शनिवार, 6 नवंबर 2010

कृष्ण कुमार चन्द्र की क्षणिकाएँ

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नारी

नारी जब जगती है,

सुबह की शुरूआत होती है।

रात्रि तभी विश्राम लेता,

जब नारी सोती है।

मत खेलना नारी की भावनाओं से,

उथल-पुथल मच जाता है।

लंका धू-धू कर जलती है,

जब नारी रोती है।

--0--

सृजन

विध्‍वंस के लिए तो,

मैं अकेला ही काफी हॅूं।

पर सृजन के वास्‍ते,

तुम्‍हारा साथ चाहिए।

वैसे भी अकेले-अकेले,

अस्‍तित्‍व कहाँ हमारा जग में,

जीवन के सफर में,

हाथों में तुम्‍हारा हाथ चाहिए।

--0--

बड़ा

अगर तुम बड़े हो,

तो बड़ा बन के दिखाओ।

हल के फल के नीचे जाओ।

हवा, पानी, घाम ले,

माटी से लिपट के बताओ।

फूलो-फलो, खूब लहलहाओ।

हँसिये से अपनी,

गर्दन भी कटवाओ।

कूटो-पिटो, फिर चक्‍की की सैर करो।

हाथों के थपेड़े खा,

गर्म कड़ाही में,

डूब के नहाओ।

भूखे पेट की भूख मिटा,

पच के दिखाओ।

फिर कहो कि मैं बड़ा हॅूं...

--0--

5 blogger-facebook:

  1. बहुत आश्चर्य में पड़ गया. अच्छी कवितायें..

    उत्तर देंहटाएं
  2. bahut sundar prastuti
    NAARI ko kahan vishram....
    ..Abhar

    उत्तर देंहटाएं
  3. पर सृजन के वास्‍ते,
    तुम्‍हारा साथ चाहिए
    अच्छी कवितायें

    उत्तर देंहटाएं
  4. बहुत अच्छी प्रस्तुति .........

    उत्तर देंहटाएं
  5. स्रिजन कविता (्छणिका) बहुत ही भावपूर्ण है ,किसी भी बडी कविता को धराशाई करने का माद्दा रख्ती है।

    उत्तर देंहटाएं

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