रविवार, 28 नवंबर 2010

राजीव श्रीवास्तवा की कविताएँ

एक फ़ौजी की कहानी

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आया बुलावा धरती माँ का ,

जब दुश्मन ने ललकारा,

चल दिया वीर सब को छोड़ ,

जब माँ ने उसे पुकारा!

 

सारे रिश्ते छोटे पड़ जाते ,

जब माँ होती परेशान,

बढ़ गया अकेला शूरवीर,

अपना सीना तान!

 

पत्नी ने लगाया तिलक ,

और कहा जम के करो सामना ,

बच्ची लिपट रोने लगी ,

बोली पापा जल्दी घर आना !

 

नम आँखों से ली विदाई ,

पर दिल मे था आक्रोश ,

अपने वतन की करने को रक्षा ,

रगों में था जोश !

 

चल दिया सरहद की ओर

पूरा करने अपना फर्ज़

अब जान की परवाह नहीं

चुकाना है माँ का कर्ज़

 

अस्त्र -शस्त्र से हो के लैस ,

बढ़ चला दुश्मन की ओर ,

मार-मार के चित किया ,

दिखा दिया बाजुओं का ज़ोर !

 

विजय मिली फहराया तिरंगा ,

बढ़ाया धरती माँ का मान ,

अचानक एक गोली लगी सीने में ,

और निकली वीर की जान !

 

मरने से पहले साथियों से ,

घर भिजवाया समाचार ,

ये जन्म रहा धरती माँ के नाम ,

अगला तुम पे रहा उधार !

 

शहीद हो गया एक और वीर ,

खुशी-खुशी दे दी अपनी जान ,

शहीद के मरने पर गर्व करो ,

आँसू बहा के ना करो अपमान !

 

हे वीर आज नम आँखों से ,

मैं करूं तुझे सलाम ,

तू ही देश का सच्चा प्रेमी ,

जो भारत माँ के लिए

दे दी अपनी जान-----जय हिंद !

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गाँव वापस जाना है

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शहर की इस दौड़ा भागी से,

अब तंग आ चुका हूँ!

इन उँची-उँची मीनारों,

के बीच में खो गया हूँ!

 

मैं क्या हूँ,मैं क्यों हूँ,

मेरा वजूद क्या है?

अब यही मेरे मुझसे प्रश्न है,

इन सभी प्रश्नों का उत्तर मुझे

पाना है,मुझे अब,

गाँव वापस जाना है!

 

सुबह तनाव में उठता हूँ,

और तनाव में ही जीता हूँ,

दिन भर भागते-भागते,

रात हो जाती है,तो सो ,

जाता हूँ ,इस चिंता के साथ,

की कल फिर भागना है,

मुझे अब सुकून से

पेड़ के नीचे खटिया पे सोना है ,

मुझे गाँव वापस जाना है!

 

नहीं है कोई ऐसा जिसे,

अपना कह सकूं,सब अपनी

दुनिया में जीते हैं.

पड़ोसी -पड़ोसी कों नहीं जनता,

कोई किसी को अपना नहीं मानता,

मुझे अपने लोगों के बीच जाना है

पेड़ की छांव में बैठ बातें करनी है,

मुझे गाँव वापस जाना है!

 

हर तरफ मकान ही मकान

पार्क के नाम पर कुछ घास

कुछ मूर्तियां और झूले,

भीड़ इतनी की जी घबराता है,

भाग जाने को दिल करता है.,

मुझे खेतों में खड़े होकर गन्ना

चूसना है,मुझे खेतों से चिड़िया भगानी है,

मुझे गाँव वापस जाना है!

 

क्या खा रहा हूँ ,नहीं पता

बस जीना है ,इसलिए खाना है,

सो खा रहा हू,ना कोई स्वाद ,ना ही

कुछ खाने की इच्छा,बस कुछ भी

खाए जा रहा हू,

मुझे अपनी माँ के हाथों की

चूल्‍हे पे बनी रोटी खानी है,

मुझे गाँव वापस जाना है!

 

ताजी हवा में साँस लेना

क्या होता है ? ,ये भूल चुका हू!

जब भी साँस लेता हूँ,

जिंदगी के कुछ पल कम,

हो जाने का डर रहता है!

हर तरफ धूल-ही धूल,

चेहरा भी काला पढ़ जाता है

मुझे खेतों में खड़े होकर

खुली हवा में साँस लेना है

मुझे गाँव वापस जाना है!

 

पानी नाप के पीता हूँ,

थोड़े में ही नहा लेता हूँ,

कुछ बाद के लिए बचाना होता है,

यहाँ तक कभी कभी पानी

भी खरीद के पीता हू!

मुझे नदी में नहाना है,

मुझे कुएँ का ताज़ा पानी पीना है,

मुझे तो बस अब

गाँव वापस जाना है!

---

डॉक्टर राजीव श्रीवास्तवा

3 blogger-facebook:

  1. kavitaayen achhi9 ban padi hai .badhai.

    उत्तर देंहटाएं
  2. फौजी की जिंदगी से खूब रू-ब-रू कराया है आप ने
    धन्यवाद्

    उत्तर देंहटाएं

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