बुधवार, 10 नवंबर 2010

राजीव श्रीवास्तवा की रचनाएँ

बत्तीसी

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बत्तीस नकली दाँतों से,

सजी हुई है देखो बत्तीसी,

किसी के मुख में फिट बैठती,

किसी को चुभती है बत्तीसी!

लगते ही मुख के अंदर,

सज उठती है बत्तीसी,

पहले की मुस्कान लौटाती,

मन भाती है बत्तीसी!

खाने में फिर वही स्वाद,

वापस लाती है बत्तीसी,

बोलने पे शब्दों को,

स्वर देती है बत्तीसी!

जब चाहो मुख में डालो,

जब चाहो बाहर निकालो बत्तीसी,

हाथ में लेकर ब्रश लगा दो,

फिर डिबिया में रख दो बत्तीसी!

बुढ़ापे में साथ निभाए,

हमसफ़र बन जाती है बत्तीसी,

जब कुछ खाने को जी चाहे,

झट से लगा लो बत्तीसी!

तो भैया अब कहे का इंतज़ार,

जा कर लगवालो बत्तीसी,

फिर से जिंदगी का आनंद ले लो,

बनवालो एक प्यारी सी बत्तीसी!

---.

बस तेरा नाम !

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मेरे शीशे के दिल पे ,

तूने बेवफ़ाई का पत्थर दे मारा ,

अरमानों के टुकड़े हो गये हज़ार ,

हर टुकड़े पे लिखा है बस तेरा नाम !

रात भर तेरे इंतेज़ार में ,

मैं दीये सा जलता रहा ,

परवाने से पूछ लेना की ,

कैसे रात भर मैं लेता रहा बस तेरा नाम

राह में तेरी मैं कब से ,

पलकें बिछाए बैठा रहा ,

इंतज़ार की इंतेहाँ तक हो गयी ,

हर सांस पे लेता रहा बस तेरा नाम !

तू शमा सी जलती रही ,

मैंने परवाने सा प्यार किया ,

जल कर राख तक हो गया ,

उसी राख से लिख गया हूँ बस तेरा नाम !

तेरा हर इनकार मुझे  ,

शूल सा चुभता रहा ,

जख्म अब नासूर हो गये है

फिर भी हर आहः पे लेता रहा बस तेरा नाम !

तुझसे प्यार करने का

जुर्म मुझसे हो गया ,

सज़ा में रुसवाई की क़ैद मिली मुझे,

अब एक -एक दिन कटता है लेकर बस तेरा नाम !

---

खून से सींचती है

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उँची उँची बन रही इमारतें,

आसमान छूने को तैयार है,

इन्हें बना रहे हाथ बेबस है,

अपनी जिंदगी से लाचार है!

किसी के सपने को सच करने को,

सर पर पत्थर उठा रहे ,

खुद के पास छत नहीं है,

औरों का महल बना रहे !

इन्हीं चेहरों के बीच एक चेहरा,

निर्बल,निर्धन,निरीह पर निर्भय एक नारी,

अपने सर पर अपनी बदनसीबी को उठा,

लड़खड़ाती , सीढ़ियां चढ़ रही थी बेचारी!

तभी एक कर्णभेदी आवाज़,

जैसे ही उसके कानों में पड़ी ,

जल्दी से पत्थरों को गिरा,

तेज कदमों से मुड़ चली!

एक नवजात शिशु चबूतरे पे पड़ा,

असहाय,अकेला,कंकाल सा विचलित करता,

ज़ोर-ज़ोर से अपनी वेदना प्रकट करता,

अपनी जननी को भूखी आँखों से पुकरता!

माँ ने झट से उसे उठाया,

और अपने आँचल में छुपा लिया,

अपने कुपोषित शरीर में जो,

कुछ भी था उसके मूह में उंडेल दिया!

घर पहुँची तो बीमार पति,

अपनी बेबसी और लाचारी को कोसता,

चेहरे पे भूख के भावों को छुपाता,

आँसुओं को गिरने से रोकता!

घर में अन्न का दाना नहीं,

पर वो अन्नपूर्णा जो कहलाती है,

अस्पताल गयी और खून बेच कर,

कुछ खाना ले लाती है !

हे नारी तुझे करता हूं सलाम,

तू हर परिस्थिति में अपने,

परिवार की गाड़ी को खींचती है,

ज़रूरत पड़े तो अपनी बगिया को,

आपने खून से भी सींचती है!

डॉक्टर राजीव श्रीवास्तवा

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  1. बत्तीसी कविता में कुछ और जोड़ा घटाया जाये तो एक अच्छी मंचीय कविता हो सकती है। राजीव जी को बधाई।

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