गुरुवार, 14 अक्तूबर 2010

हरि विठ्ठल दुबे धूमकेतु की हास्य कविता – यदि रावण संपादक होता

 

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लंकाधिपति रावण यदि संपादक होता

खबर छपाने में विभीषण छाती पीट के रोता।

 

उप सम्पादक मारीच होते तस्कर प्रमुख प्रभारी

सूर्पणखा युवकों की होती शील भंग अधिकारी।

 

सतर्कता संबंधी खबरें कुंभकरण को जाती

संपादक पुत्र मेघनाथ की पौबारा हो जाती।

 

ताड़का जी को जो जो लेखक सदचरित्र बतलाते

मौका मिलते ही रावण से सम्मानित हो जाते।

 

सही खबर छप जाने पर खेद प्रकाशन आते

कैसे छपी, किसने छपवाई, जाँच आयोग बिठाते।

 

राजा खरदूषण दलालों से मिलकर दलाली खाते

विज्ञापन की शुद्ध आय से रावण टाइम्स चमकाते।

 

सारा मीडिया तब प्रशस्ति में बनता रटन्तु तोता

लंकाधिपति रावण यदि संपादक होता।

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7 blogger-facebook:

  1. बस फिर तो बात ही कुछ और होती…………बहुत सुन्दर ।

    आपकी रचनात्मक ,खूबसूरत और भावमयी
    प्रस्तुति कल के चर्चा मंच का आकर्षण बनी है
    कल (15/10/2010) के चर्चा मंच पर अपनी पोस्ट
    देखियेगा और अपने विचारों से चर्चामंच पर आकर
    अवगत कराइयेगा।
    http://charchamanch.blogspot.com

    उत्तर देंहटाएं
  2. infact maja nhi aaya/ jab aapne kaha ki hasye kavita he,to kam se kam kuch punches to hone hi chahiye, mujhe un punches ka abhav laga, meri apni rai he, aur bhi achha ho sakta tha

    likhte rahiye

    उत्तर देंहटाएं
  3. रामायण के चरित्रों को बिम्ब बनाकर व्यंग से लबरेज़ अच्छी कविता के लिये शत शत मुबारकबाद।

    उत्तर देंहटाएं

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