गुरुवार, 18 नवंबर 2010

दीप्ति परमार का आलेख : मोहन राकेश की जिन्दगी का सच्चा दस्तावेज - एक और जिन्दगी

'एक और जिन्दगी' मोहन राकेश की श्रेष्ठ एवं चर्चित कहानी है । पति पत्नी के दाम्पत्य सम्बन्घों पर प्रकाश डालने वाली यह कहानी मोहन राकेश की अन्य कहानियों से सर्वथा भिन्न है, क्योंकि यह वह कहानी है जिसमें मोहन राकेश ने अपने जीवन की महत्त्वपूर्ण घटनाओं का हूबहू चित्र्ण किया है। 'एक और जिन्दगी' के नायक प्रकाश नायिका बीना तथा बच्चा पलाश तथा प्रकाश की दूसरी पत्नी निर्मला के माध्यम से मोहन राकेश ने अपने शीला (राकेश जी की पहली पत्नी) और नीत (मोहन राकेश और शीला का बेटा) तथा पुष्पा (मोहन राकेश की दूसरी पत्नी) की जिन्दगी की घटनाओं को केन्द्र में रखा है। मोहन राकेश का अधिकांश लेखन उनके व्यक्तिगत जीवन की परिस्थितियों पर किसी न किसी रूप में आधारित है। मोहन राकेश ने अपने जीवन में जो भोगा उसे ही शिल्प की उँचाई के साथ अपनी साहित्यिक रचनाओं में निरूपित किया है। उन्होंने जब भी और जो कुछ भी लिखा, अपने ही जीवन के इतिहास को फिर फिर दोहराया है। 1 अपने साहित्य में अपने ही जीवन को दोहराने की बात का समर्थन करते हुए मोहन राकेशने अपनी डायरी में लिखा है- जिस तरह 'सोलर' में शराब बरसों डंजनतम होती रहती है उसी तरह छोटी छोटी घटनाएँ बरसों दिमाग में डंजनतम होती रहती है। उन्हें फिर फिर लिपिबद्ध करने में पुरानी शराब का सा ही नशा हासिल होता है। 2

'एक और जिन्दगी' कहानी का नायक प्रकाश और नायिका बीना अपनी इच्छा से विवाह करते है। किन्तु कुछ ही दिनों बाद यह बंधन दोनों के लिए परेशानी का कारण बन जाता है। क्योंकि दोनों समान रूप से बौद्धिक होने के कारण अपनी अपनी अतृप्तियों के लिए असंतुष्ट रहते और अपने ही अहं की तुष्टि के लिए परेशान। दोनों यह भी समझ रहे थे कि शायद सम्बन्ध की शुरुआत ही गलत हुई है। दोनों के बीच एक दूसरे के प्रति 'अन्डरस्टेडिंग' का विकास ही नहीं हुआ था जो प्रणय सम्बन्धों को जोड़े रखता है। परिणामतः ब्याह के कुछ ही महीने बाद से ही पति पत्नी अलग रहने लगे थे। ब्याह के साथ जो सूत्र् जुड़ना चाहिए था, वह जुड़ नहीं सका था। दोनों अलग अलग जगह काम करते थे और अपना अपना स्वतंत्र् ताना-बाना बुनकर जी रहे थे। लोकाचार के नाते साल छः महीने कभी एक दो बार मिल लिया करते थे। 3

इन्हीं परिस्थिति को मोहन राकेश ने अपने जीवन में झेला था। मोहन राकेश ने स्वीकार किया है कि जीवन के उखड़ेपन को समेटने के प्रयास में और घर की तलाश में उन्होंने शीला से विवाह किया था किन्तु वह एक सिरे पर मोहभंग की शुरुआत थी। इस विवाह के साथ ही सहसा मैंने अपने को रुका हुआ पाया, रुका हुआ ही नहीं जड़ और स्तंभित। 4 विवाह के दिन से ही मोहन राकेश को शीला के अहंवादी स्वभाव का अनुभव होने लगा था। मोहन राकेश ने राजेन्द्र पाल से इस विषय में कहा था। विवाह की रस्मों में सादगी की बजाय भौंडा आडंबर देखकर उन्हें और भी दुख हुआ। विवाह के बाद पहली रात को ही असफलता के बीज बो दिये गये थे। उनकी पत्नी आकाश पर उड़ी जा रही थी कि आखिर तुम्हें मेरे हठ के सामने झुकना पड़ा न। बहुत ज़ीद कर रहे थे, विजय आखिर किसकी हुई ? मेरी न ? इसके बाद मानसिक यातनाओं और कुंठाओं का दौर शुरु हुआ। 5 इस विषय में मोहन राकेश अपनी डायरी में लिखते है मन बार-बार उन दिनों में लौट जाता है, जब यह विवाह नहीं हुआ था। यदि यौवन के प्रथम चरण में ही यह कालरात्रि आरंभ न हो जाती। बार-बार मन को मारा है। बार-बार अपने को और दूसरों को धोखा दिया है। बार-बार यह चाहा है कि इस दुःस्वप्न की परिणति मंगलमय हो। 6

विवाह के कुछ ही महीने में मोहन राकेश और शीला अलग-अलग जगह रहने लगे थे। मोहन राकेश नौकरी के लिए जलन्धर और शीला आगरा चली गयी और फिर से कालेज में काम करने लगी। दोनों अजनबी बनकर अपने अपने रास्तों पे चलते रहे। सन् 1952 से 1957 तक यानि पाँच साल तक दोनों ने अलग-अलग जगहों पर रहकर ही अपना वैवाहिक सम्बन्ध निभाया। कभी-कभी मिल भी जाते तो दुनिया को यह दिखाने का प्रयास करते कि दोनों आधुनिक ढंग से स्वस्थ वैवाहिक जीवन जी रहे हैं। मोहन राकेश और शीला के जीवन में जब नीत का प्रवेश हुआ तब वे अधिक चिंतित हो गये। यद्यपि व्यक्तिगत जीवन बहुत तनावों के बीच जिया जा रहा था, फिर भी अपने परिवेश से कटे होने की अनुभूति का स्थान सर्वथा दूसरी अनुभूति ने ले लिया था और वह भी जुड़े रहने की अनिवार्यता की अनुभूति। एक तरह की कड़वाहट इस अनुभूति में भी थी, पर वह कड़वाहट आरोपित नहीं थी। उसका उद्देश्य भी जुड़े होने की स्थिति से मुक्ति पाना नहीं उसकी तत्कालीन शर्तो को अस्वीकार करते हुए भी जुड़े रहने के सार्थक संदर्भों को खोजना था। 7 नीत की मौजूदगी से भी मोहन राकेश और शीला के बीच कोई समझौता नहीं हुआ।

यही स्थिति 'एक और जिन्दगी' के प्रकाश और बीना की है। दोनों सिर्फ अपने अपने व्यक्तित्व को लेकर सचेत है। बच्चे की पहली वर्षगांठ पर प्रकाश और बीना के संबंध और भी लड़खड़ाने लगते है। बीना पलाश की वर्षगांठ मनाने का प्रयोजन अपने पिता के घर करती है और प्रकाश अपने घर। प्रकाश बीना और पलाश को अपने घर बुलाना चाहता है। किन्तु बीना एक घंटे के लिए भी यहाँ आने को तैयार नहीं होती। अतः प्रकाश महेमानों को चाय पिलाकर विदा कर देता है और पलाश के लिए खरीदे उपहार को नौकरों के हाथ बीना को भेज देता है। दोनों में से कोई भी बच्चे के लिए समझौता करने को तैयार नहीं होता।

प्रकाश और बीना के बीच एक ऐसी स्थिति बन जाती है कि आगे कुछ संभावना नहीं रहती। एक अनिवार्य अलगाव और बाद में कोर्ट द्वारा स्वीकृत तलाक ही आखिरी विकल्प बन जाता है। प्रकाश पलाश पर अधिकार चाहता है। इस पर बीना कहती है अगर आपके पास पिता का दिल होता तो आप पार्टी में न आते ? यह तो आकस्मिक घटना है कि आप इसके पिता है। 8 बीना किसी भी हालत में पलाश का अधिकार प्रकाश को सौंपने के लिए तैयार नहीं है। प्रकाश भी सोचता है कि बच्चे के लिए फिजूल की भावुकता में कुछ नहीं रखा। सम्बन्ध विच्छेदन के बाद फिर से विवाह कर लिया जाए तो घर में और बच्चे आ जायेंगे।

शीला से तलाक के बाद नीत के सम्बन्ध में सोचकर मोहन राकेश बहुत दुःखी थे नीत की तस्वीर सामने है। मुझे इस बच्चे से कितना प्यार है फिर भी। 9 और बच्चा बड़ा होकर इस परिस्थिति को ठीक से समझ सके तो मुझे खुशी होगी। न समझ सके तो भी दुख नहीं होगा। बच्चे की ग़लतफहमी उसकी माँ को सांत्वना दे सके तो भी मैं उसे सांत्वना से वंचित नहीं करना चाहूँगा। 10 तलाक के बाद की मनःस्थिति को मोहन राकेश ने इन शब्दों में स्पष्ट किया है आज सम्बन्ध विच्छेदन के इतने दिन बाद मैं निश्चित रूप से कह सकता हूँ कि दाम्पत्य में जो सहचर्य चाहिए वह दोनों में कहीं नहीं था, कोई भी परम्परापेक्षिता नहीं थी। यह एक दुर्वाह स्वप्न छाया थी, जिसे हट जाना ही चाहिए 11

प्रथम विवाह की असफलता से उबरने के लिए मोहन राकेश ने पुष्पा से दूसरा विवाह किया। पुष्पा उनके एक मित्र की बहन थी। पहली पत्नी शीला और पुष्पा में बड़ा अंतर था। फिर भी यह विवाह मोहन राकेश के लिए गलत चुनाव का ही परिणाम था। इस विवाह से मोहन राकेश को बड़ा संघर्ष झेलना पड़ा क्योंकि उनकी यह पत्नी मानसिक रूप से विक्षिप्त थी। यह तथ्य उनके सामने शादी के बाद आया। यह उसकी नियति का अजीब खेल था। पत्नी की इस मानसिक स्थिति ने उन्हें दर-दर की ठोकरें खाने को मजबूर कर दिया था। घर छोड़ने के कुछ महीने बाद कमलेश्वर से सारी बातें स्पष्ट करते हुए मोहन राकेश ने कहा था कमलेश स्थिति यह थी कि मैं आत्महत्या कर लेता। चार महीने से माँग माँगकर कपड़े पहन रहा हूँ। सचमुच मैं जान दे देता। 12 मोहन राकेश ने वैवाहिक जीवन के वो दर्दनाक मोड़ों को पार किया था जिससे 'पत्नी' नाम से ही उनमें एक तरह की दहशत भर जाती।

'एक और जिन्दगी' का प्रकाश अपनी बिखरी जिन्दगी को समेटने के लिए अपने मित्र जुनेजा की बहन निर्मला से विवाह करके नये जीवन का प्रारंभ करता है। कुछ ही दिनों में प्रकाश के सामने निर्मला का मानसिक विक्षिप्त रूप आता है। निर्मला की यह स्थिति प्रकाश द्वारा आरंभ की गयी नयी जिन्दगी के प्रयत्न को काफी करुणाजनक प्रमाणित करता है। निर्मला के साथ रहते उसे लगता है कि वह जी न रहा हो सिर्फ अंदर ही अंदर घुट रहा हो। क्या यही वह जिन्दगी थी जिसे पाने के लिए उसने इतने साल अपने आप से संघर्ष किया था। 13 घुटन भरी जिन्दगी से पीछा छुड़ाने के लिए प्रकाश घर से भागकर पहाड़ी पर चला जाता है। यद्यपि वहाँ उसे घूमने आये बीना और पलाश अवश्य मिलते है किन्तु बीना और प्रकाश के बीच कोई आत्मीय संवाद नहीं होता और दोनों अपनी अपनी राह पर जाते दिखाई देते हैं। दो विवाहों की असफलता के बाद प्रकाश अन्दर ही अन्दर घुटकर रह जाता है। अंततः बीयर की बोतलों में वह अपने अकेलेपन को दूर करने का प्रयत्न करता है।

अतः स्पष्ट है कि 'एक और जिन्दगी' कहानी में मोहन राकेश ने सिर्फ पात्रें के नाम बदलकर अपने ही जीवन की घटनाओं को शब्दांकित किया है। यह मोहन राकेश के जीवन की वे घटनाएँ है जिसने राकेश होम ब्रेकर है और एक ही औरत के साथ नहीं रह सकता। जैसा सबसे बड़ा इल्जाम लगाया था। डॉ. इन्द्रनाथ मदान मोहन राकेश के जीवन की विड़म्बना को स्पष्ट करते हुए लिखते है राकेश को घर और बीबी बदलने की विवशता हर दो तीन साल बाद पड़ जाती थी। यह अमीरों की पुरानी गाड़ियाँ बदलने की ऐयाशी नहीं थी लाचारी थी। अपने ही जीवन की घटनाओं को स्वर देनेवाली यह कहानी मोहन राकेश के जीवन का सच्चा दस्तावेज बनी नज़र आती है।

संदर्भ- 1 मोहन राकेश रंग,शिल्प और प्रदर्शन- डॉ ़जयदेव तनेजा पृष्ठ, 22 2 मोहन राकेश की डायरी- पृष्ठ, 97 3 मोहन राकेश की संपूर्ण कहानियाँ- पृष्ठ, 278 4 मोहन राकेश की डायरी- पृष्ठ, 59 5 राजेन्द्रपाल के- 'अन्तर्विरोधी व्यक्तित्व' लेख से (नाटककार मोहन राकेश-सं ़सुंदरलाल कथूरिया) 6 मोहन राकेश की डायरी-पृष्ठ, 93 7 वही- पृष्ठ, 35 8 मोहन राकेश की संपूर्ण कहानियाँ- पृष्ठ, 279 9 मोहन राकेश की डायरी- पृष्ठ, 126 10 वही- पृष्ठ, 79 11 वही- पृष्ठ, 121 12 मेरा हमदम मेरा दोस्त- कमलेश्वर पृष्ठ, 11 13 मोहन राकेश की संपूर्ण कहानियाँ- पृष्ठ, 282

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डॉ. दीप्ति बी. परमार, प्रवक्ता हिन्दी-विभाग आर. आर. पटेल महाविद्यालय, राजकोट

3 blogger-facebook:

  1. इस आलेख में नई कहानी आंदोलन के सशक्‍त हस्‍ताक्षर मोहन राकेश के जीवन की त्रासदियॉं पूरी संजीदगी के साथ मुखर हुई है। राकेशजी जिंदगी भर एक घर पाने को तडपते रहे। उनकी यह कहानी सम्‍बन्‍धों की यंत्रणा को झेलते हुए उन लोगों की कहानी है जो समाज के बीच रहकर भी अकेलापन म‍हसूस करते हैं। ... एक अच्‍छा आलेख उपलब्‍ध कराने के लिए आभार।

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  2. जानकार खुशी हुई की ये कहानी उनके जीवन की वास्तविक घटन हे

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  3. Itne dard ko sah kar jina kafi mushkil hota hai.. Mujhe lagta hai kahin na kahin unhe apni pehli biwi ko mauka dena chahiye..apne liye na sahi lekin bachhe ki khushi ke liye Hi sahi..

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