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अवनीश सिंह चौहान की कविता – अब तो जागो

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अब तो जागो!
कौन देख रहा है
हमारे बहते आंसू
लहूलुहान मन
और तन
जिस पर
करते आये हैं
प्रहार
जाने कितने लोग
सदियाँ गुजर गयीं
पीड़ाएँ भोगती रहीं
हमारी पीढियां
हमने
फल दिए
फूल दिए
और दीं
तमाम औषधियां
फिर भी
हम रहे
उपेक्षित
पीढित
अपने ही घर में
अपनों के ही बीच
अब तो जागो-
हे कर्णधारो!
क्योंकि
हम बचेंगे
तो बचेगा
धरा पर
जल और जीवन.---
परिचय
अवनीश सिंह चौहानजन्म: 4 जून, 1979, चन्दपुरा (निहाल सिंह), इटावा (उत्तर प्रदेश) में
पिता का नाम: श्री प्रहलाद सिंह चौहान माताका नाम: श्रीमती उमा चौहान
शिक्षा: अंग्रेज़ी में एम०ए०, एम०फिल० एवं पीएच०डी० (शोधरत्) और बी०एड० प्रकाशन: अमर उजाला, देशधर्म, डी एल ए, उत्तर केसरी, प्रेस-मेन, नये-पुराने, गोलकोण्डा दर्पण, संकल्प रथ, अभिनव प्रसंगवश, साहित्यायन, युग हलचल, यदि, साहित्य दर्पण, परमार्थ, आनंदरेखा, आनंदयुग, कविता कोश डॉट कॉम, सृजनगाथा  डॉट कॉम, अनुभूति डाट काम, हिन्द-युग्म डॉट कॉम, रचनाकार, साहित्य शिल्पी , पी4पोएट्री डॉट कॉम, पोयमहण्टर डॉट कॉम, पोएटफ्रीक डॉट कॉम, पोयम्सएबाउट डॉट कॉम, आदि हिन्दी व अंग्रेजी के पत्र-पत्रिकाओं में आलेख, समीक्षाएँ, साक्षात्कार, कहानियाँ, कविताओं एवं नवगीत…

शशांक मिश्र ‘‘भारती'' की गजलें

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एकः-विश्‍वास रूपी दीपक जो जलाते रहें, मंजिल की समीपता आप पाते रहें। गीत विश्‍वासों के निःस्‍वर होते नहीं, सुबह के प्रिय दृश्‍य आप गाते रहें। हृदय की कुण्‍ठा का पास आना क्‍या, सत्‍य पर निष्‍ठा जब तक बनाये रहें। तृष्‍णा के बढ़ने से होता भी क्‍या है, सिन्‍धु सच का जब तक लहराता रहे। छोड़ सभी मनोविकारों को अपने, राग विश्‍वासों के यूं ही गाते रहे॥ दोः------- गैर जो कभी थे वे अपने लगे हैं, बिछुड़े हुए साथी भी मिलने लगे हैं। जैसा कि कुछ किसी से मैंने न चाहा, वह दोष अपने बताने लगे हैं। उनके तरफ की जो अड़चने हैं, मित्रों में भेदभाव मिटने लगे हैं। गैर जो कभी थे यहां तक आ गए, खुशियों के सपने संजने लगे हैं। दुश्‍मनी भुलाने का मौका जो देखा, कई लोग मौके पर बढ़ने लगे हैं। बढ़ते कदमों को इनके जो देखा, स्‍वजन भी मन में हंसने लगे हैं। आने के वायदे किये जिसने भारती', दोस्‍ती के रिश्ते भी फलने लगे हैं॥ -- शशांक मिश्र ‘‘भारती'' दुबौला-रामेश्‍वर पिथौरागढ़

राजीव श्रीवास्तवा की कविताएँ - नतीजा आया और खुद को वो एच .आई .वी पॉज़िटिव पाया!

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बालविवाह -एकबेईमानीगुड़ियों के संग खेलती, चिड़िया सी चहक रही, माँ -बापू की लाड़ली, फूलों सी महक रही! छोटे-छोटे हाथों से, मिट्टी का घर बना रही, साजो-समान रख, रंगों से सज़ा रही! आज खूब सजी-धजी, फिर भी रो रही, सखियाँ बता गयी, की उसकी शादी ही रही! माँ का आँचल पकड़, उससे प्रश्न कर रही, क्या खता हो गयी, जो आज विदा हो रही! बापू के पांव पकड़, प्रार्थना वो कर रही, ना भेजो घर दूजे, फूट-फूट रो रही! मासूम सी कली, आज कैसी ढल गयी, खेलने के दिन थे, खुद खेल बन गयी! अग्नि के चहुं दिशा, सात बार घूमती, कुंड में स्वाह हो रहे, बचपन को ढूंढती! विवाह की रीति से, अबोध अंजानी है, रोक दो ये शादी, ये शादी बेईमानी है! --- एच . आई .वी- पॉज़िटिवअशांत मन,खुद से घृणा ग्लानि,भय,अफ़सोस और ऐसे कई सारे भाव से लिप्त एक युवक,प्रयोगशाला के द्वार पर बैठा,एक नतीजे का इंतज़ार कर रहा था! कुछ समय पूर्व मतिभ्रष्ट पदभ्रष्ट होकर ,यौवन की आँधी में बहकर, परिणाम से बेख़बर एक दुष्कर्म कर बैठा था! आज पहली बार प्रभु से विनती कर रहा था,की इस परिणाम में असफल हो जाए,पर नतीजा आया और खुद को वो एच .आई .वी पॉज़िटिव पाया! एक पल मे मानो ,जिंदगी …

मालिनी गौतम की कविताएँ - मेरे बच्चे, होस्टेल में तुम्हारा सामान जमाते समय मैं कुछ छोड़कर आई हूँ तुम्हारे लिये…

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परवरिश सबेरे की हल्की बारिश में नहाई हुई सुबह के माथे पर अब चमकने लगी है सोनेरी सूरज की बिदिंया अलसाये से शरीर को लिये मैं बैठी हूँ बगीचे में और देख रही हूँ एक चिड़िया और उसके छोटे से बच्चे को चिड़िया फुदक-फुदक कर बड़ी सतर्कता से चारों तरफ देखकर चोंच नीचे झुकाकर दाना उठाती है और पीछे-पीछे आ रहे बच्चे के मुँह में डाल देती है एक मूक पक्षी में भी समझ है अपने बच्चे की परवरिश करने की और मेरी आँखों के सामने छा जाता है कपड़ों में लिपटा हुआ एक नवजात शिशु जिसे एक अभागन माँ छोड़ गई है गाँव के बाहर झाड़ियों में एक पाती मुक्तक के नाम मुक्तक, मेरे बच्चे, आज तुम फिर चले गये मेरे मन को रीता-रीता करके। स्कूल के गेट पर विदा लेते हुए, हाथ हिलाते हुए तुम्हें कुछ कहना चाहती थी पर कह नहीं पाई। मेरे बच्चे, होस्टेल में तुम्हारा सामान जमाते समय, तुम्हारा बिस्तर लगाते समय, मैं कुछ छोड़कर आई हूँ तुम्हारे लिये, तुम्हारे पसंद के नाश्ते के डब्बे के साथ वहीं पास में रखकर आई हूँ एक छलकता हुआ घड़ा जो भरा हुआ है मेरे प्रेम और स्नेह के जल से। बेटा, जब कभी किसी परेशानी से तुम निराश ह…

राजीव श्रीवास्तवा की कविताएँ

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एक फ़ौजी की कहानीआया बुलावा धरती माँ का , जब दुश्मन ने ललकारा, चल दिया वीर सब को छोड़ , जब माँ ने उसे पुकारा! सारे रिश्ते छोटे पड़ जाते , जब माँ होती परेशान, बढ़ गया अकेला शूरवीर, अपना सीना तान! पत्नी ने लगाया तिलक , और कहा जम के करो सामना , बच्ची लिपट रोने लगी , बोली पापा जल्दी घर आना ! नम आँखों से ली विदाई , पर दिल मे था आक्रोश , अपने वतन की करने को रक्षा , रगों में था जोश ! चल दिया सरहद की ओर पूरा करने अपना फर्ज़ अब जान की परवाह नहीं चुकाना है माँ का कर्ज़ अस्त्र -शस्त्र से हो के लैस , बढ़ चला दुश्मन की ओर , मार-मार के चित किया , दिखा दिया बाजुओं का ज़ोर ! विजय मिली फहराया तिरंगा , बढ़ाया धरती माँ का मान , अचानक एक गोली लगी सीने में , और निकली वीर की जान ! मरने से पहले साथियों से , घर भिजवाया समाचार , ये जन्म रहा धरती माँ के नाम , अगला तुम पे रहा उधार ! शहीद हो गया एक और वीर , खुशी-खुशी दे दी अपनी जान , शहीद के मरने पर गर्व करो , आँसू बहा के ना करो अपमान ! हे वीर आज नम आँखों से , मैं करूं तुझे सलाम , तू ही देश का सच्चा प्रेमी , जो भारत माँ के लिए दे दी अपनी जान-----जय हिंद ! --- गा…

संजय दानी की ग़ज़ल – मेरे क़ातिल का मुझे कोई पता दो या उसे मेरी तरफ़ से दुआ दो

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सज़ा दो
मेरे क़ातिल का मुझे कोई पता दो,
या उसे मेरी तरफ़ से दुआ दो।मैं चराग़ों की हिफ़ाज़त कर रहा हूं,
बात ये सरकश हवाओं को बता दो।बेवफ़ा कह के घटाओ मत मेरा कद,
है वफ़ा की चाह तो ख़ुद भी वफ़ा दो।छोड़ कर जाने के पहले ऐ सितमगर,
इक अदा सच्ची मुहब्बत की दिखा दो।जीते जी गर दूरी ज़ायज थी जहां में,
कांधा तो मेरे जनाज़े को लगा दो।ये किनारे बेरहम हैं बदगुमां हैं,
कश्तियों, मंझधार को अपनी बना लो।चांदनी से चांद की इज़्ज़त है जग मे,
रौशनी दो या अंधेरों की सज़ा दो।ज़िन्दगी कुर्बान है कदमों मे तेरे,
ऐ ख़ुदा मरने का मुझको हौसला दो।प्यार में दरवेशी का आलम है दानी,
मिल सको ना तो तसव्वुर की रज़ा दो।

राजीव श्रीवास्तवा के चंद मुस्कुराते शेर

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चंद मुस्कुराते- शेर ! बेदर्द जमाने में कोई अपने मिल जाते हैं , ढूँदने से राख में अँगारे निकल आते हैं ! प्यार में पल-दो पल में इकरार नही होता , जो पल में हो जाता है वो प्यार नही होता ! बस यही सोच कर हम हर गम पिए जाते हैं , की आप की महफ़िल में मेरे शेर पढ़े जाते हैं ! जाम का नशा तो पल दो पल में उतर जाएगा , जिसे हुस्न का नशा होगा वो आशिक कहाँ जाएगा ! सूखे हुए फूलों से घर नहीं सजता, रेत के टीलों से महल नहीं बनता , जिन रिश्तों में वफ़ाई नहीं होती, उन रिश्तों से प्यार का आशियाँ नहीं बनता ! महफ़िल ख़त्म हो जाती है, मेहमान घर चले जाते हैं , उस शाम को याद करने को, बस छलके जाम रह जाते हैं ! दोस्त तो कई मिलते है, कुछ जिंदगी का हिस्सा बन जाते हैं फूल भी कई खिलते है, कुछ खुशनसीब ही किताबो में जगह पाते हैं ! ---

एकता नाहर की कविता - नारी तुम श्रृंगार करो, तन का नहीं मन का

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नारी तुम श्रृंगार करो, तन का नहीं मन का सादगी स्वच्छता सत्य शील, लक्ष्य बनाओ जीवन का हाथों में कंगन नहीं, दान को सुशोभित करो आँखों में काजल नहीं, करुणा ममता का भाव भरो वाणी में मृदुता का रस हो, मन में सेवा की भावना मुख पर कोमल प्रेम का सौम्य, सदाचार की जीवंत प्रतिमा दया त्याग का अलौकिक तेज, और फूलों सी कोमलता शीतल गंगा सी अश्रुधारा, जैसे मोती की उज्ज्वलता वीरता और कोमलता का, यह अटूट संगम आदर्श नारी का यह श्रृंगार, अलौकिक और अनुपम --- एकता नाहर Email id : EktaNahar5@gmail. com hobies : writing, sketching

दीनदयाल शर्मा की कविता - समर्पण

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समर्पण माँ बहिन बीवी बेटी और न जाने कितने रूपों में तू समर्पित है तेरा जीवन सबके लिए अर्पित है ममता उड़ेलती प्यार बांटती तू अंतत: बंट जाती है   पञ्च तत्वों में और हो जाती है लीन ब्रह्म में बुनती ताना - बाना नारी ! तुझे हर रूप में पड़ा है कड़वा घूँट पीना फिर भी छोड़ा नहीं है तूने बार- बार जीना.. ----- - दीनदयाल शर्मा अध्यक्ष, राजस्थान साहित्य परिषद् ,  हनुमानगढ़  - 335512

विजय वर्मा की हास्य कविता – कवि का चक्कर

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एक बार यमदूत एक कवि के चक्कर में पड़ गया गया था उसकी जान लेने पर अपनी देने पर उतर गया. कवि के पास जाकर बोला-- अपनी आखरी कविता पढ़ जाओ, दस तक गिनता हूँ,तबतक इस भैंसे पर चढ़ जाओ. कवि  मन ही मन मुस्कुराया बहुत दिनों बाद कोई मुल्ला पाया., कवि बोला ,आओ आओ
कुछ कविता सुन लो , पेट-रस,क्रिकेट -रस ,खेल-रस ,रेल-रस महंगाई-रस ,बेहयाई-रस चाहे जो चुन लो. चार कविता सुनने पर चाय-नास्ता मुफ्त है. परिस्थिति-किचेन से बेलन,चिमटा आ सकते है, पर इसी में तो कविता सुनने का लुत्फ़ है. शर्त-घरवाली का चंडी-रूप देखकर घबडाना नहीं कुछ थाली-ग्लास झेलकर भी हड़बड़ाना नहीं. सावित्री की तरह पीछा करेगी सिर्फ एक इच्छा  करेगी--- पर उसकी बातों में मत आना. कहेगी- भूलकर भी इस कवि के बच्चे को वापस मत लाना.   इतना कहकर कवि भैंसे पर चढ़ा भैंसा आगे बढ़ा कवि ने मुँह खोला उधर चित्रगुप्त का सिंहासन  डोला. अभागा! किस पापी को ला रहा है खुद तो फंसा ही है मुझे भी फंसा रहा है. कवि ने राग अलापा शुरू किया अपना स्यापा. यम ने रोका, कवि को टोका रे कवि! तू चुप ही चल. कवि गुस्साया, खूब भिन्नाया- रे यम! तू सुनता चल, अगर कुछ गड़बड़ की तो राजनीति-रस…

प्रमोद भार्गव का आलेख - बिहार : विकास की भूख जगाने का परिणाम

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बिहार में आए ऐतिहासिक जनादेश ने साबित कर दिया है कि अर्से तक हिंसा, अराजकता और परिवारवाद की अजगरी गुंजलक में जकड़ा बिहार अब करबट ले रहा है। सकारात्‍मक सोच और रचनात्मक वातावरण का निर्माण करते हुए आम लोगों में विकास की भूख जगी है। नतीजतन नीतीश भाजपा गठबंधन के साथ दोबारा सत्ता में लौटे। कांग्रेस, बसपा, लोजपा और वामपंथी दलों की बात तो छोड़िए बिहार की राजनीतिक बड़ी ताकत रहे लालूप्रसाद यादव अपनी पत्‍नी और बिहार की पूर्व मुख्‍यमंत्री राबडी देवी समेत पूरे कुनबे को डूबो बैठे। बिहार के परिणाम देश के राष्‍ट्रीय क्षितिज और क्षेत्रीय दलों के लिए एक ऐसा संदेश है कि मतदाता अब जातिवाद, वंशवाद को नकारने के साथ अहंकारवादियों से भी मुंह मोड़ रहा है। बिहार की जीत इस बात का भी तकाजा है कि किसी क्षेत्र में यदि विषमता दूर होगी तो हिंसा पर भी अंकुश लगेगा। देश में बढ़ती विषमता के साथ-साथ हिंसा बढ़ रही है, इस संदर्भ में बिहार में नीतीश कुमार का कुशल राजनीतिक नेतृत्‍व एक सबक है। बिहार की यह विजयश्री राजनीतिक स्‍थिरता के लिए भी मेंडेट है, जिससे विकास की गति आगामी पांच साल अवरुद्ध न हो। कांग्रेस को अपेक्षित सफलता…

चर्चित साहित्यिक एवं सांस्कृतिक पत्रिका ‘सरस्वती सुमन’ के लिए रचनाएँ आमंत्रित

देश की चर्चित साहित्यिक एवं सांस्कृतिक त्रैमासिक पत्रिका  ‘सरस्वती सुमन’  का आगामी अंक  ‘मुक्‍तक विशेषांक’  होगा जिसके अतिथि संपादक  होंगे सुपरिचित युवा कवि  जितेन्द्र ‘जौहर’ । उक्‍त विशेषांक हेतु आपके  विविधवर्णी (सामाजिक, राजनीतिक, आध्यात्मिक, धार्मिक, शैक्षिक, देशभक्ति, पर्व-त्योहार, पर्यावरण, श्रृंगार, हास्य-व्यंग्य, आदि अन्यानेक विषयों/ भावों) पर केन्द्रित मुक्‍तक एवं तद्‌विषयक सारगर्भित एवं तथ्यपूर्ण आलेख सादर आमंत्रित हैं। लेखकों-कवियों के साथ ही, सुधी-शोधी पाठकगण भी ज्ञात / अज्ञात / सुज्ञात लेखकों के चर्चित अथवा भूले-बिसरे मुक्‍तक भेजकर ‘सरस्वती सुमन’ के इस  दस्तावेजी ‘विशेषांक’  में सहभागी बन सकते हैं। प्रेषक का नाम ‘प्रस्तोता’ के रूप में प्रकाशित किया जाएगा। प्रेषक अपना पूरा नाम व पता (फोन नं. सहित) अवश्य लिखें। प्रेषित सामग्री के साथ फोटो एवं परिचय भी संलग्न करें। समस्त सामग्री डाक द्वारा निम्न पते पर अति शीघ्र भेजें- जितेन्द्र ‘जौहर’ (अतिथि संपादक  ‘सरस्वती सुमन’) IR-13/6, रेणुसागर, सोनभद्र (उ.प्र.) 231218. मोबा. #          :   +91 9450320472 ईमेल का पता  :  jjauharpoet@…

शुभ शिखर मिश्र की कविता - -

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ऐसा ही कुछ-कुछ होता हैकुछ समय गुजरता है खुश-खुश कुछ समय मुझे भरमाता है, छोटे से बालक मुझ शुभ को तकदीर पे गुस्सा आता है। मैं नहीं खेलता जी भर के हर रोज पढ़ाई करता हूँ, फिर भी मम्मी की आँखों में जाने क्यों गुस्सा रहता है। एक बार गया था पापा संग बाजार सब्जियाँ लाने को, पापा ने जूते दिला दिए फुटबॉल खेलकर आने को। मैं निकल गया घर से अपने बाहर से मित्र बुलाते थे, मन को मेरे ललचाने को फुटबॉल का खेल दिखाते थे। मैं रोक सका न इस मन को फुटबॉल की ऐसी माया है, चुपके से निकला मैं घर से जूतों ने ताव दिलाया है। मैं खेल रहा था बस इसको फुटबॉल तो मेरे पास रहे, जब पास न आयी वो मेरे तो मित्र से फरियाद करी। एक मित्र ने जोर से किक मारी फुटबॉल जो मुझको पास करी, वो हाथ की हड्डी तोड़ गयी उसने भी मेरे संग घात करी। पापा चीखे, मम्मी रोई तो मुझको यह एहसास हुआ, मेरी ही थोड़ी गलती से मेरा यह ऐसा हाल हुआ। अब कभी न खेलूँगा बाहर घर पर ही शोर मचाऊँगा, चाहे कुछ भी हो जाए मगर बाहर न पैर बढ़ाऊँगा। एक बात सोचता हूँ ईश्वर ऐसा क्यों तू बस करता है, शुभ काम न करता है गंदे क्यों उसको दण्डित करता है ? ----

रामदीन की कविता–अर्ध सत्य

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अर्ध सत्‍य''प्रजापति'दीवाली की धुरी आप हो आप ही सिरजनहार पारस जैसा पावन करते महिमा अपरम्‍पार। पड़ी अपावन अनगढ़ मिट्‌टी देते तुम आकार जैसे करते रोज धरा पर अहिल्‍या उद्‌धार। मिट्‌टी को पावन करने में सुबह से हो गई शाम साथ ही रही घरैतिन लेकिन काम न हुआ तमाम। बहुत रही सकुचाय घरैतिन पैबन्‍द लगा है धोती में अबकी किरपा करहु लक्ष्‍मी मिले बिलाउज धोती में। सांझ भये घिर आये बदरा अब मुश्‍किल में जान, मेघदेव की करते विनती फिर से हुआ विहान। धीर, वीर, संयमी तुम्‍हीं तुम कितनी चाक चलाते हो उस मेहनत के बदले में तुम तो कुछ ना पाते हो। तुम सा शिल्‍पी निश दिन खोजूं लेकिन कहीं न पाऊं संस्‍कृति और धैर्य के साधक तुमको शीश नवॉऊं। दीवाली की धुरी आप हो आप ही सिरज़नहार एक तुम्‍ही हो आज भी पावन तुम पर सब न्‍यौछार। बनावटी नकली दीयों से है कलुषित है संसार, असली एक तुम्‍ही निर्माता तुम हो रचनाकार। दीवाली पर लेकिन फिर परिवार की पीड़ा सहते हो औरों को दे देते अमृत नीलकंठ बन जाते हो। करवा, दीपक, सुत्‍ती, गगरी लक्ष्‍मी और गणेश, रचना करते इन सबकी हो पाकर कठिन कलेश। आदि अनन्‍त काल के जब खंडहर खुदवाये जाते हैं…

विजय वर्मा की ग़ज़लें

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ग़ज़ल [काश्मीरी-भाइयों के नाम]बीते हुए दिन हम पर आज भी भारी है गल्तियाँ कुछ तुम्हारी कुछ हमारी है. संवाद के सारे रास्ते खोल के रखना यही राह जायज़ है चाहे जो दुश्वारी है. उस कश्ती का डूबना तय है दोस्तों जिसका नाविक अनाड़ी, दुगुनी सवारी है. कल जिस बस्ती में जलसे ही जलसे थे किसकी नज़र लगी, आहो-बुका जारी है. ग़ुरबतकदे में किस कंधे पे सर रख के रोये यहाँ  खुद के कंधे पर सर रखना भारी है इस माहौल में भला अपनी बात क्या रखें. यहाँ हर एक एक चेहरे पर हैबत तारी है दिलों की सरहदें आखिर मिटे भी तो कैसे बेमन की कोशिश, ये कोशिशे सरकारी है.. . कहते क्यूँ  नहीं  ?
दोस्त हो तो दोस्त जैसे लगते क्यूँ नहीं ? दिल में कुछ फांस है, कहते क्यूँ नहीं? तेरे हाथों में जो फूल है, कागज़ के है, पूछते हो मुझसे ये महकते क्यूँ नहीं? वही मै हूँ,वही गली है , वही फिज़ा भी है, तेरे सूर्ख होंठ पहले -से दहकते क्यों नहीं? प्यार एक चुभन है, दर्द है,अहसास है, बयां क्या करना, इसे सहते क्यों,नहीं? अभी ग़म -समंदर बहुत दूर तक बाकी है, किनारा क्या ढूँढना, अभी बहते क्यूँ नहीं? --
v k verma,sr.chemist,D.V.C.,btps
vijayvermavijay560@gmail…

प्रभुदयाल श्रीवास्तव का बाल-गीत

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कभी न खाना तंबाकूकिसी किराने की दुकान से तंबाकू के पाउच ले आते, गली गली में बच्चे दिखते खुल्ल्म खुल्ला गुटखा खाते। बाली उमर और ये गुट्खा कैसे कैसे रोग बुलाते, तड़प तड़प कर निश्छल नन्हें हाय मौत को गले लगाते। ढेरों जहर, भरे गुटखों में टी बी का आगाज कराते, और अस्थमा के कंधे चढ़‌ मरघट तक का सफर कराते। मर्ज केंसर हो जाने पर लाखों रुपये रोज बहाते, कितनी भी हो रही चिकित्सा फिर भी प्राण नहीं बच पाते। सरकारी हो हल्ले में भी तम्बाकू को जहर बताते, पता नहीं क्यों अब भी बच्चे गुटखा खाते नहीं अघाते। वैसे बिल्कुल सीधी सच्ची बात तुम्हें अच्छी बतलाते, जो होते हैं अच्छे बच्चे तम्बाकू वे कभी न खाते।

संजय दानी की ग़ज़लें

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।वंश का हल खींचते हैं।
शौक के बादल घने हैं
दिल के ज़र्रे अनमने हैं।
दीन का तालाब उथला
ज़ुल्म के दरिया चढ़े हैं।
अब मुहब्बत की गली में
घर,हवस के बन रहे हैं।
मुल्क ख़तरों से घिरा है
क़ौमी छाते तन चुके हैं।
बेवफ़ाई खेल उनका
हम वफ़ा के झुनझुने हैं।
ख़ौफ़ बारिश का किसे है
शहर वाले बेवड़े हैं।
चार बातें क्या की उनसे
लोग क्या क्या सोचते हैं।
हम ग़रीबों की नदी हैं
वो अमीरों के घड़े हैं।
लहरों पे सुख की ज़ीनत
ग़म किनारों पे खड़े हैं।
रोल जग में" दानी" का क्या
वंश का रथ खींचते हैं।--- (2) जागे से दिल के अरमान हैं
इश्क़ का सर पे सामान है।
कुछ दिखाई नहीं देता अब
सोच की गलियां सुनसान हैं।
दुश्मनी हो गई नींद से
आंखों के पट परेशान हैं।
मेरी तनहाई की तू ख़ुदा
महफ़िले ग़म की तू जान है।
काम में मन नहीं लगता कुछ
बेबसी ही निगहबान है।
मुझको दरवेशी का धन दिया
तू फ़कीरों की भगवान है।
दर हवस के खुले रह गये
बंद तहज़ीब की खान है।
सब्र मेरा चराग़ों सा है
वो हवस की ही तूफ़ान है।
ज़र ज़मीं जाह क्या चीज़ है
प्यार में जान कुरबान है।
दिल की छत पे वो फ़िर बैठी है
मन का मंदिर बियाबान है।
दानी को बेवफ़ाई अजीज़
इल्म ये सबसे आसान है।----

एस के पाण्डेय की लघुकथा – प्रमाणपत्र

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*प्रमाणपत्र* एक बुढ्ढा बैंक में क्लर्क से जोर-जोर कह रहा था कि मैं जिन्दा तुम्हारे सामने खड़ा हूँ। इससे बड़ा मेरे जीवित होने का दूसरा और क्या प्रमाण हो सकता है ? और तुम कहते हो कि मैंने अपने जीवित होने का प्रमाणपत्र अभी तक जमा नहीं किया है। क्लर्क का कहना था कि मुझे सिर्फ प्रमाणपत्र चाहिये। तुम जिन्दा हो या मुर्दा मैं कुछ नहीं जानता। पेंशन चाहिये तो प्रमाणपत्र लेकर आओ। बुढ्ढा बुदबुदाते हुए निकला कि बुढ़ापा भी क्या चीज है कि कोई जीवित भी नहीं समझता। जो हाल घर में वही बाहर भी, यह सोचकर रुआंसा हो गया। संयोग से मैं भी बैंक गया था। मैंने कहा बाबाजी आप दो प्रमाणपत्र बनवा लीजिये। एक बैंक और दूसरा घर के लिए। शायद आपको पता नहीं, अभी हाल में एक आदमी मरा हुआ सड़क के किनारे पड़ा था। पोलिस आई और उसे जिन्दा बताकर चली गयी। कारण, उसके जेब में जीवित होने का प्रमाणपत्र था। एक आदमी बोला कि यह जिन्दा नहीं मुर्दा है। शायद इसे मरे हुए कई दिन हो गये । लाश से बदबू आ रही है। तो पोलिस उसे साथ ले गयी। वह झूठा बयान देने तथा कानून के आँख में धूल झोंकने के आरोप में जेल में बंद है। बाबाजी प्रमाणपत्र बनवाने चले गए। …

सत्यवान वर्मा सौरभ के दोहे

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दोहे -1 हिन्दी माँ का रूप है, समता की पहचान।
   हिन्दी ने पैदा किए, तुलसी औ’ रसखान।।2 हिन्दी हो हर बोल में, हिन्दी पे हो नाज।
   हिन्दी में होने लगे, शासन के सब काज।।3 दिल से चाहो तुम अगर, भारत का उत्थान।
   परभाषा को त्याग के, बांटो हिन्दी ज्ञान।।4 हिन्दी भाषा है रही, जन-जन की आवाज।
   फिर क्यों आंसू रो रही, राष्ट्रभाषा आज।।5 हिन्दी जैसी है नहीं, भाषा रे आसान।
   पराभाषा से चिपकता, फिर क्यूं रे नादान।।6 बिन भाषा के देश का,  होय नहीं उत्थान।
   बात पते की ये रही,  समझो तनिक सुजान।।7 मिलके सारे आज सभी, मन से लो ये ठान।
   हिन्दी भाषा का कभी, घट ना पाए मान।।8 जिनकी भाषा है नहीं, उनका रूके विकास।
   पराभाषा से होत है, यथाशीघ्र विनाश ।।
9 मन रहता व्याकुल सदा, पाने माँ का प्यार।
   लिखी मात की पातियां, बांचू बार हजार।।10 अंतर्मन गोकुल हुआ,  जाना जिसने प्यार।
    मोहन हृदय में बसे,  रहते नहीं विकार।।11 बना दिखावा प्यार अब,  लेती हवस उफान।
    राधा के तन पे लगा,  है मोहन का ध्यान।।12 बस पैसों के दोस्त है,  बस पैसों से प्यार।
   बैठ सुदामा सोचता,  मिले कहां अब यार।।13 दुखी-गरीबों पे सदा, जो …

रजनीकांत के चुटकुले

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रोबोट जब रिलीज हुई थी तो रजनीकांत चुटकुलों की चहुँओर फिर से भरमार हो गई थी. कुछ चुनिंदा रजनीकांत चुटकुलों का आनंद फिर से लें.रजनीकांत प्याज को भी आठ-आठ आँसू रूला सकता है.
रजनीकांत तो रीसाइकल बिन को भी मिटा सकता है.
भूत वास्तव में रजनीकांत की वजह से हैं. हजारों लोगों को मौत की घाट उतारेंगे तो वे और क्या कर सकते हैं भूत बनने के सिवा.
रजनीकांत कार्डलेस फोन के जरिए किसी का भी गला घोंट सकता है.
रजनीकांत वायलिन बजा सकता है... एक पियानो के साथ.
जब रजनीकांत एक कमरे में प्रवेश करता है तो उजाला हो जाता है क्योंकि डर के मारे अंधेरा भाग जाता है.
जब रजनीकांत किसी दर्पण में अपने आप को देखता है तो दर्पण टूट जाता है क्योंकि दर्पण इतना बेवकूफ नहीं है कि वो रजनीकांत और रजनीकांत के बीच में आए.
रोनाल्डिन्हो फुटबॉल को एक किक से 50 गज दूर फेंक सकता है. रजनीकांत रोनाल्डिन्हो को उससे भी आगे फेंक सकता है.
रजनीकांत को यह नहीं पता कि आप कहाँ रहते हैं, लेकिन वह जानता है कि आप कहाँ मरने वाले हैं.
दरअसल, गोलियाँ रजनीकांत को चकमा देती हैं, और इस तरह अपना जीवन बचाती हैं.
विकलांगों के लिए पार्किंग स्थल यह नहीं दर्शाता है कि यह…

प्रमोद भार्गव की कहानी – परखनली का आदमी

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सुनो...! सुनाएं एक कहानी.....। परखनली के आदमी की कहानी.....। यह कहानी और कहानियों की तरह परीलोक की कथा नहीं है, न ही भूतकाल की कहानी है, न ही वर्तमान की। यह कहानी है भविष्‍य काल की...इक्‍कीसवीं सदी के दूसरे दशक की। आप प्रबुद्ध श्रोताओं में जिज्ञासा जागी होगी कि मैं भला इक्‍कीसवीं सदी के दूसरे दशक में पहुंचे बगैर इस सदी के दूसरे दशक के अंतिम चरण की कहानी कैसे सुना सकता हूं। वह भी परखनली के आदमी की, जो अभी शैश्‍व अवस्‍था में है..अभी उसे अभी आदमी बनने के लिए पच्‍चीस से तीस वर्षों का लंबा सफर तय करना होगा ? आपकी जिज्ञासा उचित है, लीजिए मैं आपको बताये देता हूं कि मैंने परखनली के आदमी के मस्‍तिष्‍क के स्‍नायु तंत्रों के बीच एक लघु कंप्‍यूटर छिपा रखा है। जिसमें परखनली के आदमी के डाटाज फिट हैं....। बस बटन दबाया और कंप्यूटर के माध्‍यम से मेरा मस्‍तिष्‍क इक्‍कीसवीं सदी के दूसरे दशक के अंतिम चरण में छलांग लगा देता है। तो अब गौर फरमाइए मैं बटन दबाता हूं.... यह सन्‌ 2020 है...। अब इस युग को कलियुग कहने की बजाए कंप्‍यूटर युग कहना ही उचित है। बीसवीं सदी के उत्‍तरार्द्ध में मनुष्‍य के हाथों में कल-पु…

सत्यवान वर्मा सौरभ की कविताएँ - बिखेर चली तुम साज मेरा अब कैसे गीत गाऊं मैं

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1सबके पास उजाले हों - मानवता का संदेश फैलाते, मस्जिद और शिवाले हों। नीर प्रेम का भरा हो सब में, ऐसे सब के प्याले हों।। होली जैसे रंग हो बिखरे, दीपों की बारातें सजी हों, अंधियारे का नाम ना हो, सबके पास उजाले हों।। हो श्रद्धा और विश्वास सभी में, नैतिक मूल्य पाले हों। संस्कृति का करे सब पूजन, संस्कारों के रखवाले हों।। चौराहों पे न लुटे अस्मत,दुःशासन ना फिर बढ़ पाए, भूख,गरीबी,आतंक मिटे,ना देश में धंधे काले हों।। सच्चाई को मिले आजादी और लगे झूठ पर ताले हों। तन को कपड़ा,सिर को साया, सबके पास निवाले हों।। दर्द किसी को छू न पाए, न किसी आंख से आंसू आए, झोंपड़ियों के आंगन में भी खुशियों की फैली डाले हों।। ‘जिए और जीने दे’ सब ना चलते बरछी भाले हों। हर दिल में हो भाईचारा नाग न पलते काले हों।। नगमों -सा हो जाए जीवन, फूलों से भर जाए आंगन, सुख ही सुख मिले सभी को, एक दूजे को संभाले हों।। -----. 2कैसे आज गुनगुनाऊं मैं बिखेर चली तुम साज मेरा अब कैसे गीत गाऊं मैं । तुमने ही जो ठुकरा दिया अब किससे प्रीत लगाऊं ।। सूना-सूना सब तुम बिन रात अंधियारी फीके दिन । तुम पे जो मैंने गीत लिखे …

प्रभुदयाल श्रीवास्तव के बालगीत

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करूणा दया प्रेम का भारत ‌ भारत माँ का शीश हिमालय‌ चरण हैं हिंद महासागर, मातुश्री के हृदय देश में बहती गंगा हर हर हर| अगल बगल माता के दोनों लहराते हैं रत्नाकर, पूरब में बंगाल की खाड़ी पश्चिम रहे अरब सागर| मध्यदेश में ऊँचे ऊँचे विंध्य सतपुड़ा खड़े हुये, सोन बेतवा चंबल के हैं यहीं कहीं चरणों के घर| छल छल छलके यहां नर्मदा यमुना केन चहकतीं हैं, दक्षिण में गोदावरी कृष्णा पार उतारें भवसागर| हिंदू मुस्लिम सिख ईसाई रहते हैं सब मिलजुल कर, यहां चाहते देवता रहना स्वर्ग लोक से आ आ कर| कहीं भेद न भाव धर्म का न ही जाति का बंधन, करुणा दया प्रेम का भारत‌ पावन निर्मल मन निर्झर| ---- वीर बहादुर चुहिया रानी बिल से निकली चुहिया रानी लगी चाल चलने मस्तानी| बोली मैं हूं घर की मुखिया दुनियाँ है मेरी दीवानी| पूर्ण तरह से ही मेरा है इस घर का सब राशन पानी| कभी भूल से न कर देना मुझसे लड़ने की नादानी| मेरे नाना पहिलवान हैं बड़ी लड़ाकू मेरी नानी| तभी अचानक किसी जगह से आ धमकी बिल्ली महारानी| डर के मारे बिल में घुस गई वीर बहादुर चुहिया रानी| -- कभी न खाना तंबाकू किसी किराने की दुकान से तंबाकू के पाउच ले आते, गली गली में बच…

दीप्ति परमार का आलेख : मोहन राकेश की जिन्दगी का सच्चा दस्तावेज - एक और जिन्दगी

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'एक और जिन्दगी' मोहन राकेश की श्रेष्ठ एवं चर्चित कहानी है । पति पत्नी के दाम्पत्य सम्बन्घों पर प्रकाश डालने वाली यह कहानी मोहन राकेश की अन्य कहानियों से सर्वथा भिन्न है, क्योंकि यह वह कहानी है जिसमें मोहन राकेश ने अपने जीवन की महत्त्वपूर्ण घटनाओं का हूबहू चित्र्ण किया है। 'एक और जिन्दगी' के नायक प्रकाश नायिका बीना तथा बच्चा पलाश तथा प्रकाश की दूसरी पत्नी निर्मला के माध्यम से मोहन राकेश ने अपने शीला (राकेश जी की पहली पत्नी) और नीत (मोहन राकेश और शीला का बेटा) तथा पुष्पा (मोहन राकेश की दूसरी पत्नी) की जिन्दगी की घटनाओं को केन्द्र में रखा है। मोहन राकेश का अधिकांश लेखन उनके व्यक्तिगत जीवन की परिस्थितियों पर किसी न किसी रूप में आधारित है। मोहन राकेश ने अपने जीवन में जो भोगा उसे ही शिल्प की उँचाई के साथ अपनी साहित्यिक रचनाओं में निरूपित किया है। उन्होंने जब भी और जो कुछ भी लिखा, अपने ही जीवन के इतिहास को फिर फिर दोहराया है। 1 अपने साहित्य में अपने ही जीवन को दोहराने की बात का समर्थन करते हुए मोहन राकेशने अपनी डायरी में लिखा है- जिस तरह 'सोलर' में शराब बरसों डंजनतम ह…

यशवन्त कोठारी का आलेख - आधुनिक भारत के निर्माता

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साठ वर्षों से अधिक के आजाद भारत की जो तस्‍वीर उभर कर सामने आती है उसे देखकर यह स्पष्ट हो जाता है कि आधुनिक भारत के निर्माण में सबसे ज्‍यादा योगदान पण्‍डित जवाहर लाल नेहरु, श्री मती इन्‍दिरा गांधी और स्‍वर्गीय राजीव गांधी का रहा है। नेहरु जी व श्रीमती इन्‍दिरा गांधी ने लम्‍बे समय तक देश के प्रधान मंत्री की बागडोर संभाली और वही किया जो इस देश के लिए उचित था। जरुरी था। नेहरु जी एक स्‍वप्‍न दृष्टा थे, उन्‍हें देश की हकीकत मालूम थी। आजादी की लड़ाई में सक्रिय भाग लेने के कारण उन्‍होंने पूरे देश का बार बार दौरा किया था। वे विदेशों में शिक्षित - दीक्षित थे, मगर वे जानते थे कि देश के गरीब किसान, मजदूर का हित किसमें है। उन्‍होंने समाजवाद का भारतीय माडल दिया जो उस वक्‍त की जरुरत थी। वे गंगाजमुनी तहजीब के हिमायती थे। अपने लेखन में भी उन्‍होंने इसी बात की ओर बार बार ध्‍यान आकृष्ट किया है। नेहरु के समाजवादी माडल के कारण ही भारत एक गुट निरपेक्ष राष्ट्र के रुप में उभर कर सामने आया। नेहरु जी की पंचशील नीति आज भी भारत सरकार की विदेश नीति का आधार है नेहरु जी की पंच वर्षीय योजनाओं के प्रारुप के कारण ही …

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