गुरुवार, 4 नवंबर 2010

यशवन्‍त कोठारी का व्यंग्य - कथा लक्ष्‍मी वाहन की

हे भक्‍तों !

जो लोग लक्ष्‍मी की पूजा अर्चना करना चाहते हैं और लक्ष्‍मी को प्रसन्‍न रखकर अपने घर की वृद्धि करना चाहते है, उन्‍हें चाहिए कि वे लक्ष्‍मी वाहन उलूक की अभ्‍यर्थना करें। सेवा पूजा करें क्‍योंकि यदि वाहन खुश है तो सवारी करने वाली अपने आप प्रसन्‍न रहेगी।

जो व्‍यक्‍ति इस उलूक अध्‍याय को पढ़ेगा, वह स्‍वयं उलूकवत्‌ हो जायेगा और उसके पास धन, सुख आठों सिद्धियां तथा नवों निधियां हमेशा रहेंगी। देवताओं ने मृत्‍यु लोक में इस पक्षी को यह वरदान दिया है कि व लक्ष्‍मी को अपने कन्‍धों पर सवार कर पूरे विश्‍व में भ्रमण कराये और चूंकि लक्ष्‍मी विष्‍णु की पत्‍नी है अतः चंचला है और चंचला के चोंचले सहना उल्‍लू के ही बस की बात है।

मैं उलूक महाराज को बार-बार प्रणाम करता हूं कि वे प्रसन्‍न हों और लक्ष्‍मी को कुछ समय के लिए ही सही मेरे घर पर रोक दें, और कुछ नहीं हो तो उनके दर्शन ही करने दे।

भक्‍तों ! अब मैं इस पक्षी के बारे में आपको विस्‍तार से बताता हूं। उलूक महाराज का सिर पृथ्‍वी की तरह गोल है। अन्‍य पक्षियों की तरह नहीं, इनकी आंखें मनुष्‍य की तरह हैं। जब उड़ते है तो बिलकुल आवाज नहीं करते ऐसे सरक जाते है जैसे आतिशबाजी में रॉकेट, जो आवाज बाद में आती है वो हवा की होती है, इनकी नहीं। ये महाराज जिस वृक्ष पर बैठते है, वहां नियमित रूप से उदासी दिखाई देती है। दूर से देखने पर ऐसा लगता है जैसे कोई विद्धान देश की स्‍थिति पर चिन्‍तन कर रहा हों।

कई बार मैंने उलूकों को चुपचाप घन्‍टों बैठे देखा है। ऐसा लगता है जैसे राजा के गलियारे में अजनबी घूम रहे हैं।

लक्ष्‍मी वाहन शिकार का शौकीन होता है और इसका वार दरिद्रों पर ज्‍यादा होता है। शिकार को दबोचते ही लक्ष्‍मी वाहन उसका सेवन कर जाते हैं। उलूक को पाला नहीं जा सकता। ये बात अलग है कि इनके पालने में लक्ष्‍मीपति भी समर्थ नहीं हो पाये।

उलूक महाराज की आवाज को सुन-सुनकर बड़े-बड़े लोगों के होश फाख्‍ता हो जाते हैं। लेकिन तान्‍त्रिक लोग उलूक की पूजा दिवाली की रात को करके कई शक्‍तियों की प्राप्‍ति का मार्ग प्रशस्‍त करते हैं।

आपकी जानकारी हेतु बता दूं कि हमारे देश में किसी घर पर उलूक बैठा होना या रात्री को बोलना अशुभ है, लेकिन ऐसी बात नहीं है यूनानी लोग उल्‍लू को सरस्‍वती मानते हैं। यानि हमारे यहां जो महत्‍व मोर का है वही यूनान में उल्‍लू का है और वैसे भी लक्ष्‍मी और सरस्‍वती बहिनें हैं और वीणा पुत्रों को लक्ष्‍मी कभी नहीं मिली।

अफ्रीका वाले उल्‍लू को जादू टोने तंत्र-मंत्र आदि कार्यों में प्रयोग करते हैं। किसी अफ्रीकी के घर पर यदि उल्‍लू आ जाये तो उसके पंख नोंच डाले जाते हैं। ताकि उल्‍लू को भेजने वाले का नाश हो। सफेद उलूक बहुत कम मिलेगा, लेकिन यह प्रेतात्‍मा का रूप माना जाता है।

उलूक की कहानी यहीं खत्‍म नहीं होती है। मेरा आपसे विनम्र निवेदन है कि उल्‍लू से आप डरें नहीं। यदि आप चाहते हैं कि लक्ष्‍मी आए तो उलूक की भी वन्‍दना करिये।

अपने घर आंगन को लीप-पोत कर माण्‍डणे बनाइये। लक्ष्‍मी तथा लक्ष्‍मी वाहन का इन्‍तजार करें। यदि आप ओम नमों उलूकाय मन्‍त्र का जाप करेंगे तो उलूक आप पर अवश्‍य कृपा करेंगे। ऐसा मेरा विश्‍वास है। अतः आप कृपा कर इस मन्‍त्र की माला जपें।

उलूकों के इस मौसम में मुझे एक और वस्‍तु की याद बड़ी तेजी से आ रही है और वो है सुरसा․․․․․․․․सुरसा का सीधा सम्‍पर्क महंगाई से और महंगाई का लक्ष्‍मी से, इस त्रिकोणात्‍मक समीकरण को समझना आसान नहीं है क्‍योंकि -

एक ही उल्‍लू काफी है,

बरबादें गुलिस्‍तां करने को।

हर शाख पे उल्‍लू बैठा है,

अंजामें गुलिस्‍तां क्‍या होगा॥

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यशवन्‍त कोठारी

86, लक्ष्‍मी नगर, ब्रह्मपुरी बाहर,

जयपुर-302002 फोनः-2670596

ईमेल - ykkothari3@gmail.com

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  1. भारत में असली उल्लुओं ने चोला बदल लिया है. ओरिजिनल में तो मार दिये जाते हैं... इसलिये अब :)

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