शनिवार, 30 अक्तूबर 2010

मनोज भावुक की भोजपुरी ग़ज़लें

manoj bhavuk                              

1-
दीपावली हs जिन्दगी, हर साँस हs दिया
अर्पित हरेक सांस बा तहरे बदे पिया

 
सूरज त साथ छोड़ देवे सांझ होत ही
हमदर्द बन के मन के मुताबिक जरे दिया

 
आघात ना लगित त लिखाइत ना ई ग़ज़ल
ऐ दोस्त! जख्म देल तू,  अब लेलs शुक्रिया

 
भीतर जवन भरल बा, ऊ तs दुख हs, पीर हs
अब के तरे कहीं भला हम गजल इश्किया

 
तोहरा हिया में दर्द के सागर बसल बा का
कुछुओ कहेलs तू तs ऊ लागेला मर्सिया

 
कुछ बात एह गजल में समाइल ना, काहे कि
ओकरा मिलल ना भाव के अनुरूप काफिया

 
ठंड़ा पड़ल एह खून के खउले के देर बा
‘भावुक’ हो एक दिन में सुधर जाई भेड़िया 

 
2-
वक्त रउओ के गिरवले आ उठवले होई
छोट से बड़ आ बड़ से छोट बनवले होई

 
अइसे मत देखीं हिकारत से एह चिथड़ा के
काल्ह तक ई केहू के लाज बचवले होई

 
धूर के भी कबो मरले जो होखब ठोकर तs
माथ पर चढ़ के ऊ रउआ के बतवले होई

 
जे भी देखियो के निगलले होई जीयत माछी
अपना अरमान के ऊ केतना मुअवले होई

 
काश ! अपराध के पहिले तनी सुनले रहितीं
आत्मा चीख के आवाज़ लगवले होई

 
जिंदगी कर्म के खेला ह कि ग्रह-गोचर के
वक्त रउओ से त ई प्रश्न उठवले होई

 
जब मेहरबान खुदा ,गदहा पहलवान भइळ
अनुभवी लोग ई लोकोक्ति बनवले होई

 
अइसहीं ना नू गजल-गीत लिखेलें भावुक
वक्त इनको के बहुत नाच नचवले होई

 
                           3-
उचरे लागल हमरो छान्हीं काग ए बाबा
लागत बा कि हमरो जागी भाग ए बाबा

 
अउरो निखरी, चमकी तप के ,सोना हs जिनगी
लागत बा त  लागे   दींहीं   आग ए बाबा

 
मारे के त मरनी अंगना- दुअरा, चौखट पर
कइसे मारीं मनवा में के नाग ए बाबा

बइठे त बइठे आपस में ताल-मेल कइसे
सभे अलापे आपन-आपन राग ए बाबा

 
दूध ज़हर लागेला, दारू अमृत लागेला
लइकइयें में मुंह से निकले झाग ए बाबा

 
साबुन से त धुलिये जाई  देहिया  के, बाकिर
कइसे धोईं दिलवा पर के दाग ए बाबा

 
‘बेबीकेयर ‘ में बच्चा पोसाला जइसे कि
अंडा पारे कोयल सेवे काग ए बाबा

 
नींद लगे आ भूख लगे आ मन में रहे सकून
भलहीं रहीं पलानी, खाईं साग ए बाबा

 
भावुक कइसे जीयत बाडन, अचरज में बा सब
गोड़वो तर बा, मथवो पर बा आग ए बाबा

 
4-
भटकावे जाने कहां -कहां हिरनीला मन बउराइके
पतई मतिन अनजान राही बढ़त रहे उधियाइके

 
दउडे़ला लोग त आहे पर हहुआइके, खखुआइके
तनी जांच के जे बढ़े ना ऊ फंसे जाल में जहुआइके

 
हमरा बुझाला कि जिंदगी चलते रहे के रिवाज हs
अब जे तरे रउआ चलीं खिसिआइके, मुसुकाइके

 
ना बहिर भइल कबो गूंग ना, ई त आंख हs, हवे आइना
हर हाल के कर दे बयां मुसुकाइके, अगिआइके

 
कबो लोभ में, कबो क्रोध में, कबो मोह में, कबो माया में
अइसे फँसल कि छुटल ना फिर जिनगी रहल छपिटाइके

 
मन प्यार के रसरी रहे, फँसरी बनल अब जान के
एमें गाँठे-गाँठ बा पड़ गइल अझुराइके, सझुराइके

 
अब जिंदगी से हीं जिंदगी के बा खौफ एतना कि जिंदगी
सल्फास खाइके मर गइल छपिटाइके, अकुताइके

 
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2 जनवरी 1976 को सीवान (बिहार) में जन्मे और रेणुकूट (उत्तर प्रदेश ) में पले- बढ़े मनोज भावुक भोजपुरी के सुप्रसिद्ध युवा साहित्यकार हैं। पिछले 15 सालों से देश और देश के बाहर (अफ्रीका और यूके में) भोजपुरी भाषा, साहित्य और संस्कृति के प्रचार-प्रसार में सक्रिय भावुक भोजपुरी सिनेमा, नाटक आदि के इतिहास पर किये गये अपने समग्र शोध के लिए भी पहचाने जाते हैं। अभिनय, एंकरिंग एवं पटकथा लेखन आदि विधाओं में गहरी रुचि रखने वाले मनोज दुनिया भर के भोजपुरी भाषा को समर्पित संस्थाओं के संस्थापक, सलाहकार और सदस्य हैं। तस्वीर जिंदगी के( ग़ज़ल-संग्रह) एवं चलनी में पानी ( गीत- संग्रह) मनोज की चर्चित पुस्तके हैं। ‘तस्वीर जिन्दगी के’ तो इतना लोकप्रिय हुआ कि इसका दूसरा संस्करण प्रकाशित किया जा चुका है और इस पुस्तक को वर्ष 2006 के भारतीय भाषा परिषद सम्मान से नवाज़ा जा चुका है। एक भोजपुरी पुस्तक को पहली बार यह सम्मान दिया गया है।


अभी हाल ही में भाऊराव देवरस सेवा न्‍यास,लखनऊ द्वारा मनोज भोजपुरी भाषा में उल्‍लेखनीय योगदान के लिए पंडित प्रताप नारायण मिश्र स्‍मृति-युवा साहित्‍यकार सम्‍मान २०१० से नवाजे गए हैं.

 
सम्प्रति -Creative Head,Hamar Tv,NOIDA

ई मेल-manojsinghbhawuk@yahoo.co.uk
बेबसाइट- WWW.MANOJBHAWUK.COM

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