सोमवार, 1 नवंबर 2010

राजीव श्रीवास्तवा की दो कविताएँ

rajeev shrivastava

-------चल झूठे !



मैंने तेरी सूरत की तारीफ करी,
तेरी हर अदा पे आहें भरी,
तू बलखाती ,लहराती इतराती,
मंद -मंद मुस्काती मेरे पास आई,
और शर्मा कर बोली --चल झूठे !

तेरे हाथों से छूटा रुमाल,
उसकी खुशबू बड़ी बेमिसाल,
मैंने झट से लपक लिया,
सूँघ कर होठों से लगाया और कहा,
तेरा रुमाल मुझे घायल कर गया,
तू पलट कर बोली--चल झूठे!

मैंने तुझे संदेशा भिजवाया,
अपना हाल -ए- दिल बतलाया,
कहा अब तेरे बिन जीना मुश्किल है,
मन मिलने को व्याकुल है,
रातों को नींद नहीं आती है,
तेरा जवाब आया तूने लिखा---- चल झूठे!

तेरी राह में घंटों खड़ा रहा,
तुझसे मिलने को अड़ा रहा,
पसीने से नहा गया,
किसे से कुछ ना कहा गया,
तुझे देखा तो मिलना चाहा,
तू बस सामने से निकल गयी,
बस एक नज़र देखा और कह गये -- चल झूठे!

अपना प्यार जताने को,
खून से लिख खत भिजवाया,
और अरमानों की सेज सजाई,
सोचा तू भागी चली आएगी,
अपना मुझे बानाएगी,
तूने मेरे खून को स्याही समझा,
और सखी से संदेशा भिजवाया,
खत में लिखा--चल झूठे!

तुझसे ब्याह रचाने को,
अपना तुझे बनाने को,
मैं तेरे आगे फूल लेकर,
अपना दिल तेरे कदमों पे रखकर,
घंटो मिन्नतें करता रहा,
तूने इसे एक मज़ाक समझा,
मेरे बालों को सहलाकर,
प्यार से बोली------ चल झूठे!

आज एक बात बताता हूँ
दिल का राज जताता हूँ
तू मुझे चाहे ना चाहे
तू मुझे मिले ना मिले
बस मुझे यूं ही देखकर
प्यार से नज़रें मिलाकर
बस यूं ही कहती रहा कर---- चल झूठे!

----

बुढ़ापा आ ही जाता है


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जिंदगी का सफ़र, कब अपने आखिरी पड़ाव ,
पे पहुँच जाता है, पता ही नहीं चलता,
तिनका-तिनका वक़्त गुजर जाता है ,
समय पलक झपकते; कैसे कट जाता है ,
और देखते ही देखते बुढ़ापा आ ही जाता है!

मौसम बदल जाते है, साल गुजर जाते हैं,
हर उम्र की रस्म अदायगी में
एक-एक बाल निकल जाते हैं ,
जीने का अंदाज बदल जाता है ,
लोगों का मिजाज़; बदल जाता है
जवानी रेत सी फिसल जाती है,
और बुढ़ापा आ ही जाता है!

बुढ़ापा आने का पूर्वानुमान,
होते ही मन विचलित हो जाता है,
दिल इसे स्वीकार नहीं कर पाता है ,
हर शख्स इसे ढंकने का प्रयास करता है ,
पर लाख छुपाए छुप नहीं पाता है,
क्योंकि ये तो समय का बदलाव है,
और बीता समय वापस नहीं आता है,
जवानी अलविदा कह जाती है ,
इसलिए बुढ़ापा आ ही जाता है!

उम्र भर भागते हुए ,
जब शरीर थक जाता है,
और आराम चाहता है,
तो हमारी गति रोकने को,
हमें इशारा कर जाता है ,
ये तो आना ही होता है ,
और सभी को आता है
जनाब आप चाहे ना चाहे
बुढ़ापा आ ही जाता है!

----.

डॉक्टर राजीव श्रीवास्तवा

1 blogger-facebook:

  1. बेनामी5:55 pm

    likhata hoon sahil sine par tere
    mita na de apni lahro se kahna
    naam sanam ka hai jindgi meri
    mita na de apni moujo se kahna
    aaye jb tahalne idhar wo
    ek nazar dekh le mere sanam se kahna

    just sahil

    उत्तर देंहटाएं

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