संजय दानी की ग़ज़लें - तेरे होठों पे जब भी तबस्सुम दिखे, मेरे दिल में ग़ुनाहों का मौसम बने।

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ग़ुरबत का मकां

 
नींव बिन जो हवाओं में खड़ा है
मेरी ग़ुरबत के मकां का हौसला है।


टूटे हैं इमदाद के दरवाज़े लेकिन
मेहनत का साफ़, इक पर्दा लगा है।


सीढ़ियों पर शौक की काई जमी है
छत पे यारों सब्र का तकिया रखा है।


आंसुओं से भीगी दीवारे -रसोई
फिर शिकम के खेत में, सूखा पड़ा है।


बेटी की शादी के खातिर धन नहीं है
इसलिये अब बेटी ही, बेटा बना है।


सुख से सदियों से अदावत है हमारी
ग़म ही अब हम लोगों का सच्चा ख़ुदा है।


सैकड़ों महलों को गो हमने बनाया
पर हमारा घर, ज़मीनें ढूंढ्ता है।


बंद हैं अब हुस्न की घड़ियां शयन में
इश्क़ के बिस्तर का चादर फ़टा है।


हां अंधेरा पसरा है आंगन के सर पे
रौशनी का ज़ुल्म, दानी से ख़फ़ा है।

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(2)

तेरे होठों पे जब भी तबस्सुम दिखे

 

तेरे होठों पे जब भी तबस्सुम दिखे,

मेरे दिल में ग़ुनाहों का मौसम बने।


गेसुयें तेरी लहराती है इस तरह,

गोया बारिश के लश्कर का परचम तने।


तेरी तस्वीर को जब भी शैदा करूं,

तो मेरी आंखों से सुर्ख शबनम बहे।


दूर हूं तुझसे पर ख्वाहिशे दिल यही,

दिल मे तू ही रहे या तेरा ग़म रहे ।


तेरे चश्मे समन्दर का है यूं नशा,

इस शराबी के पतवारों में दम दिखे।


चांदनी बेवफ़ाई न कर उम्र भर,

चांद का कारवां फ़िर न गुमसुम चले।


ईद दीवाली दोनों मिल के मनाया करें,

हश्र तक अपना मजबूत संगम रहे।


मैं चराग़ों की ज़मानत ले लूं सनम,

गर हवायें तेरी सर पे हरदम बहे।


दानी, दरवेशी पे कुछ तो तू खा रहम,

खिड़कियों में ही अब अक्शे-पूनम सजे।

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3 टिप्पणियाँ "संजय दानी की ग़ज़लें - तेरे होठों पे जब भी तबस्सुम दिखे, मेरे दिल में ग़ुनाहों का मौसम बने।"

  1. सीढ़ियों पर शौक की काई जमी है
    छत पे यारों सब्र का तकिया रखा है।


    वाह! वाह! क्या कमाल का शेर है. वाह! वाह!!

    उत्तर देंहटाएं
  2. बेटी ही बेटा बना है..........संजय भाई बहुतायत में मध्यम वर्गीय परिवारों की हक़ीकत पर कहा है आपने|
    जुल्फों का लहराना और बारिश के लश्कर का परचम........... भई वाह..........
    इस मिसरे में लगता है टाइप करते वक्त शब्द आगे पीछे हो गये हैं| मेरे हिसाब से शायद आपने यूँ कहा होगा:-
    मैं जमानत चरागों की ले लूं सनम...........
    उम्दा , बेहतरीन


    आप से एक बात कहनी थी - आपने सिर्फ़ एक शब्द 'गो' जो जोड़ा मेरी सुबीर वाली ग़ज़ल में, फिर मैने भी उस मिसरे को तब्दील कर दिया है|

    पहले यूँ था:
    लगता है जैसे सेठ के खलिहान में बकरी घुसी

    अब इस तरह है:-

    यूँ लग रहा गो सेठ के खलिहान में बकरी घुसी|
    शुक्रिया संजय भाई, ग़लती की तरफ इशारा करने के लिए ...........

    उत्तर देंहटाएं
  3. रवि रतलामी जी और नवीन जी का तहे दिल आभार। आपके कमेन्ट्स मेरे लिये किसी धरोहर से कम नहीं हैं । नवीन जी * मेरी ग़ज़ल की पंक्ति वास्तव में वही सही है जैसे आप उद्घ्रित कर रहे हैं। इस ग़ज़ल में 7वे मिसरे में भी "दोनों" शब्द भी ग़लत है, पंक्ति ऐसी है, " ईद दीवाली मिल के मनाया करें"। इस ग़ज़ल की बन्दिश बहरे-मुतदारिक की है जिसकी रवानी 212 212 212 212 के दायरे में है। ग़लती उजागर करने के लिये बहुत बहुत धन्यवाद।

    उत्तर देंहटाएं

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