मंगलवार, 19 अक्तूबर 2010

देवी नागरानी की पुस्तक समीक्षा - “रायगाँ नही हूँ मैं “ बेमिसाल नगीना जो यादों से गुज़रकर सांसो में जड़ गया है

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रायगाँ नही हूँ मैं बेमिसाल नगीना जो यादों से गुज़रकर सांसो में जड़ गया है

मैं अपना आप कहीं और छोड़ आई हूँ /जहाँ पे रहती है शायद वहाँ नहीं हूँ मैं.
मैं सोचती हूँ तो दिल को तसल्ली होती है /किसी के हिज्र में हूँ रायगाँ नहीं हूँ मैं.
शायरा अनंत कौर के दिल से जैसे एक हुंकार उठी हो, ऐसे जैसे कोई तन्हा वादियों में खोकर अपने आप को, अपने वजूद की तलाश में बहुत आगे निकल जाए और तन्हाइयों से गुफ़्तगू करते हुए अपने आत्मविश्वास के बल से यहा कह उठे......

मुझे संभाल कर रखा है तेरी यादो ने / थकान की धूप में बे-सायबां नहीं हूँ मैं

अनंत कौर को पढ़ना जितना आसान लगा, समझना उतना ही कठिन. सबसे हटकर एक नया रंग शायरी का उभर आया है. अमरीका के क्षितिज पर जहाँ ऐसे चमकते दमकते सितारे झिलमिलाकर लुप्त हो जाते है, वहीं पर यादों की चादर ओढ़कर शायरा निरंतर ज़िदगी की सहरा में सफ़र कर रहीं है. वह तो अपने स्तर का एक बेमिसाल नगीना है जो उसकी यादों से गुज़रकर सांसो में जड़ गया है जहाँ उसे अपनी पहचान का यकीन हासिल हुआ है, अपने अस्तित्व का जो एक मक़सद को सामने रखकर वह इस सफ़र पर निकली है, उस भरोसे की चाल को देखिए इस शेर में उनके तेवर...

तेरे ख़याल के साँचे में ढलने वाली नहीं /मैं खुश्बुओं की तरह अब बिखरने वाली नहीं.
तू मुझे मोम समझता है पर ये ध्यान रहे /मैं एक शम्अ हूँ लेकिन पिघलने वाली नहीं.

और इसी हौसले की शिद्दत महसूस होती है जब वह अथक प्रयासों से ज़माने से जूझते हुए कहती है....

तिरे लिए मैं ज़माने से लड़ तो सकती हूँ /तिरी तलाश में घर से निकलने वाली नहीं

यक़ीनन अनंत और कोई ऐसा रास्ता ढूढने में कामयाब हुई है जिसका कोई अंत नहीं. भ्रम और हक़ीक़त के इस फ़ासले से वह बखूबी वाकिफ़ है और उसी पर पांव टिकाए खड़ी है टस से मस नहीं होना चाहती, चाहे उसे अपने मक्सद के लिए जितना भी जूझना पड़े, इंतज़ार करना पड़े- शायद उसे विश्वास है कि मंज़िल उसकी ओर मुंह ताके खड़ी है ओर उसे वहीं पर मिलेगी जहाँ पर वह खड़ी है. एक अनूप विश्वास की झलक जो शिदत से दर्शाती है सत्यम,शिवम.सुन्दरम!

अनंत की ज़बान में उर्दू भाषा की मिठास घुल-मिल रही है जो उसके शेर में घुली सी नज़र आती है. उसी का यकीन मुहम्मद नदीम भाबा के लफ़्ज़ों से जाहिर है जो अनंत की शायराना सलाहियतों के कायल है. लीजिए उनकी ज़ुबानी सुनें यह बयाँ, " मेरे ख़्याल में ग़ज़ल एक सहराई (मरुस्थली) पौधे की तरह होती है जो पानी की कमी के बावाजूद भी अपने नवशोनुमा (विकास) जारी रखता है और लोगों को अपनी तरफ मतवज्जेह करता है. आहिस्ता -आहिस्ता हिन्दुस्तानी शेरा ने ग़ज़ल की तरफ़ रूजू करना शुरू किया और बहुत से शायर हमारे सामने आए जो ग़ज़ल की माँग संवारने लगे और एक बार फिर ग़ज़ल का किला मज़बूत होता चला गया. अनन्त साहिबा का तालुक भी शोरा के इसी कबीले से है जिन्होंने रात- दिन मेहनत करके ग़ज़ल का ये वारा और अदब के संजीदा कारीन को अपनी तरफ मतवज्जाह किया. उनके हर शेर में एक तजुरबे का निचोड़ है जो एक नारी, घर के अंदर और बाहर की ज़िन्दगी के परिवेड में जीती है, बहुत ही मुश्किल हालात से गुज़रते हुए, कुछ अनकहे अहसासात क़लम की ज़ुबानी......

बात पहुंची मिरी उसके होंटों तलक/ अब मिरे साथ है रायगानी मिरी.

तुझसे बिछड़ी हूँ लेकिन मैं तन्हा नहीं /अब मिरे साथ है रायगानी मिरी

अनंत का एक अपना मुकाम है जहाँ उसकी दिलकश शायरी के शिखर की ऊँच्चाइयों पे खड़ी है, वहाँ पर एक नये आसमान का शितिज अपनी खुली बाहों से उसके स्वागत के लिए मुन्तज़र है. दोनों एक दूजे की सिवा मुकम्मल नहीं हो पाते. बिछड़कर मिलने के मंज़र को देखें किस हौसले के साथ शायरा बयाँ कर रहीं है...

तरा कतरा बर्फ की सूरत पिघलती जाएगी /रूह मेरे जिस्म से एक दिन निकल ही जाएगी.
हम परिंदो की तरह आए तेरी दुनिया में /हमको अपनों की तरह सिर्फ़ शजर देखेंगे

लौट कर आई हूँ पलट कर मैं तिरे आँगन से/ इस गुमाँ से कि मुझे तूने पुकारा होगा

सोच की उड़ान परिदो के परों में एक विश्वास फूँक देती है और वो ऊँच्चाइयों की ओर उड़ने की तमन्ना में अपने आस पास के सभी खौफ़ ख़तरो से ना वाकिफ़ हो जाते है. बस लक्ष्य सामने होता है औरकुछ नहीं....

अब तो मैं एक ही उम्मीद पे जीती हूँ 'अनंत ' /मेहरबाँ मेरा खुदा मुझ पे दुबारा होगा
तेरी ख़्वाहिश में मर नहीं सकते /जिंदगी की ये कैसी साजि़श है /इस लिए गमज़दा नहीं हूँ मैं /ये जुदाई किसी की ख़्वाहिश है

अपना लक्ष्य सामने रखकर अच्छाईयों को छुपाने की तमन्ना ही अनंत कौर के मन रूपी परिंदे को होसले अता करते है, जिसे एक सही रह मिल गयी है, आइये सुनते है उसकी रूह की गहराइयों से निकलने वाली इस गूँज को उसी की ज़ुबानी.......

मैं तो अपना वजूद ढूँढती हूँ /दिन के इस बेवफ़ा अंधेरे में

मैं जन्म लेने से ही पहले बहुत /अपने अस्तित्व को गवाती हूँ

मैं जन्म ले भी लू अगर तब भी /पैदा होते ही दफ़न होती हूँ

बहन हूँ ,माँ हूँ और बेटी हूँ /फिर भी तस्वीर बेबसी की है

जिंदा रहना अज़ाब है मुझको /और मैं जिंदा रहना चाहती हूँ
मैं जनाब कमर रज़ाशहज़ाद के सुर में सुर मिलाकर इतना ही कह सकती हूँ, कि अनंत कौर एक ऐसी शायरा है जिसकी बुनियादी शनाख़्त उसकी शायरी है. वो बेरन (गैर) मूल्क में मकीं होने के बावजूद किसी अदबी सियासत में मुलव्वस हए बगैर तख़्लीकी सरगर्मियों में मसरूफ़ है "रायगाँ नहीं हूँ मैं" अनंत कौर की सफ़लता की पहली सीडी है जिसका पड़ाव कहीं दूर दूर तक नज़र नहीं आता. हर दिल की दहलीज़ पर दस्तक देकर अपनी पहचान बनता हुआ और आगे बढ़ता हुआ कारवाँ बने इसी शुभकामना के साथ साथ मेरी दुआ उसे सफ़लता की मंज़िल की ओर ले जाए. शिद्दत के शिखर पर आवाज़ की प्रितिधव्नी उस उत्तमता को प्रकट कर रही है..हाथ उठाकर तिरे आवाज़ पे आमीन कहा/ लोग अब मेरी दुआओं का असर देखेंगे. आमीन!

clip_image006 समीक्षकः देवी नागरानी

न्यू जर्सी, यू. एस. ए. Dec 9, 2009 , dnangrani@gmail.com

ग़ज़ल संग्रहः रायगाँ नहीं हूँ मैं, शायराः अनंत कौर, पृष्ठः११८, कीमतः १२० रुपये, प्रकाशकः लेखिका, पब्लिकेशनः इन्डसट्रियल फोकल पाइंट, अम्रतसर.

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