मंगलवार, 12 अक्तूबर 2010

दामोदर लाल जांगिड़ की ग़ज़लें

 

ग़ज़ल 32

खुशियां ले अंगड़ाई तो कब चुप रह पाते गीत।

दर्द उजागर हो जाते हैं गाते गाते गीत ॥

 

पायल की झंकार बने कहीं खनक चूड़ियों की,

कभी तानपूरे की तानों को दोहराते गीत।

 

रहन रखी मीठी यादों के बूढ़े हरकारे,

एक एक सिसकी से ही सौ सौ बन जाते गीत।

 

कुछ गीत अकेलेपन के होठों पर आने वाले,

सुनता देख किसी को अक्‍सर क्‍यों शरमाते गीत।

 

अगर गुदगुदा जाय मौन को छंद अचानक ही,

दिल की बात लबों पर आती वो कहलाते गीत।

 

आँचल छोड़ के निकले थे तब कितने सुन्‍दर थे,

निखर गये हैं और यहां तक आते आते गीत।

 

ग़ज़ल 57

राम, भीष्‍म, प्रहलाद, ध्रुव की कब बन पाती गाथाएं।

हैं सूत्रधार हर एक कथानक में सौतेली माताएं॥

 

किसी पराये जाये को भी अपना जान के पाला हो,

उदाहरण के लिये मिलेगी बस दो चार यशोदाएं।

 

सौतेली संतान अगर मां गंगा के भी होंती तो,

सौत पुत्र तक पहुँच ना पायेगी उसकी भी धाराएं।

 

बिन मां की संतान क्‍या जानेगी ममता के अर्थों को,

न मां की गोद में पढ़ समझेगा ममता की परिभाषाएं।

 

सुना था जिसका नाम हैं मां वो बहुत बड़े दिलवाली हैं।

पर देखी कोख के इर्द गिर्द सिमटी हृदय की सीमाएं।

 

पति की पहली बीवी की संतान को केवल ‘दामोदर‘

विवशता वश प्‍यार जताती देखी बांझ वितण्‍डाएं।

 

ग़ज़ल 36

कभी नहीं चुप रहने वाले किरदारों की खामोशी।

किसका कर्ज चुकाती होगी, अखबारों की खामोशी।

 

किसे जला कर दहक रहे ये ,या स्‍वाहा कर डालेंगे,

पता चलेगा जब टूटेगी , अंगारों की खामोशी।

 

नहीं बिकाऊ बचा हैं कोई क्‍या क्रेता कंगाल हुए,

ठाली ठाली सी बैठी जो, बाजारों की खामोशी।

 

जीने से उकतायी हैं ,या जीवन को ढूंढ़ को रही,

कितने भेद लिये फिरती हैं बंजारों की खामोशी।

 

तेल डाल जिनके कानों में, बुरी तरह धमकाया है,

सिले होंठ दिखलाती बेबस, दीवारों की खामोशी।

 

मौल भाव तय करके सौदा, किसे जुबां दे आयी हैं,

टुकर टुकर कर देख रही ,पहरेदारों की खामोशी।

 

पथराई पलकों में गूंगी पीड़ा साफ झलकती हैं,

भेद को भेद रख पायी हैं हरकारों की खामोशी।

 

इसकी उसकी या फिर उनकी या दामोदर तेरी भी,

अलग थलग हैं खुद ब खुद में हम चारों की खामोशी।

 

ग़ज़ल 12

कविता में पूरी की पूरी ।

रह जाती हैं बात अधूरी॥

 

नहीं पटी हैं किसने पाटी,

भावों से शब्दों की दूरी

 

सारी कागज पर लिख डालो,

पीड़ा कब देती मंजूरी ।

 

अर्थों की बैसाखी ढूंढें,

कथ्‍यों की कैसी मजबूरी।

 

हर कोई पढ़ कर 'पुरुषोत्तम'

समझ भी जाये नहीं जरुरी।

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दामोदर लाल जांगिड.

पो0लादड़िया

नागौर राज

1 blogger-facebook:

  1. अगर गुदगुदा जाय मौन को छंद अचानक ही,
    दिल की बात लबों पर आती वो कहलाते गीत।

    सच्ची परिभाषा गीत की| बधाई दामोदर भाई|
    http://thalebaithe.blogspot.com

    उत्तर देंहटाएं

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