मंगलवार, 26 अक्तूबर 2010

कृष्‍ण कुमार चन्‍द्रा की हास्य – व्यंग्य कविता – महंगाई कथा

महंगाई कथा

कैसे चले गुजारा बाबा, इस महंगाई में।

चौकी के संग चूल्‍हा रोये, इस महंगाई में।

 

बैंगन फिसल रहा हाथों से,

कुंदरु करे गुमान।

चुटचुटिया कहने लगी,

मै महलों की मेहमान।

भाजी भौहें तान रही है, इस महंगाई में।

 

मुनिया दूध को रोती है,

मुन्‍ना मांगे रोटी।

पीठ तक जा पहुंचा पेट,

ढीली हुई लंगोटी।

चुहिया भी उपवास रहे अब, इस महंगाई में।

 

शासन पर राशन है भारी,

ये कैसी है लाचारी।

काले धंधे, गोरख धंधे,

और जमाखोरी जारी।

चीनी भी कड़वी लगती है, इस महंगाई में।

 

मन का दीपक जलता है,

बिन बाती बिन तेल।

कहीं दिवाली, कहीं दिवाला,

पैसे का सब खेल।

तन के भीतर आतिशबाजी, इस महंगाई में।

 

----

कृष्‍ण कुमार चन्‍द्रा

2 blogger-facebook:

रचनाओं पर आपकी बेबाक समीक्षा व अमूल्य टिप्पणियों के लिए आपका हार्दिक धन्यवाद.

स्पैम टिप्पणियों (वायरस डाउनलोडर युक्त कड़ियों वाले) की रोकथाम हेतु टिप्पणियों का मॉडरेशन लागू है. अतः आपकी टिप्पणियों को यहाँ प्रकट होने में कुछ समय लग सकता है.

------------------------------------------------------------

प्रकाशनार्थ रचनाएँ आमंत्रित हैं...

1 करोड़ से अधिक पृष्ठ-पठन, 1.5 लाख गूगल+ अनुसरणकर्ता, 1500 से अधिक सदस्य

/ 2,500 से अधिक नियमित ग्राहक तथा 2000 से अधिक फ़ेसबुक प्रसंशक
/ प्रतिमाह 10,00,000(दस लाख) से अधिक पाठक
/ 10,000 से अधिक हर विधा की साहित्यिक रचनाएँ प्रकाशित
/ आप भी अपनी रचनाओं को इंटरनेट के विशाल पाठक वर्ग का नया विस्तार दें, आज ही नाका से जुड़ें. नाका में प्रकाशनार्थ रचनाओं का स्वागत है.किसी भी फ़ॉन्ट, टैक्स्ट, वर्ड या पेजमेकर फ़ाइल में रचनाएँ rachanakar@gmail.com पर ईमेल करें. अधिक जानकारी के लिए यह लिंक देखें - http://www.rachanakar.org/2005/09/blog-post_28.html

विश्व की पहली, यूनिकोडित हिंदी की सर्वाधिक प्रसारित, समृद्ध व लोकप्रिय ई-पत्रिका - नाका

मनपसंद रचनाएँ खोजकर पढ़ें
गूगल प्ले स्टोर से रचनाकार ऐप्प https://play.google.com/store/apps/details?id=com.rachanakar.org इंस्टाल करें. image

--------