रविवार, 14 नवंबर 2010

मालिनी गौतम की कविताएँ - क्या हुआ जो नहीं हूँ मैं सफेद लिली सी सुन्दर, गुलाबी कमल सी मादक…


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किनारे

जल राशि, नदी, स्त्री
ठहरती, उफनती, इठलाती
अपने उदगम स्थल से निकलती
एकाकार होने के भाव को लिये,
स्वयं में सब कुछ
समाहित कर लेने के
खयाल को लिये,
जीवन, बच्चे, बालू
शंख, सीप,गोल चिकने पत्थर
शैवाल, मछलियाँ
और भी न जाने क्या-क्या।
इस बात से अनभिज्ञ
कि निरंतन बहते इस समय-चक्र में
धीरे-धीरे बहुतों का साथ छूट जायेगा,
पट विस्तृत होंगे,
होगा दो किनारों का निर्माण
जो हमेशा एक दूसरे को ताकते रहेंगे
आमने –सामने ।
पर यूँ ही बहते-बहते
पट हो चुके थे इतने विस्तृत
कि किनारे हाथ बढ़ाकर
एक-दूजे को छू सकें
इसकी कोई गुंजाइश ही नहीं थी।
जब अहसास हुआ इस बात का
तो बहुत देर हो चुकी थी,
पर अंतहीन यात्रा तो शुरू ही थी
शायद फिर कभी मिलने की आस में.......।
फिर अचानक धीरे-धीरे
नदी सूखने लगी
पट संकीर्ण होने लगा
किनारे सिमटते गये,
नजदीक आते गये
बस कुछ ही हाथों की दूरी थी उनके बीच
पर अब कुछ और प्रश्न
सिर उठाये खड़े थे।
अब प्रश्न था अस्तित्व का।
अगर किनारों के बीच की दूरी खत्म हो जाये तो
नदी का अस्तित्व ही खतरे में था।
नदी का खत्म होना ही
किनारों के मिलने की संभावना थी
पर इस मिलन में
न जानें कितने ही जीव आहत होते
छोटी-छोटी सुनहरी मछलियाँ,
एक पैर पर खड़े बगुले, कछुए,
मछुआरे व उनके परिवार,
किनारे पर उगे वृक्ष,
पानी की तलाश में आते पशु-पक्षी,
घड़ी भर को विश्राम करते
राहगीर, मुसाफिर.......
इन सबके अस्तित्व को खतरे में डालकर
क्या किनारों का मिलना संभव था ?
इसलिए नदी बहती रही
चुपचाप
अपने दर्द को सीने में छुपाये हुए
हर आने-जाने वाले को
प्यार-दुलार और स्नेह बाँटते हुए,
और किनारे चमकते रहे
चाँदनी रातों में ......।


टापू

फैला है चारों ओर
नि:शब्द, निर्जीव सन्नाटा,
पर अन्दर-बाहर तो उठ रही हैं
तेज आवाज़ें।
दूर दूर तक उछालें ले रहा है
नमकीन समुन्दर,
लहरे टकरा रही है
उछल-उछलकर, गर्जनाएं करती हुई
किनारों से,
प्रकाश स्तंभ का प्रकाश
चुंधिया रहा है मेरे आँखों को
और चुंधियाई हुई आँखों से
देख रही हूँ मैं लहरों पे फिसलते
आकाशी सपनों को।
ज्यों ही लहरें किनारों पर
पटकती हैं अपना सिर,
सपने टकराकर हो जाते हैं चूर-चूर।
मेरे नमकीन आँसू हो गये हैं अस्तित्वहीन
इस खारे पानी में घुलकर,
तलाश रही हूँ एक रास्ता
बाहर निकलने के लिये।
पर यह तो सागर है
कोई कालिन्दी तो नहीं
जो छाती चीर कर बना दे एक पगडंडी ............
जिन हाथों को पकड़कर
मै कर रही थी पानी में अठखेलियाँ
वे हाथ इस आपाधापी में छूट गये हैं कहीं।
और लहरों के साथ पटकनी खाते-खाते
बदल गयी हैं हमारी दिशाएँ
जिंदा रहने की चाहत ने
हमें पहुँचा दिया है किन्हीं टापुओं पर
हम दोनों के अलग –अलग टापू?
जहाँ जीना है हमें अकेले-अकेले
हमारी मज़बूरियों के साथ.......

 

पीले पात

क्या हुआ जो नहीं हूँ मैं
सफेद लिली सी सुन्दर,
गुलाबी कमल सी मादक,
नहीं है मुझमें हरे पत्तों सी स्निग्धता
और शबनम की इन्द्रधनुषी ताजगी,
पर मैं तो मेरे इस श्यामल रूप
के साथ ही जीना चाहती हूँ
फूल और पत्तों सा सुन्दर जीवन।
सीखना चाहती हूँ
प्रकृति की परंपराओं से बहुत कुछ,
फूल खिलते हैं
हर नज़र को ठंडक पहुँचाते हैं
धीरे से एक दिन झड़ जाते हैं
सड़ते हैं गलते हैं
और मिट्टी में मिल जाते हैं
मैं भी चाहती हूँ फूलों की तरह
खुशबू बिखेरना,
चाहती हूँ अपनों को सुवासित करना,
भौंरों के लिये पराग बनना
मेरे बच्चों के चेहरों की
मुस्कान बनना.......
और इसके पहले कि मेरी चमक
गायब हो जाये
मेरी महक भाप बनकर उड़ जाये,
मेरा शरीर मेरे विचारों का
साथ देना छोड़ दें,
मैं बोझ बन जाऊँ मेरे अपनों पर,
मेरे अपने मेरी उपेक्षा और तिरस्कार
करने लगें,
मैं सड़-गल कर मरूँ
उससे तो बेहतर है
कि मैं समय रहते झड़ जाऊँ
और मिटटी में मिल जाऊँ !

---

डॉ. मालिनी गौतम
मंगलज्योत सोसाइटी
संतरामपुर-३८९२६०

malini.gautam@yahoo.in

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  1. किनारे और पीले-पात कवितायें जीवन दर्शन से लबरेज़ हैं,बहुत अच्छी हैं, फिर भी जाने क्यूं महसूस होता है दोनों कविताओं ्के रूह की ख़ुशबू में कोई फ़र्क नहीं है। बहरहाल बधाई।

    उत्तर देंहटाएं
  2. एक से बढकर एक रचनायें……………दिल को छू गयीं।
    बाल दिवस की शुभकामनायें.
    आपकी रचनात्मक ,खूबसूरत और भावमयी
    प्रस्तुति कल के चर्चा मंच का आकर्षण बनी है
    कल (15/11/2010) के चर्चा मंच पर अपनी पोस्ट
    देखियेगा और अपने विचारों से चर्चामंच पर आकर
    अवगत कराइयेगा।
    http://charchamanch.blogspot.com

    उत्तर देंहटाएं
  3. पर यूँ ही बहते-बहते
    पट हो चुके थे इतने विस्तृत
    कि किनारे हाथ बढ़ाकर
    एक-दूजे को छू सकें
    इसकी कोई गुंजाइश ही नहीं थी।
    जब अहसास हुआ इस बात का
    तो बहुत देर हो चुकी थी,
    पर अंतहीन यात्रा तो शुरू ही थी..

    Beautiful presentation.

    उत्तर देंहटाएं
  4. ज़िंदगी की हकीकतों से रु-ब-रु कराती रचनाएँ .....
    अच्छे बिम्ब ....अच्छे शब्द ....अच्छे भाव ......बेहतरीन प्रस्तुतियां

    उत्तर देंहटाएं
  5. बेनामी12:13 pm

    taapu aur Kinare lagbhag ek si lageen. peele paat stri ke atm-samman ko darshati achhi lagi. badhai.

    उत्तर देंहटाएं

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