शुक्रवार, 5 नवंबर 2010

प्रभुदयाल श्रीवास्तव की ग़ज़लें

गज़ल
सुबह होने दो,शाम होने दो
दुनियाँ के अपने काम होने दो।

रात के लिये इतनी बेकरारी क्यों
पहले दिन तो तमाम होने दो।

 
दूसरे का हक क्यों मारते हो
जो करता है उसका ही नाम होने दो।

हम ईमान बेचेंगे जरूर साहिब
कुछ और ऊँचे दाम होने दो।

वह जगह दर्शनीय स्थल होगी
वहां एक बड़ा कत्लेआम होने दो।

गज़ल
थोड़ी सी नरमियत भूल बन जायेगी
कली शर्मायेगी तो फूल बन जायेगी।

बात को व्यर्थ बढ़ावा न दे
बाहर गई तो तूल बन जायेगी।

वक्त वह भी आयेगा देख्नना
मजबूरी उसूल बन जायेगी।

इंकार है तो सिर ठीक से हिला
वर्ना शादी कबूल बन जायेगी।

देख मुस्करा के जमाने की ओर
प्रतिकूल बात भी अनुकूल बन जायेगी।

प्रभुद‌याल‌ श्रीवास्त‌व‌

5 blogger-facebook:

  1. बहुत सुन्दर रचना है!
    --
    प्रेम से करना "गजानन-लक्ष्मी" आराधना।
    आज होनी चाहिए "माँ शारदे" की साधना।।

    अपने मन में इक दिया नन्हा जलाना ज्ञान का।
    उर से सारा तम हटाना, आज सब अज्ञान का।।

    आप खुशियों से धरा को जगमगाएँ!
    दीप-उत्सव पर बहुत शुभ-कामनाएँ!!

    उत्तर देंहटाएं
  2. बेनामी12:00 pm

    Dr Roop Chandra Shastriji ko dhanayawad shubh kamanayen diwali ki. prabhudayal shrivastava

    उत्तर देंहटाएं
  3. रात के लिये इतनी बेकरारी क्यों
    पहले दिन तो तमाम होने दो।

    bahut sundar, sabra ka imthan le rahe hai

    उत्तर देंहटाएं
  4. हम अपना ईमान बेचेंगे ज़रूर साहेब , कुछ और ऊंचे दाम होने दो।
    ख़ूबसूरत शे'र। बधाई।

    उत्तर देंहटाएं

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