सोमवार, 1 नवंबर 2010

पूजा तोमर की 22 कविताएँ - जो निगाहों से बदनाम करते थे, उनसे नज़रें चुराने के दिन आ गए हैं

१ ****ज़िन्दगी****

मत जा मेरी दुनिया से तन्हा
रहने का हौसला नहीं बाकी

एक तेरी ही कमी है ज़िन्दगी में
वरना दुनिया में क्या नहीं बाकी

मोहब्बत तो आज भी करते हैं लोग
पर पहले सी वफ़ा नहीं बाकी

खून ठंडा सा, लब चुप चुप से है
की दिल में कोई गिला नहीं बाकी

अब तो मरने दो हुस्न वालों चैन से
की ज़िन्दगी में पहले सा मज़ा नहीं बाकी

२ ****रंगत****

अब न होगा कुछ हमसे
बात हाथ से निकल चुकी है

अब ना हमें याद दिलाओ कुछ
दिल की हालात कुछ संभल चुकी है

अब हमें भी खुश रहना आ गया है
गम की रंगत बदल चुकी है

अब न शिकवा गिला करो हमसे
दिल की गाड़ी फिर से चल चुकी है

अब रोना धोना बन्द हो गया है
दर्द की रात ढल चुकी है

३ ****ख्वाब****

खामोशी तेरी नहीं देती दिल को सुकूं
तुझसे मिल कर भी कुछ फ़ासले रह जाते हैं

रुठ जाओ न कही तुम जो दिल के बात कह दूं
सोचकर इतना मेरे होठ सिल जाते हैं

रात है बन्द है आंखें भी की नींद आजा
यह तसल्ली है की वो ख्वाब में मिल जाते हैं

जिनको हो जाए गुरुर बडे होने का
वो आसमां भी कभी-कभी खाक में मिल जाते हैं

रब की बख्शी हुई नेमत है मेरे यार मुझे
साथ है तो हम फूलों से महक जाते हैं

४ ****नज़र****

मत और कुछ दे मुझे मेरे यार बस
दे दे प्यार की मेरी दुनिया भी निखर जाए

आज की ये रात सुहानी है बड़ी कि
चांदनी रात में चमकते सितारों पर नज़र जाए

अब तो अपना ले मुझे कि तेरे नाम की
बदनामी लेकर दिवानी किधर जाए

कुछ भी देख लो लौटकर जालिम
तेरे चहरे पर नज़र जाए

मेरी वफ़ा को आज़मा के देख ले
कि मोहब्बत का कर्ज़ उतर जाए

अब तो तू देर न कर कुछ सोचने में
कि ज़िन्दगी इन्तज़ार में न गुजर जाए

तू मेरा हो जा या मुझे करले अपना
अब इनमें से कोई बात ही ठहर जाए

५ ****तेरी अदाएं****

दोनों का पलड़ा एक सा है
तेरे सितम और मेरी वफ़ाएं

फिर भी मेरे मासूम कातिल
तुझे करती है प्यार मेरी दुआएं

इश्क़ तो आंखों से बयां हो जाता है
होठों से चाहे लाख छिपाए

सच का पता है झूठ की खबर है
कह देती है सब तेरी अदाएं

सब है तेरे पहलू में जालिम
किस को दिल का हाल सुनाए

तूने तो लौटकर आना नहीं है
हम क्यों अपना वक़्त गवाएं

६ ****कातिल****

थक कर चूर हो गये हैं
लम्बे सफ़र से आये हैं
मेरे आंगन में दिये
तेरी महफ़िल से आये हैं

हमसफ़र् है वो मेरे
जो बनकर कातिल से आये हैं

यू न रुसवा कर हमें जालिम
हम यहां बड़े दिल से आये हैं

७ ****शौक****
तू अपना बना या कर दे बेगाना
हम तुझ पर इश्क़ करम करते रहेंगे

अगर हो कतिल तुझसा हसीन तो
हम अदा रकम करते रहेंगे

तू सुन ले कि बोल दिया हमने
मोहब्बत है और हरदम करते रहेंगे

ये मोहब्बत और भी बढ़ती रहेगी
अपनी वफ़ा का हम सितम करते रहेंगे

शौक है मिटने का, आरजू है बरबाद होने की
हम दिल लहु से लाल सनम करते रहेंगे

८ ****श्रंगार****
कब तक गोते खाये अकेले
हमसफ़र मिले तो नैय्या पार लगे

कोई जंग करे हमसे यारों
तो दिल पर अपने धार लगे

बिन यारों मोहब्बत के
अब सब कुछ बेकार लगे

इश्क़ और हंसी हमदम हो अपना
तो जीना भी मजेदार लगे

क्या करना सोना चांदी का
प्यार ही हमें सबसे बड़ा श्रृंगार लगे

९ ***रात की बात****
दिल हल्का हो जाये सोचकर रात भर
आंखों को अश्कों से भिगोते रहे

हम राह तकते रहे बेचैन होकर और
वो गैरों की तरह चैन से सोते रहे
यु तो कहने के लिये हम साथ थे,
मगर दिल से जुदा होते रहे

उसने कहा भूल जाना मुझे मगर
हम है कि ज़ख्मों को यादों से टटोते रहे

ख्वाब भी सच हो जाते हैं,
यही सोचकर ख्वाब मोहब्बत के संजोते रहे

कुछ पा लेंगे हम भी ज़िन्दगी में
इसी आस में अपना सब कुछ खोते रहे

१० ****आलम*****

सांसे थम सी गई थी
जब सामने से यार हमारा गुजरा था

लोग भी कहने लगे थे
खुदा कसम क्या नज़ारा गुजरा था

गमों के मारे भी बोल उठे थे,
अभी गली से इश्क़ का मारा गुजरा था

हम तो ज़माना भूल ही गये थे,
मेरे करीब से जब वो दोबारा गुजरा था

हम तो पलकों को गिरा भी न सके
एक ही पल मे आलम सारा गुजरा था

११ ****खत****

खत तो बहुत लिखे पर
इश्क़ के कमाल तक न पहुंचे

उनके दिल में तो उतर गए
पर दिल के हाल तक न पहुंचे

उनसे मिलना तो रोज़ होता था
पर उनके ख्याल तक न पहुंचे

हमने जबाब देने की कोशिश तो की
पर सवाल तक न पहुंचे

उनसे गिले शिकवे तो बहुत किये
पर मलाल तक न पहुंचे

जिसकी रोशनी से मंजिल दिख जाती
उस मशाल तक न पहुंचे

१२ ****जिक्र****

हम तो उनकी यादों में ही
हर शाम को बहार करते रहे

उसको बताया भी नहीं और
ताउम्र उसका इन्तज़ार करते रहे

उनसे कहने का हौसला न हुआ,
तस्वीर से ही इज़हार करते रहे

जो उसे मंजूर न थी हम वही
एक खता बार-बार करते रहे

जिसका आन-जाना उसके घर न था
हम उसी से जिक्र यार करते रहे

चैन आने पर कही वो दूर न हो जाये
इसी डर से खुद को बेकरार करते रहे

१३ ****सलाम****

नाचीज़ लिखती है एक
सलाम मोहब्बत के नाम

निखर गई कभी सुबह,
कभी दोपहर,कभी शाम

जिसके चलते कितने सूली चढ़े
और कितने हो गये तमाम

जिसके कारण पत्थर खाये
आशिकों ने सरे आम

जिसने हमको ही नहीं पूरी
कायनात को बना दिया गुलाम

जो फ़लक तक फ़ैली है हुई
जिसने जहां को दिया नया आयाम

१४ ****मेरी उम्र****

सुना-सुना से है आंगन दिल का न जाने
क्यों न मेरे घर से बहार गुजरी है

जिस बात में थी मेरी सच्चाई
एक वही बात उसको नागवार गुजरी है

मै न भूल सको उसे कभी इसी
इरादे से वो मेरे सामने से बार-बार गुजरी है

महफ़िल में शरीक होने वाले क्या जाने
मेरी तन्हाई कितनी बेकरार गुजरी है

छूने से पहले मौत उसको बतला दे
मेरी उम्र करके उसका इन्तज़ार गुजरी है

१५ ****आदत****

कैसे बहलाऊं मैं खुद को भला कभी-कभी
महफ़िल में भी दिल की वीरानी नहीं जाती

मैने माना तुम सही कह् रहे हो मगर
कभी-कभी सही बात भी मानी नही जाती

मै देखती हूं तुम्हें रोज़ मगर कभी-कभी
अपनों की सूरत भी पहचानी नहीं जाती

कभी-कभी लाख कोशिश कर लो
मगर दिल कि परेशानी नहीं जाती

दिल भी जनता क्या बुरा है क्या भला
मगर कभी-कभी आदत पुरानी नहीं जाती

१६ ****कोशिश****

जो दर्द देते थे हमको
वो दिल से बाहर हो बैठे

अपना समझकर हम,
गैरों के लिये रो बैठे

उनका साथ देने में,
अपनों को भी खो बैठे

उनको बचाने की कोशिश में,
खुद को ही डुबो बैठे

उनके होने की आरजू में,
खुद से भी हाथ धो बैठे

१७ ****चाहत****

दिल चाहता है फिर से साथ मुस्कराये हम

सुलग-सुलग के बहुत गुजरी अब दिल जलाए हम

तेरे इन्तज़ार में जो रातें कटी तेरे साथ बिताए हम
जो बात लबों से कह ना पाए आंखों से बताए हम

कुछ तुम अपनी कहो और कुछ अपनी सुनाए हम

१८ ****दिल****

उम्र भर कि सजा बन गई
एक नादानी दिल की

जब भी कम करने की सोची
बड गई परेशानी दिल की

वही निकला चोर यारों सौंपी थी
जिसको निगरानी दिल की

हर रोज ज़िन्दगी में नई कयामत है
लाती मनमानी दिल की

कोई बता दे मुझ को जरा कि
कैसे करुं कम शैतानी दिल की
पत्थर के शहर में कौन है मेरा
सोचकर बढ़ रही है हैरानी दिल की

१९ ****नहीं****

तुम सरे आम न कर सको
हम वो बात नहीं

जो तेरे लिये बदल न सके
हम वो हालात नहीं

जो रोशनी को निगल जाये
हम वो अमावस की रात नहीं

जिसमे डूब जाये तेरा बसेरा
हम वो जालिम बरसात नहीं

अभी तो मिलना और भी बाकी
ये कोई आखिरी मुलाकात नहीं

पूजा तोमर

२० ****हाल-ए दिल****

तू क्या जाने हमसफ़र मेरे,
कितने उदास हुये हम तुझसे दूर जाकर

कैसे कह दूं कि मेरा दिल नहीं दुखा,
वक़्त काटा है खून के आंसू बहाकर

क्या-क्या न बीती सितमगर,
सब हार गए तुझसे दिल लगाकर

जितनी गिनती नहीं उतने खाये हैं
धोखे से तुझे अपना बनाकर

अपनी दुनिया को अंधेरो से भर
लिया मैंने तुझसे नज़रें मिलाकर

ये सोचकर बैठे थे की कुछ तो
मेहरबानी होगी हाल-ए दिल सुनाकर

२१ ****ज़ख्म****

मर्ज़ जानते हैं तो कोई
उसकी दवा क्यों नहीं देते

मेरी वफ़ा का मुझे कुछ
सिला क्यों नहीं देते

जो राज़ दिल को ज़ख्म
दे रहे है बता क्यों नहीं देते

जो गम सताते है उन्हे मेरे
घर का पता क्यों नहीं देते

मै हूं नदी तू है सागर मुझको
खुद से मिला क्यों नहीं देते

अगर है परेशानी "पूजा" से तो
इस नाचीज़ को भुला क्यों नहीं देते

२२ ****मंजिल****

बहुत आजमा लिया वक़्त ने
अब वक़्त आजमाने के दिन आ गए हैं

बहुत खाली ठोकरें हमने
अब मंजिल को पाने के दिन आ गए हैं

बहुत सुन लिया और सह लिया
अब सबको सुनाने के दिन आ गए हैं

अब सब कुछ सरेआम रख दो
अब लुटने-लुटाने के दिन आ गए हैं

अब छोड़ दो रोना-रुलाना
अब हंसने- हंसाने के दिन आ गए हैं

जो निगाहों से बदनाम करते थे
उनसे नज़रें चुराने के दिन आ गए हैं

फिर से महकने लगी है फ़िज़ा
अब चमन को सजाने के दिन आ गए हैं

चलो फिर से कही दिल लगायें
अब दिल को लगाने के दिन आ गए हैं

पूजा तोमर

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मेरा परिचय:-

मैं पूजा, २३ वर्ष की हूँ और मैं M.B.A. की विद्यार्थी हूँ. मैं
नई दिल्ली में रहती हूँ. मेरा जीवन ही मेरी प्रेरणा है....
मै एक लड़की हूं जिसको हर पल कुछ न कुछ सिखाता है, मुझे हर शख्स नया आईना दिखाता
है, वैसे मैं कुछ सबसे अलग करना चाहती हूँ अपनी एक अलग से दुनिया जिसमे मैं कुछ
नया सोच सकूं और कर सकूं, अपना एक अलग ही आसमान चाहती हूं जिसमें मैं दिल खोल के
उड़ सकूं और ये कह सकूं की......हाँ मैं कुछ हूं

1 blogger-facebook:

  1. Dear Pooja, apki kalam men gazab ki aag hai..apki rachanayen man ko keval chooti hi nhi balki dil ke bheetar tak utar jaati hai.ap keval ek ladki hi nhi hain..bahut kucch hain ap..ek din apka naam hoga...keval badaee nhin kar rha hoon..apki rachanayen bolti hain..meri hardik shubhkamnayen..
    deen.taabar@gmail.com,

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