शनिवार, 2 अक्तूबर 2010

राजीव श्रीवास्तवा की कविताएँ

 rajeev shrivastava

एक किसान की मौत

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खाली बर्तन ,खाली डिब्बों

को देखआज, किसान रोता है,

कोई सूखी रोटी ख़ाता,

कोई खाली पेट सो जाता है!

 

अन्नदाता आज अन्न

को मोहताज है,

दाने-दाने को तरस रहा

ये विनाश की आगाज़ है!

 

खून पसीना एक कर,

खेतो पे अरमान बोए थे,

साहूकार से ले के कर्ज़ा,

कुछ सपने संजोए थे!

 

ज्यो-ज्यो फसल बड़ी हुई,

सपनो ने नया रूप लिया,

इस बार भर पेट खाएँगे,

बच्चो को आश्वस्त किया!

 

फिर एक रात आँधी,

पहुँची बन के काल,

धरा पे खूब तांडव किया,

बुना मौत का जाल!

 

अपनी आँखों के सामने,

देखा फसल हुई बर्बाद,

बच्चो से आँख मिला ना पाया,

साहूकार की आई याद!

 

बेबस और लाचार खड़ा,

मदद को कोई ना आया,

फाँसी पे वो झूल गया,

मौत को गले लगाया!

---

बाल मजदूर

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बर्तनों के ढ़ेर के बीच,

बैठा एक अबोध बालक,

हाथों में साबुन की टिकिया,

अपने नन्हे नन्हे हाथो को

बर्तनों पे ज़ोर से फेरता

और खूब तेज़ी से घूमता

जैसे उन बर्तनों में तलाश रहा हो

अपने बचपन को

जिसे इन्होंने ही काफ़ी पहले

लील लिया है!

 

अपने पैरों को बह रहे पानी

पे ज़ोर से मरता और

फिर एक मंद सी मुस्कान

देता,यही तो इसके बचपन

के खेल है,यही इसके दोस्त है

फिर पीछे से एक कर्कश

आवाज़ आती है---मर गया क्या?

और कई अपशब्दों की बौछाऱ

इन्हीं अपशब्दों में इसका असली

नाम कही खो गया है!

 

कपड़े के नाम पर शरीर

से लिपटे कुछ चीथड़े

पैबंद इतने की कपड़े की

असलियत इनमें छिप गयी

चप्पल क्या होती है

पैरों को पता नहीं!

 

एक टेबल से दूसरे टेबल

साहब को चाय दो,

दो नंबर को ब्रेड,

यहाँ ठीक से साफ कर

और अगर कोई भी ग़लती, तो

इससे पहले की ग़लती का अहसास हो

पड़ गये कई लात और घूंसे!

 

थक हार के जब भूख लगती है

तो दो रोटी और दाल

और साथ मैं गलियाँ---

जल्दी खा,खूब चर्बी चढ़ गयी है

काम तेरा बाप करेगा!

 

बाप तो कब का छोड़ गया

माँ पेट नहीं भर सकती थी

सो छोड़ दिया ,ये कह कर के

उपर वाले ने पेट दिया है तो

खाना भी देगा,इसी पेट की भूख

मिटाने मैं बचपन हजम हो गया

पढ़ाई स्वाहा हो गयी,--------!

 

ये है दशा एक बाल मजदूर की

ऐसे ही कितने मजदूर, देश

के हर चौराहे पे,हर कारखाने मैं

हर होटल में अपने देश की वास्तविक

तरक्की को बयाँ करते हैं----------!

 

---

अनचाही बच्ची

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झाड़ियों के झुरमुट मैं पड़ी एक बच्ची लाचार ,

एक गोद पाने का कर रही इंतज़ार !

 

जननी उसे अपना नहीं सकी,और दिया फेंक ,

अंबर भी रो रहा उसकी ऐसी हालत देख !

 

आज धरा पे पड़ी बेबस ,कर रही पुकार,

कोई तो अपनाओ ,ना समझो बेकार !

 

कई आँखों ने देखा उसे और किया अफ़सोस ,

नहीं बढ़ाया हाथ थामने को, बस था तोड़ा रोष !

 

उसके चेहरे पर भय था,और रही थी ठिठुर ,

अपने ही औलाद को छोड़ा,कैसे थे निष्ठुर् !

 

देखो किसी की भूल की सज़ा इसे मिली ,

फेंका इसको और कहा चलो बला टली !

 

कुछ हाथ बढ़े आगे सोचा की गले लगाए ,

पर समाज के रीति रिवाज से कैसे पार पाए !

 

देखो एक इस्त्री का जहा होता है तिरस्कार ,

लोग"भारत माता की जय" की लगा रहे पुकार !

 

बात आपको कही,है, मैंने एकदम सच्ची ,

दिल से पूछिऐ,कौन अपनाता है, ऐसी बच्ची !

--

डॉक्टर राजीव श्रीवास्तवा

©Copyright reserved by author

9 blogger-facebook:

  1. ओह ..सारी कविताएँ बहुत मर्मस्पर्शी ....

    उत्तर देंहटाएं
  2. सारी कवितायें दिल को झंझोड़ने वाली हैं, "बाल मज़दूरी पर लिखी कविता" शायद आंसुओं से लिखी गई है इसलिये सबसे दमदार लग रही है।

    उत्तर देंहटाएं
  3. Rajeev ji dil ko chhune vaalee kavitaaen hain !

    उत्तर देंहटाएं
  4. समाज के नाजुक कोनों की ओर कवि का ध्यान आकृष्ट हुआ है। संवेदनशील भावों और मार्मिक शब्दों के माध्यम से कवि अपनी बात पाठकों के समक्ष रखने में सफल हुए हैं।

    उत्तर देंहटाएं
  5. चर्चा मंच के साप्ताहिक काव्य मंच पर आपकी रचना 5-10 - 2010 मंगलवार को ली गयी है ...
    कृपया अपनी प्रतिक्रिया दे कर अपने सुझावों से अवगत कराएँ ...शुक्रिया

    http://charchamanch.blogspot.com/

    उत्तर देंहटाएं
  6. राजीव जी ने तो नब्ज़ पर हाथ रख दिया……………हर रचना झकझोर देती है …………हम खुद से भी आंख नही मिला पायेंगे।

    उत्तर देंहटाएं
  7. http://charchamanch.blogspot.com/2010/10/19-297.html

    यहाँ भी आयें .

    उत्तर देंहटाएं
  8. मार्मिक ... ग़ज़ब की संवेदना लिए हैं सब रचनाएँ ... कुछ अनछुए पहलुओं को प्रभावी तारएके से उठाया है ....

    उत्तर देंहटाएं
  9. राजीव जी आप की सभी कविताये ह्र्दयस्पर्शी और संवेदनशील है .....

    उत्तर देंहटाएं

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