उससे गुजर-बसर करते. सर्दियों में जब तापमान बहुत नीचे चला जाता और घर में बरतनों में रखा पानी जमने लगता वे सूअर बाड़े में जा कर सूअर के कमजोर बच्चों को अपने बिस्तर में ले आते. खुरदुरे कम्बलों में वे अपने बदन की गर्मी देकर जानवरों के उन बच्चों को सर्दी से मरने से बचाते. वे दोनों दयालु थे पर यह उनकी दयालुता नहीं होती थी. उन्हें इस कार्य के लिए जो उकसाता था वह था उनका अपना स्वार्थ. वे इन जानवरों को बिना किसी दया की विशिष्ठ भावना के सुरक्षा देते थे ताकि उनकी अपनी रोजी-रोटी चलती रहे. जैसा कि स्वाभाविक था जीवन ने उन्हें सिखा दिया था कि जरूरत के लिए क्या करना है. जीवन ने उन्हें सिखा दिया था कि उनका जीवन इन जानवरों पर निर्भर है, ये जानवर ही उनका और उनके परिवार का भरण-पोषण करते हैं. अतः उन्होंने यह भी सीख लिया था कि इन जानवरों के जीवन की रक्षा करना आवश्यक है.


होसे सरामागो ने बचपन में बहुत बार सूअरों की देखभाल में अपने नाना की सहायता की. घर से जुड़े किचेन गार्डेन के लिए जमीन की खुदाई की. जलाने के लिए लकड़ियाँ फाड़ीं और पम्प से पानी निकालने के लिए बड़े चक्के को बहुत बार घुमाया. बहुत बार वे सामुदायिक कूँए से पानी निकाल कर अपने कंधे पर रख कर घर लाते. भोर में सूअरों की रखवाली कर रहे होते. नाना की आँख बचाकर सूअरों को खिला ने केलिए बहुत बार भुट्टे के खेतों की ओेर अपनी नानी के संग रस्सी डोरी और बोरे ले कर खेत से बचा खुचा पुआल बटोरने जाते.


कभी-कभी गर्मियों की रात में खाना खाने के बाद नाना कहते, ‘होसे ! चलो आज हम दोनों अंजीर के पेड़ के नीचे सोएँगे.’ अंजीर पेड़ के नीचे लेट कर वे आकाश गंगा निहारते. पत्तों के बीच से तारों की लुका छिपी देखते और उनके नाना उन्हें तरह-तरह की कहानियाँ, लोगों के किस्से और अपने अनुभव सुनाते. इनमें साहसी कथाएँ, प्रसिद्घ कहानियाँ, लोक कथाएँ, डरावनी, मृत्यु की कहानियाँ, प्रेरणादायक कहानियाँ आदि तरह-तरह की कहानियाँ होती थीं. वे पूर्वजों की बातें बताते, अनोखी दास्तानें सुनाते और बालक होसे इन्हें सुनते हुए जागता भी रहता, साथ ही उसके लिए ये लोरी का काम भी करतीं. पता नहीं होसे के नाना स्वयं को याद दिलाने के लिए बार-बार वे ही कहानियाँ दोहराते थे या पुरानी कहानियों को नया करने के लिए उसमें हर बार इज़ाफा करते जाते थे. एक समय था जब बालक होसे सोचता था कि उनके नाना दुनिया की सब बातें जानते हैं.


जब सुबह होती चि़डिया चहकने लगती उनके नाना उन्हें सोता छोड़ कर अपने पशुओं के साथ खेतों की ओर निकल जाते. चौदह वर्ष की उम्र तक सारामागो ने जूते नहीं पहने थे और वे नंगे पैर अपना खुरदुरा कम्बल समेट कर घर की ओर जाते जहाँ उनकी नानी पहले ही उठ चुकी होती और उनके लिए एक बड़े कटोरे में कॉफी और ब्रेड लिए इंतजार कर रही होती. पहले वे सोचते थे कि उनकी नानी बुद्घिमान तो हैं पर नाना की तुलना में वे ठहर न पाती. नाना अंजीर के पेड़ के नीचे लेटे कुछ ही शब्दों में उनको दुनिया घुमाते थे और उनकी दुनिया उथल-पुथल कर देते थे वे ऐसा नहीं करती थीं. लेकिन बाद में, बहुत सालों के बाद जब उनके नाना गुजर गए, वे स्वयं बड़े हो गए तब जाकर उन्हें नानी का महत्व पता चला. उन्हें ज्ञात हुआ कि उनकी नानी सपनों में विश्वास करती थीं. नाना की मृत्यु के बाद वे घर में अकेली रहती थीं और वहीं एक दिन अपनी झोपड़ी के दरवाजे पर बैठी हुई बड़े और छोटे तारों को निहारते हुए उन्होंने कहा था, ‘दुनिया कितनी सुन्दर है और कितने दुःख की बात है कि मुझे मरना है.’ वे मरने से डरती नहीं थीं पर मरना दुःखद था. अपने कठोर जीवन के अंत की ओर जाते हुए उपहार के रूप में उन्होंने सौंदर्य को पाया था. वह दृश्य सारामागो के मन मस्तिष्क पर सदा के लिए अंकित हो गया.


यह वह घर था जहाँ के लोग सूअरों के साथ वैसे ही सोते थे जैसे लोग अपने बच्चों के साथ सोते हैं. जिस घर के लोग जीवन से बिछुड़ने पर इसलिए दुःखी होते क्योंकि जिन्दगी खूबसूरत है. सारामागो के सूअर पालने वाले नाना, कहानी सुनाने वाले नाना को जब भान हुआ कि मृत्यु आ रही है और उन्हें ले जाएगी वे अपने बाड़े के हरेक पेड़ से विदा लेने गए, हर पेड़ को एक-एक करके उन्होंने गले लगाया, रोए और उससे विदा ली और कहा कि अब वे उन्हें नहीं देख पाएँगे. ये बातें आज पढ़ने वालों को बेकार की बकवास लग सकती हैं, मजाक लग सकती हैं. आज जीवन इतना ज्यादा यांत्रिक हो गया है, इतनी तेजी से भाग रहा है कि हमें आदमियों से सम्बंध बनाने की फुर्सत नहीं है, जानवरों और पेड़ पौधों की बात तो दूर है. यदि संवेदनशील हृदय से इन बातों को पढ़ा और अनुभव किया जाए तो ये किसी और जगत की, स्वप्न लोक की बातें लगती हैं. आज हम प्रकृति से कितना दूर हो गए हैं और इसका खामियाजा भी भुगत रहे हैं. जीवन का नैसर्गिक सौंदर्य हमने खो दिया है.


चीन में एक कहावत है, ‘क्या अच्छा क्या बुरा.’ चीन के एक आदमी का एक घोड़ा उसके यहाँ से भाग निकला. जब लोगों ने इसके बारे में सुना तो कहा, ‘‘अरे बड़ा बुरा हुआ.’’ मगर घोड़े वाला बोला, ‘‘क्या बुरा, क्या अच्छा.’’ लोगों ने सोचा घोड़ा भाग जाने से जरूर इसका दिमाग फिर गया है, तभी ऐसा कह रहा है.
कुछ दिनों बाद घोड़ा लौट आया मगर वह अपने संग एक घोड़ी लेता आया. देख कर लोगों ने कहा, ‘‘वाह ! येतो बड़ा अच्छा हुआ.’’ घोड़े वाले ने फिर कहा, ‘‘क्या अच्छा क्या बुरा.’’ लोगों को फिर वह बड़ा विचित्र आदमी लगा. कुछ दिन बाद घोड़ा फिर से गायब था. लोग फिर कहने लगे, ‘‘अरे! यह तो बहुत बुरा हुआ.’’ घोड़े वाला फिर कहने लगा, ‘‘क्या बुरा क्या अच्छा.’’


इस बार घोड़ा जब वापस आया उसके साथ घोड़ों का एक झुंड था. लेकिन घोड़े का मालिक फिर भी कह रहा था, ‘‘क्या अच्छा क्या बुरा.’’ जीवन ऐसा ही है कब क्या हो कहना मुश्किल है. और जो होता है उसका नतीजा भी बताना कठिन है.


ऐसा ही कुछ 1975 में होसे सारामागो के जीवन में हुआ. 1975 में उन्हें राजनीतिक कारणों से अपनी असिस्टेंट एडीटर की नौकरी से हाथ धोना पड़ा था. मगर उनका कहना था कि यह उनके लिए एक तरह का वरदान था. इससे उनका लाभ हुआ हानि नहीं. उनका कथन है, ‘‘निकाले जाना मेरे जीवन का सबसे बड़ा सौभाग्य था. इसने मुझे रुक कर सोचने-विचारने का अवसर दिया. यह एक लेखक के रूप में मेरे जीवन का जन्म था.’’ वे यूरोप और ऑस्ट्रेलिया में बड़े चाव से पढ़े जाते हैं. पुर्तगाल और बा्रज़ील में ही उनकी किताबों की डेढ़ लाख प्रतियाँ बिक जाती हैं. वे एक ऐसी भाषा का प्रयोग करते हैं जिसे पूरी दुनिया में मात्र 170 मिलियन लोग ही प्रयोग करते हैं. उन्हें अफसोस था कि वे केवल पुर्तगाली में लिख सकते थे इसीलिए वे अपने अनुवादकों के अनुग्रहीत थे. किताबों को वे अपनी संतान मानते थे. पति-पत्नी एक-दूसरे के पूरक होने चाहिए तभी दाम्पत्य सार्थक होता है. उनकी स्पेनिश पत्नी पिलार डेल रिओ उनके लेखन के साथ-साथ उनकी किताब का स्पैनिश अनुवाद करती चलती हैं और इस तरह एक साथ उनकी किताबें एक बहुत बड़े पाठक वर्ग तक पहुँच जाती हैं.


उनका जन्म 18 नवम्बर 1922 केा हुआ था. उनके पिता का नाम होसे डि सूज़ा तथा माता का नाम मारिया ड पिएडाडे था. उनका अपना नाम भी होसे डि सूज़ा हो सकता था यदि रजिस्टार ने अपनी मनमर्जी से यह सारामागो न जोड़ दिया होता. असल में सारामागो उनके पिता के इलाके में पाए जाने वाला एक जंगली पौधा है, गरीब लोग जिसका खाने के लिए प्रयोग करते थे. उनके पिता का परिवार इसी पौधे के नाम से जाना जाता था अतः जब बच्चे का नाम लिखने का समय आया तो रजिस्टार ने उनके नाम के सामने डि सूज़ा न लिख कर सारामागो लिख दिया और सात साल की उम्र में जब पहली बार स्कूल जाने के सिलसिले में उनके दस्तावेज स्कूल में प्रस्तुत किए गए तब उन्हें ज्ञात हुआ कि उनका पूरा नाम होसे डि सूज़ा सारामागो है. पढने में तेज थे लिखने में वर्तनी की कोई भूल नहीं करते थे. उन्हें कक्षा तीन में डबल प्रमोशन मिला और इस तरह उन्होंने कक्षा तीन और चार की पढ़ाई एक ही साल में पूरी कर ली. परंतु आर्थिक अभावों में शिक्षा जारी न रह सकी. पिता ने 1924 में खेती छोड़ कर लिस्बन में रहने का निश्चय किया. लिस्बन जाने के बाद उन लोगों की माली हालत थोड़ी सुधर गई. वहाँ जाते ही उन लोगों पर दुःख का पहाड़ टूट पड़ा. होसे से दो साल बड़ा उनका भाई फ्रांसिसको गुजर गया.


उन्नीस वर्ष की अवस्था में सारामागो पहली बार किताब खरीद सके, वह भी एक दोस्त से राशि उधार ले कर. मात्र  अपनी उत्सुकता और सीखने की इच्छा के कारण उन्होंने पढ़ने की आदत विकसित की और खुद को सुसंस्कृत बनाया. लिखने के साथ-साथ वे खूब पढ़ते थे. उन्होंने खुद को स्वयं शिक्षित किया था. उनके घर में उनकी एक बहुत बड़ी लाइब्रेरी है जिसमें प्राचीन तथा आधुनिक विश्व साहित्य की किताबें भरी पड़ी हैं. अपने विचारों के कारण उन्हें बहुत परेशानियाँ भी झेलनी पड़ीं. 1944 में जब उनकी शादी हुई तब तक वे कई पेशे बदल चुके थे. उनकी पहली पत्नी इल्डा रे रेलवे कम्पनी में टाइपिस्ट थीं. 1988 में उनका तलाक हो गया. उसी साल उन्होंने स्पैनिश पत्रकार पिलार डेल रिओ से विवाह किया. 1947 में उनके जीवन में एक साथ कई महत्वपूर्ण बातें हुई. नौकरी से निकाला जाना. उनकी एकमात्र बच्ची वियोलांटे का जन्म और साथ ही उनकी पहली पुस्तक ‘कंट्री ऑफ सिन’ का आना. वैसे तो बिक्री के ख्याल से इसने ज्यादा लाभ न दिया परंतु उन्हें साहित्य से जोड़ दिया और वे वेल्डिंग का काम छोड़ कर एक साहित्यिक पत्रिका से जुड़ गए.


जब वे निरंतर लिखने लगे तो उपन्यास उनकी विधा बनी. उनकी दृष्ठि में उपन्यास एक समुद्र की भाँति होता है जिसमें विज्ञान, दर्शन, कविता, कहानी सब धाराएँ आकर मिलती हैं. उपन्यास मात्र कहानी कहना नहीं है. 1993 से उन्होंने डायरी लिखनी प्रारम्भ की और अब तक पाँच से ज्यादा वॉल्यूम तैयार हो चुके हैं. 1998 में 76 की उम्र में उन्हें नोबेल मिला. अक्सर लेखक नोबेल पुरस्कार तक चुक जाते हैं लेकिन सारामागो ने लिखना जारी रखा. नोबेल पुरस्कार के बाद 2001 में ‘ला कावेमा’ तथा 2002 में ‘एल होम्ब्रे डुप्लीकाडो’ उनकी नवीनतम पुस्तकें आई है. 2008 में उनकी जीवनी का प्रथम भाग ‘लिटिल मेमोरीज’ नाम से आया है. होसे सारामाओ ने बचपन में अपने नाना से कहानियाँ सुनी थी. आगे चल कर नाना की कहानियाँ और नाना का जीवन, नाना के आसपास का परिवेश उनके लेखन का प्रेरणा स्रोत बना. बचपन के अपने इसी जीवनानुभव को उन्होंने ‘लिटिल मेमोरीज’ में चित्रित किया है.


एमिली ज़ोला और ओनरे ड बाल्ज़ाक की तर्ज पर वे अपनी किताबों में पहले खूब राजनैतिक-ऐतिहासिक बातें भरते थे पर बाद में उन्होंन अपनी शैली विकसित की. हालाँकि बाद में भी उनका काम राजनीति से प्रेरित रहा. 18 साल तक केवल यात्रा वृतांत और कविताओं की किताबें लिखते रहे. 1966 में ‘पोसीबल पोयम्स’ के साथ उनकी वापसी हुई. फिर तो काम चल पड़ा. ‘प्रोबबली जॉय’, ‘फ्रॉम दिस वर्ल्ड एंड दि अदर’, ‘द ट्रेवल्स बैगेज’ तथा अखबारों को लिखे आलेख के दो संग्रह आए. आलोचकों का कहना है कि सारामागो को समझने के लिए इन आलेखों को पढ़ना अत्यावश्यक है. आय बढ़ाने तथा अच्छा लगने के कारण उन्होंने खूब अनुवाद कार्य किया. कोलेट, मॉपांसा, टॉल्स्टॉय, बॉडलेयर, हीगल और ना जाने किस-किस को अनुवादित कर डाला. इसके साथ ही साहित्यिक आलोचक का कार्य भी बखूबी निभाया. 1969 में प्रतिबंधित कम्युनिस्ट पार्टी की सदस्यता ग्रहण की परंतु पार्टी के प्रति आलोचनात्मक रवैया बना रहा. उन्हें ख्याति बहुत देर से मिली. 1988 जब ‘बाल्टासार एंड ब्लिमुंडा’ इंग्लिश में अनुवादित हुई तब जाकर दुनिया को उनका पता चला और उन्हें अंतरराष्ठ्रीय ख्याति मिली. वैसे यह किताब 1982 में उनकी अपनी भाषा पुर्तगाली में प्रकाशित हो कर अपने भाषा भाषियों के बीच प्रसंशित हो चुकी थी. आज उनकी किताबें विश्व की करीब बीस भाषाओं में प्राप्त हैं. एक मैकेनिक, सिविल सवर्ेंट, मेटलवर्कर, प्रोडक्शन मैनेजर, न्यूजपेपर मैनेजिंग डॉयरेक्टर से होते हुए वे साहित्यकार बने मगर इसके साथ-साथ वे सदा सत्ता के प्रतिपक्ष में खड़े रहे. एक प्रतिबद्घ कम्युनिस्ट बने रहे. उनकी विचारधारा सदैव स्पष्ठ रही उसमें कोई कम्पन नहीं आया.

जिस व्यक्ति ने देश के इतिहास में संशोधन की हिमाकत की हो और इतने पर ही रुक न गया हो, भविष्य को भी सुधारने का प्रयास किया हो. उसे यदि नोबेल पुरस्कार मिलता है तो अपने स्वार्थ के लिए यथास्थिति को बरकरार रखने वालों को यह कदापि सहन न होगा. जब उन्हें 1998 में साहित्य का नोबेल पुरस्कार मिला तो न केवल उनके देश पुर्तगाल में वरन यूरोप के अन्य देशों और अमेरिका में भी खूब हलचल मची. यह हलचल सकारात्मक न थी. यह हलचल उनके काम को लेकर न थी. यह हलचल उनकी मार्क्सवादी विचारधारा को लेकर थी. हाँ उनकी मार्क्सवादी विचारधारा को लेकर उनकी खूब आलोचना हुई और इस हंगामें में उनके रचनात्मक कार्य को अनदेखा करने का कार्य जम कर हुआ. सबसे ज्यादा परेशानी हुई धर्म के ठेकेदारों को. वतिकान ने सरेआम इसकी आलोचना की. और जब वतिकान किसी बात के खिलाफ हो तो पश्चिम के बहुत कम अखबार और आलोचक उस बात का समर्थन करने की हिम्मत जुटा पाते हैं. नतीजन अखबारों के लेख और सम्पादकीय में भी उनके कार्य का सही मूल्यांकन होने के स्थान पर मात्र उनकी आलोचना ही प्रकाशित होती रही. सरामागो मात्र मार्क्सवादी कठमुल्ला नहीं थे. यदि उनके साहित्य का निरपेक्ष तरीके से मूल्यांकन किया जाए तो यह बात स्पष्ठ होती है कि वे कभी भी मार्क्सवाद की रूढ़ियों का समर्थन नहीं करते. वरन जब भी ऐसा मौका आता है वे अपने लेखन में इसका विरोध करते नजर आते. धार्मिक कठमुल्लाओं की आँख में तो वे काफी पहले से गड़ रहे थे. उन पर पुर्तगाल के ईसाइयों की भावनाओं का अपमान करने का आरोप लगा था. उन्हें ‘हठी कम्युनिस्ट’, ‘धर्म विरोधी’ जैसे विशेषणों से नवाजा गया था.


उनके अनुसार एक पेंटर पेंट करता है, संगीतकार संगीत बनाता है, उपन्यासकार उपन्यास लिखता है. सबका अपना प्रभाव होता है. हमारा काम ऐसी बातों में शामिल होना है जो परिवर्तन लाती हैं. वे स्वयं को सामाजिक और राजनैतिक बातों से बाहर रखने की कल्पना नहीं कर पाते थे. उनके कथनानुसार यह सही है कि वे एक लेखक हैं मगर वे इस दुनिया में भी रहते हैं उनके लेखन का अस्तित्व इस दुनिया से बाहर नहीं है. वे खूब यात्राएँ किया करतेे. ये यात्राएँ वैसे तो अपनी किताब के प्रचार प्रसार के लिए होती, वे बात की शुरुआत भी अपनी नई किताब से करते मगर शीघ्र ही असली मुद्दे पर उतर आते. साहित्य से निकल कर राजनीति की बात करने लगते. आज की दुनिया की गर्हित परिस्थितियों पर चर्चा करने लगते. भूमंडलीकरण की जम कर आलोचना करतेे. उन्हें प्रजातंत्र की समस्या पर बोलना अच्छा लगता था. वे नहीं मानते थे कि सच में प्रजातंत्र है. उनका कहना था कि हम  प्रजातंत्र के द्वारा नहीं वरन संस्थानों के द्वारा शासित होते हंै. वे गिनाते कि दुनिया वर्ल्ड बैंक, इंटरनेशनल मोनेटरी फंड, वर्ल्ड ट्रेड ऑर्गनाइजेशन के द्वारा शासित होती है. हम मुगालते में हैं कि प्रजातांत्रिक शासन है. असल में हम प्लूटोक्रेसी मतलब धनिकों की सरकार द्वारा शासित होते हैं. ये बातें वे बहुत पहले कह रहे थे मगर आज यह सच्चाई सब पर खुल चुकी है कि असल शासक धनी वर्ग पूँजीपति ही है. वे आह्वान करते हैं कि समझदार नागरिक होने के कारण हमें वोट डालने अवश्य जाना चाहिए मगर अगर हम वास्तव में दुनिया बदलना चाहते हैं तो ‘ब्लैंक वोट’ डालना चाहिए ताकि पता चले कि हम नाखुश हैं और इसके भी आगे बढ़ कर वे सुझाव देते हैं कि हमें सड़कों पर उतर कर प्रदर्शन करना चाहिए. वे जब गरीबी बेरोजगारी की बात करते हुए बहुत उत्तेजित हो जाया करते. 300 सौ धनी लोगों के पास उतना धन है जितना 40% गरीबों के पास कुल मिला कर नहीं है. जिस दुनिया में युद्घ, असमानता, अन्याय है जहाँ रोज लाखों लोग अपमानित होते हैं जहाँ लोगों की जिन्दगी में कोई आशा नहीं है, जीने का कोई मकसद नहीं रह जाता है ऐसी दुनिया के विरोध का प्रदर्शन होना चाहिए ऐसा उनका दृढ़ मत था. सत्ता में बैठे लोगों को मालूम होना चाहिए कि लोग खुश नहीं हैं. उन्होंने मानवाधिकार हनन के मामलों में खुल कर अपने विचारों का प्रदर्शन किया.


उन्होंने अपने नाना-नानी के स्थान के लोगों, एलेंटेजो के लोगों का चित्रण किया जो दरिद्रता में जीवन बिताने को अभिशप्त थे. पर सारामागो ने इस लोगों की कथा कही और खूब कही. हम सभ्य लोग जिसे जीवन कहते हैं वह भी इन लोगों को नसीब न था. सारामागो ने इन्हीं सामान्यजन को अपने साहित्य का विषय बनाया. चर्च सामान्यजन का कैसे शोषण करता है, कैसे धोखा देते है उन्होंने देखा था, अनुभव किया था और अपने साहित्य में इसे दिखाया. कैसे इन सीधे-सादे लोगों को पुलिस दिन-रात तंग करती है, ये लोग अक्सर अन्याय का शिकार बनते हैं. ये कहानियाँ मात्र पुर्तगाल के सामान्य जन की न रह कर दुनिया के सब अभावों वाले जीवन की कहानियाँ बन जाती हैं. क्या यह हमारे अपने देश की कहानी नहीं है ? दुनिया के किस देश में गरीब दमन-शोषण का शिकार नहीं है ? अपने उपन्यास ‘रिज़न फॉर्म द ग्राउंड’ में सारामागो अपने बचपन के गाँव के एक परिवार बाडवीदरस की तीन पीढ़ियों की कहानी कहते हैं.


‘बाल्टाज़ार एंड ब्लिमुंडा‘ और 1988 में आए उनके उपन्यास ‘इयर ऑफ द डेथ ऑफ रिकार्डो राइस’ ने उन्हें विश्व में स्थापित कर दिया. उनकी ख्याति पुर्तगाल के बाहर यूरोप तथा अमेरिका तक पहुँच गई. तत्काल उन्होंने एक और उपन्यास ‘द स्टोन राफ्ट’ लिखा. इसमें वे एक रूपक रचते हैं कि पुर्तगाल का एक प्रायद्वीप आइबेरिया, पूरे यूरोप से टूट कर एक बड़े टापू के रूप में तैर रहा है. बिना किसी पतवार या पाल के अटलांटिक महासागर में दक्षिण की ओर बहा जा रहा है. यह जमीन और पत्थरों का ढ़ेर है जिसमें नगर, गाँव, नदियाँ, फैक्टरीज और जंगल-झाड़ियाँ तथा लोग-बाग और जानवर भी हैं. अपनी लैटिन अमेरिकी परम्पराओं की तलाश में ये सब एक नए युटोपिया के लिए बहे जा रहे हैं. वे अमेरिकी दमघोटूँ शासन से छुटकारा पाने की दिशा में संकेत कर रहे हैं. अमेरिकी चौधराहट से सारे-के-सारे लैटिन अमेरिकी देश और अब यूरोप के कुछ देश भी परेशान हैं. विकासशील देशों की तो बात ही क्या करना. कुछ आलोचक इसे यूरोपियन यूनियन से अलग हट कर अपने अस्तित्व की तलाश मानते हैं. इसमें शक नहीं कि उनकी किताबें राजनीतिक रूपक हैं. इसमें उनका स्वर व्यंग्यात्मक है, प्रधान मंत्री, राष्ठ्रपति, पर्यटन अधिकारी, यूरोपियन कम्युनिटी आदि तमाम लोगों के विचार इसमें व्यक्त हुए हैं. कुत्ता ‘स्टोन राफ्ट‘ में वह एक प्रमुख पात्र है.


हमारे देश में सत्ताधारी राजनैतिक पार्टियों ने इतिहास की किताबों में उलट फेर करके इतिहास को एक मखौल बना दिया है. ऐसे में होसे सरामागो की किताब ‘हिस्ट्री ऑफ द सीज़ ऑफ लिब्सन’ पढ़ना मनोरंजन और आँख खोलने वाला दोनों हो सकते हैं. इसमें एक प्रूफ रीडर इसी नाम की इतिहास की किताब की प्रूफ रीडिंग कर रहा है. लिस्बन के इतिहास को बदल डालने वाले इस प्रौढ़ प्रूफ रीडर राएमुंडो सिल्वा को सारामागो ने नायक बनाया है. वे स्वीकारते हैं कि यह चरित्र असल में वे काफी हद तक स्वयं हैं. किताब में नायक निश्चय करता है कि जो भी ‘हाँ’ है वह उसे ‘न’ में बदल देगा. होसे सारामागो इतिहास और साहित्य दोनों से खिलवाड़ करते हैं. ये खिलवाड़ गम्भीर किस्म के हैं. पेन की जरा सी लकीर से वे इतिहास की पूरी धारा बदल डालते हैं.


कैथोलिक कट्टरपंथियों के गले उनका उपन्यास ‘द गॉस्पल अकोर्डिंग टू जीसस क्राइस्ट’ न उतरा और उन लोगों ने पुर्तगाली सरकार पर दबाव डाल प्रतियोगिता के लिए इसके जाने में अवरोध लगा दिए. इतने पर भी धर्मावलम्बियों को चैन न मिला सरकार से इस पुस्तक को प्रतिबंधित भी करा दिया. इस उपन्यास को लेकर बन्दिशें और विवाद इतना बढ़ गया कि तंग आकर उन्होंने अपना देश ही छोड़ दिया. जब उनके काम की आलोचना हुई वे सत्ता की आँख में गड़ने लगे. धर्म और राजनीति के ठेकेदारों को उनसे परेशानी होने लगी तो वे अपना विरोध दर्ज कराने के लिए अपनी धरती छोड़ कर कैनरीज़ में लैंज़ारोट के टापू पर रहने लगे. वे सदैव धारा के विपरीत चले जिसका खामियाजा उन्हें भोगना पड़ा. मगर प्रतिबद्घ आदमी जानता है कि वह जो कर रहा है उसका दायित्व भी उसे ही लेना है और वह लेता भी है. उन्होंने सत्ता में बैठे लोगों से सदा पंगा लिया. उनका स्वभाव ऐसा है कि वे बेकार की ‘खी, खी, खी,’ नहीं करते थे और न ही लोगों से झूठमूठ को दिखावे के लिए गले मिलते थे. वे जबरदस्ती दोस्ती का दिखावा भी नहीं करते चलते थे.


होसे सारामागो की ‘द गॉस्पल अकोर्डिंग टू जीसस क्राइस्ट’ देवताओं और देवदूतों की प्रेरणादायक कहानियाँ नहीं हैं परंतु वे कुछ मनुष्यों की कहानी है जो एक ताकत के गुलाम हैं. जिसके खिलाफ वे लड़ते हैं. परंतु जिसे वे पराजित नहीं कर सकते हैं. इसमें एक स्थान पर वे कहते हैं कि ‘गिल्ट एक भेड़िया है जो अपने पिता को निगलने के बाद अपने बच्चे को खाता है. जिस भेड़िए की बात तुम कर रहे हो वह पहले ही मेरे पिता को खा चुका है. जल्दी ही तुम्हारी बारी आएगी और तुम्हारा क्या, तुम हमेशा से भकोसे गए हो, न केवल भकोसे बल्कि वमन भी किए जा चुके हो.’ सारामागो के जीसेस लालसा में फँसते हैं. लेखक बाइबिल की कुछ खाइयों-कमियों पर ध्यानाकर्षित करता है. जैसे हरोद को मरते समय बच्चों को मरवाने की क्यों सूझी ? जबकि बच्चा राजा बन कर राज्य करेगा यह भविष्यवाणी सदियों पहले हुई थी और उसे ज्ञात थी. लेखक एक सरल सा प्रश्न प्रस्तुत करता है जोसेफ ने अपने बच्चे को बचाया परंतु दूसरे लोगों को क्यों नहीं खबर की कि उनके बच्चों पर खतरा है ? जोसेफ इस दोष से स्वयं को कभी मुक्त नहीं कर पाता है इतना ही नहीं अपनी मृत्यु के समय वह यह गिल्ट अपने बेटे जीसेस को दे जाता है. होसे ने चारों गोस्पल से बहुत अलग एक कहानी रची है. यह कहानी धार्मिक न हो कर मानवीय और मनोवैज्ञानिक ज्यादा है.


प्रश्न पूछना एक बहुत बड़ी विशेषता है कुछ जानने, कुछ सीखने के लिए मन में प्रश्नों का उठना अनिवार्य है. खासतौर पर धर्म की तथाकथित अवधारणा के प्रति प्रश्न उठना बहुत स्वभाविक है परंतु ये प्रश्न ही कट्टरपंथियों को नागवार गुजरते हैं और वे तत्काल प्रश्नकर्ता का मुँह साम, दाम, दंड, भेद की नीति अपना कर बन्द करना चाहते हैं. होसे निरंतर प्रश्न उठाते हैं, ‘ईश्वर कौन है ?’, ‘वह बुराई, दरिद्रता और दुःख क्यों होने देता है ?’, ‘ईश्वर तथा शैतान का कितना निकट  सम्बंध है?’ आदि, आदि. ईसाई धर्म पितृसत्तत्मक धर्म है दुनिया के तकरीबन सारे धर्म पितृसतात्मक धर्म हैं. ईसाइयत में ईश्वर की कल्पना एक बहुत कठोर व्यक्ति के रूप में की गई है. सारामागो का ईश्वर बहुत कठोर है, वह मनुष्यों को दास की तरह प्रयोग करता है और ‘हाँ’ की बनिस्बत ‘न’ का अधिक प्रयोग करता है. सारामागो के जीसेस गॉड के खिलाफ विद्रोह करने की सोचते हंै. वे कोशिश करते हैं परंतु अंत में जीत ईश्वर की होती है. जीसेस क्रिश्चियनिटी के नाम पर खून बहाने का कारण बनते हैं. इस पुस्तक में जीसेस के पुनः उठ खड़े होने, ‘रिजरक्शन’ की बात नहीं है. इस पुस्तक का अंत आते तक लेखक काफी क्रोध में है. चुनौतियाँ प्रस्तुत करता है. मनोरंजन करता है और चौंकाता है. इसे पूरा पढ़ कर ही पूरी तरह से समझा जा सकता है. आलोचक कोर्बेट कहते हैं कि यह किताब अवमाननापूर्ण, गहन-गंभीर, सन्देहजनक, विनोदपूर्ण, विधर्मी, गहन दार्शनिक, भड़काने वाली और विवश करने वाला कार्य है. ‘द गॉस्पल अकोर्डिंग टू जीसस क्राइस्ट’ के विषय पर ही नोर्मन मेलर का ‘गॉस्पल एकॉर्डिंग टू द सन’, निकस कज़नज़ाकीस का ‘द लास्ट टेम्टेशन ऑफ क्राइस्ट’, जे एस बाख का ‘द पैशन एकोर्डिंग टू सेंट मैथ्यू’ तथा एर्नेस्ट रेनेन का ‘लाइफ ऑफ जीसेस’ भी आधारित है, परंतु इन सबके ट्रीटमेंट बहुत भिन्न-भिन्न हैं.


अपने उपन्यास ‘ब्लाइंडनेस’  में होसे न केवल अंधेपन की शारीरिक समस्याओं को उठाते है वरन मनोवैज्ञानिक परेशानियों को भी बड़ी शिद्दत और खूबसूरती से प्रस्तुत करते हैं. इसमें एक अनजान स्थान के सब व्यक्ति एक-एक करके अंधेपन का शिकार हो जाते हैं. एक पात्र को छोड़ कर. यह पात्र उनके संरक्षण, अगुआई और नरेटर का कार्य करता है. इस अंधत्व के कारण पूरा सिस्टम ठप्प पड़ जाता है. सारी व्यवस्था चरमरा उठती है. अंधत्व सीमित करता है और प्राकृतिक अवस्था की ओर ले जाता है. और होसे देखने और अवलोकन के फर्क की ओर ध्यान आकर्षित करते हैं. यह एक रूपक है. इसकी तुलना अल्बर्ट कामू के ‘प्लेग’, काफ्का के ‘ट्रायल’, विलियम गोल्डिंग के ‘लॉर्ड ऑफ द फ्लाइज़’ तथा एच जी वेल्स के ‘द कंट्री ऑफ द ब्लाइंड’ से की जाती है. कामू की तरह वे बीमारी को सामाजिक और राजनीतिक संकट के रूप में प्रस्तुत करते हैं. जब सारी व्यवस्था ठप्प हो जाएगी तब शायद हमें एक दूसरे का, प्रकृति का महत्व ज्ञात होगा. होसे की यह कृति सोचने पर मजबूर करती है. जो दृश्य वे इस पुस्तक में दिखा रहे हैं वह असम्भव तो नहीं है. अभी हम सच में अंधे हैं. यह तर्क के प्रति अंधत्व का प्रस्तुतिकरण है. वे स्वयं कहते हैं कि हम तर्किक लोग हैं. मगर खुद तार्किक तरीके से व्यवहार नहीं करते हैं. अगर हम तार्किक ढ़ंग से व्यवहार करें तो दुनिया में कोई भूखा नहीं रहेगा. यही बात कुछ दूसरे शब्दों में गुंटर ग्रास कहते हैं. गुंटर ग्रास कहते हैं कि आज हमारे पास इतनी क्षमताएँ हैं फिर भी लोग भूख से मर रहे हैं क्योंकि कोई इस समस्या का हल खोजनें में रूचि नहीं रखता है. नजीब महफूज भी दुनिया के भूखे लोगों की बात करते हैं. ब्लाइंडनेस की अगली कड़ी ‘सीइंग’ 2004 में आई.


सारामागो का मानना था कि लिखित को सही तरीके से स्कीन पर उतारना, उसके संग न्याय करना न होगा. ‘ब्लाइंडनेस’ कहानी को लेकर फिल्म बनाने के अधिकार न देने के पीछे वे एक और कारण बताते हैं. उनके अनुसार इस रचना में प्रचंड अत्याचार का चित्रण है. सामाजिक विकृतियाँ अपने चरम पर हैं. शोषण, बलात्कार का वर्णन है, जिसे पर्दे पर दिखाना, पूरी तौर पर दिखाना उचित न होगा. फिर उन्हें किसी अयोग्य हाथ में पड़ कर कृति के नष्ठ हो जाने का भी खतरा था. अतः उन्होंने मैरेलस, वूफी गोल्डबर्ग, गील ग्रासिया बेरनाल जैसे कई निर्देशकों और निर्माताओं को अपनी किताब पर फिल्म बनाने के अधिकार देने से मना कर दिया. लेकिन 1999 में निर्माता निव फिचमैन और स्क्रीनप्ले राइटर डॉन मैक्केलर ने उन्हें इस बात के लिए राजी कर ही लिया.


एक ओर दैवी (सकारात्मक) नेतृत्व है जिसमें डॉक्टर (मार्क रफालो), उसकी पत्नी (जूलिएन मूर), वैश्या (एलिस ब्रागा), चोर (मैक्केलर) मैक्केलर स्क्रीनप्ले राइटर भी हैं., बूढ़ा (डैनी ग्लोवर), एक बच्चा (मिशेल नाए) और जापानी जोड़ा (युसुके इसेया तथा योशिनो किमूरा) हैं. दूसरी ओर एक भीड़ है जिसका आसुरी (नकारात्मक) नेतृत्व मयखाने में काम करने वाला एक आदमी (गील ग्रासिया बेरनाल) कर रहा है. वह बहुत क्रूर, स्वार्थी और तानाशाह है. उसका सहायक एक लेफ्टीनेंट (मौरी शायकिन) है. सहायक की विशेषता है कि वह जन्मांध है अतः उसकी घ्राण शक्ति एवं अन्य संवेदनाएँ काफी तीव्र है. इस दल के द्वारा दूसरे दल की सारी कीमती चीजें खाने के एवज में उतरवा ली जाती है. स्त्रियों के संग क्रूर दुर्व्यवहार किया जाता है.


आसुरी प्रवृति का आसुरी अंत होता है. अंत में पूरा अस्पताल आग की चपेट में आता है. बचे हुए लोगों को बाहर आने पर काफी कठिन परिस्थितियों का सामना करना पड़ता है क्योंकि शहर नष्ठ हो चुका है. आदमी और जानवर का फर्क समाप्त हो गया है. फिल्म में बाहर से ज्यादा भीतर चल रही उथल-पुथल पर ध्यान केंद्रित किया गया है. जब भीतर का समूह बाहर आता है तब बाहर का दृश्य नजर आता है. मुसीबत के समय कायम हुआ यह परिवार जीवित रहता है. और एक दिन आता है जब उनकी दृष्ठि लौटने लगती है. इसे एक मिथक के रूप में देखा जा सकता है क्योंकि इसमें किसी भी चरित्र का कोई नाम नहीं है. इसमें वे डॉक्टर, उसकी पत्नी, चोर आदि संज्ञाओं से जाने जाते हैं. यह 2008 के कॉन फिल्म समारोह की ओपनिंग फिल्म थी. जब स्क्रीनप्ले राइटर मैक्केलर ने लेखक सारामागो से पूछा कि डॉक्टर की पत्नी जिसकी आँखें सही सलामत हैं, परिस्थिति से लड़ने में इतना वक्त क्यों लगाती है ? तो उनका उत्तर था कि वह पहले इस बात को समझती ही नहीं है कि समस्या से जूझना उसकी जिम्मेदारी है. इस बात की समझ उसे धीरे-धीरे आती है. पहले वह मात्र अपने पति की चिंता करती है. फिर अपने नए परिवार की और आगे चलकर पूरे वार्ड की जिम्मेदारी वह उठाती है. क्या आँख वाले अपना दायित्व समझने में समय नहीं लगाते हैं ? क्या सब आँख वाले अपनी जिम्मेदारी समझते हैं ? जिस दृश्य को सारामागो दिखा रहे हैं क्या वह अभी उपस्थित नहीं है ? फिल्म में ये आप्त वाक्य नहीं कहे गए हैं पर उपन्यास की समाप्ति की पंक्तियाँ दृष्ठव्य हैं, ‘‘मैं नहीं सोचता हूँ कि हम अंधे हुए थे, मैं सोचता हूँ हम अंधे हैं, अंधे मगर देखने वाले. अंधे देख सकते हैं, पर देखते नहीं हैं.’’


1997 में सारामागो ने ‘ऑल द नेम्स’ लिखा जिसमें उन्होंने काफ्का के ब्यूरोक्रेटिक भूलभुलैया को अपनी श्रद्घांजलि दी है. इसमें एक अदना-सा ऑफीसर एक नाम से ग्रसित हो कर एक अनजान औरत को खोजना प्रारम्भ करता है और इस क्रम में उसके हाथ लगती है ढ़ेर सारी गड़बड़ियाँ और ढ़ेर सारी परेशानियाँ. ‘ऑल द नेम्स’ 1997 और ‘द केव’ दोनों में सारामागो ने ब्यूरोक्रेसी के कारण व्यक्तित्व की विशिष्टता के छीजते जाने, धीरे-धीरे नष्ठ होते चले जाने को अपनी थीम बनाया गया है.


भाषा से खेलना सारामागो की एक विशिष्टता है. वे इंवर्टेड कॉमाज़ का प्रयोग नहीं करते हैं और स्वयं कहते हैं कि ‘शायद वे उपन्यासकार नहीं, बल्कि एक निबंधकार हैं जो उपन्यास इसलिए लिखता है क्योंकि उसे निबंध लिखना नहीं आता है.’ सारामगो पर विस्तार से काम करने वाले बॉब कोर्बेट के अनुसार वे हमारे समय के एक महान किस्सागो हैं. उनकी तुलना अतियथार्थवाद (मैजिक रियलिज़्म) का सफल प्रयोग करने के लिए गैब्रियल गार्षा मार्केस से की जाती है. मार्केस से उनकी तुलना यथार्थवाद को लेकर की जाती है. दोनों ही ऐतिहासिक पात्रों को काल्पनिक चरित्रों का बाना पहनाते हैं. लेकिन भाषा और विषय की दृष्ठि से वे मार्केस से भिन्न हैं. होसे सारामागो की तुलना कई अन्य महान साहित्यकारों जैसे जॉर्ज लुई बोर्गस, फ्रैंक काफ्का, फेर्नांडो पेसुआ तथा सलमान रुश्दी से भी की जाती है. कुछ आलोचक उन्हें अति बौद्घिक और तार्किक मान कर खारिज कर देते हैं. मगर खरी-खरी कहने वाले को क्या इस तरह खारिज किया जा सकता है ? कुछ लोग उन्हें निराशावादी लेखक मानते हैं. जो लोग होसे सारामागो की किताब में विराम चिह्नों को लेकर शिकायत करते हैं उनसे सारामागो का कहना है कि वे उनकी किताबें जोर-जोर से बोल कर पढ़ें क्योंकि उनकी किताबें लयात्मकता हैं जो बोल कर पढ़ने पर किताब का असली मजा देंगी. उनका कहना है कि वे मौखिक लेखन करते हैं, जैसे लोग एक दूसरे को कहानियाँ सुनाते हैं. गुंटर ग्रास के अनुसार भी लेखन ‘कहने’ की कला है.


सत्ता में बैठे लोग भले ही उनकी बातों से सहमत न हों. उन्हें खारिज करते हों, मगर वे सदा खरी-खरी कहते रहे. इसीलिए पाठक उन्हें पसन्द करता है और आने वाली पीढी के पाठक उन्हें उनके निर्भीक विचारों के लिए अवश्य पढ़ते और सराहते रहेंगे.
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विजय शर्मा,

151 बाराद्वारी, जमशेद्पुर 831001.

  ई-मेलः vijshain@yahoo.com

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  1. "स्मृति (मृत्यु) लेख लिख या पढ़ कर ..."---...स्म्रिति लेख व म्रित्यु लेख -समानार्थी नहीं-दो अलग अलग कथ्य-तथ्य हैं। म्रत्यु लेख कब्र पर लिखे आलेख को कहते हैं---स्म्रति लेख म्रत्यु पर भी होसकता है ओर जीवित स्म्रतियों पर भी ।

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