शनिवार, 13 नवंबर 2010

दीप्ति परमार की कविताएँ - सींचा था हृदय से जिन फूलों की क्यारियों को उनको ही उजाड़ दिया

 

संवेदना

सींचा था

हृदय से जिन फूलों की क्यारियों को

उनको ही उजाड़ दिया !

जिनकी चाह में

भूले थे अपने आपको

उन्हें ही भुला दिया !

पूजा था जिसको

बनाकर मन मंदिर की मूरत

बना दिया उसे पत्थर !

क्यों

नहीं रहती चाहत एक सी ?

क्यों

बदलती रहती है संवेदना भी ?

पल-पल

क्षण-क्षण

आजन्म !!!

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स्वार्थ के खेल में

होते है वे लोग मासूम

जो मर जाते है

मारे जाते है

बलि चढ़ जाते है

कुछ लोगों के स्वार्थ के खेल में ।

उठती है चिनगारियाँ

स्वार्थ की

अहं की

फैला देती है

एक अबुझ आग को ।

यह जलती रहती है

कभी

सांप्रदायिकता के नाम

जाति के नाम

प्रांत के नाम ।

यह आग

अगर चाहे पानी

वे लोग देते है हवा

जले उसमें भले ही

मासूम, निरपराध, बेबस ।

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सम्पर्कः डॉ. दीप्ति बी. परमार, प्रवक्ता हिन्दी-विभाग

आर. आर. पटेल महाविद्यालय, राजकोट

9 blogger-facebook:

  1. दोनो ही रचनायें बेजोड्……………सत्य से रो-ब-रु करवाती हुयीं।

    उत्तर देंहटाएं
  2. बहुत सुन्दर हैं दोनों रचनाये ....

    उत्तर देंहटाएं
  3. दीप्तिजी आपके शब्‍दों में गजब की ताकत है । आपकी रचनाएं केवल मन
    को छुती ही नहीं दिल के भीतर तक उतर जाती है । मेरी हार्दिक शुभकामनाएं ।

    उत्तर देंहटाएं
  4. दोनों कवितायें भावपूर्ण व मर्मस्पर्शी

    उत्तर देंहटाएं
  5. सोचने पर मजबूर करती दोनों कविताओं का फ़लक बहुत ऊंचा है।

    उत्तर देंहटाएं
  6. चर्चा मंच के साप्ताहिक काव्य मंच पर आपकी रचना 16 -11-2010 मंगलवार को ली गयी है ...
    कृपया अपनी प्रतिक्रिया दे कर अपने सुझावों से अवगत कराएँ ...शुक्रिया

    उत्तर देंहटाएं
  7. बेनामी12:47 pm

    satya ke be-baak chitra !! bade sundar aur jadu bhare shabd.... mann ko jhakjhorne me safal !! bhavishya mein aisi rachnaon ke liye utsuk hun...

    उत्तर देंहटाएं

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