शुक्रवार, 19 नवंबर 2010

प्रभुदयाल श्रीवास्तव के बालगीत

 

करूणा दया प्रेम का भारत ‌

 

भारत माँ का शीश हिमालय‌

चरण हैं हिंद महासागर,

मातुश्री के हृदय देश में

बहती गंगा हर हर हर|

 

अगल बगल माता के दोनों

लहराते हैं रत्नाकर,

पूरब में बंगाल की खाड़ी

पश्चिम रहे अरब सागर|

 

मध्यदेश में ऊँचे ऊँचे

विंध्य सतपुड़ा खड़े हुये,

सोन बेतवा चंबल के हैं

यहीं कहीं चरणों के घर|

 

छल छल छलके यहां नर्मदा

यमुना केन चहकतीं हैं,

दक्षिण में गोदावरी कृष्णा

पार उतारें भवसागर|

 

हिंदू मुस्लिम सिख ईसाई

रहते हैं सब मिलजुल कर,

यहां चाहते देवता रहना

स्वर्ग लोक से आ आ कर|

 

कहीं भेद न भाव धर्म का

न ही जाति का बंधन,

करुणा दया प्रेम का भारत‌

पावन निर्मल मन निर्झर|

----

 

वीर बहादुर चुहिया रानी

 

बिल से निकली चुहिया रानी

लगी चाल चलने मस्तानी|

 

बोली मैं हूं घर की मुखिया

दुनियाँ है मेरी दीवानी|

 

पूर्ण तरह से ही मेरा है

इस घर का सब राशन पानी|

 

कभी भूल से न कर देना

मुझसे लड़ने की नादानी|

 

मेरे नाना पहिलवान हैं

बड़ी लड़ाकू मेरी नानी|

 

तभी अचानक किसी जगह से

आ धमकी बिल्ली महारानी|

 

डर के मारे बिल में घुस गई

वीर बहादुर चुहिया रानी|

--

 

कभी न खाना तंबाकू

 

किसी किराने की दुकान से

तंबाकू के पाउच ले आते,

गली गली में बच्चे दिखते

खुल्ल्म खुल्ला गुटखा खाते|

 

बाली उमर और ये गुट्खा

कैसे कैसे रोग बुलाते,

तड़फ तड़फ कर निश्छ्ल नन्हें

हाय मौत को गले लगाते|

 

ढेरों जहर, भरे गुटखों में

टी बी का आगाज कराते,

और अस्थमा के कंधे चढ़‌

मरघट तक का सफर कराते|

 

मर्ज केंसर हो जाने पर

लाखों रुपये रोज बहाते,

कितनी भी हो रही चिकित्सा

फिर भी प्राण नहीं बच पाते|

 

सरकारी हो हल्ले में भी

तम्बाकू को जहर बताते,

पता नहीं क्यों अब भी बच्चे

गुटखा खाते नहीं अघाते|

 

वैसे बिल्कुल सीधी सच्ची

बात तुम्हें अच्छी बतलाते,

जो होते हैं अच्छे बच्चे

तम्बाकू वे कभी न खाते|

-----

1 blogger-facebook:

रचनाओं पर आपकी बेबाक समीक्षा व अमूल्य टिप्पणियों के लिए आपका हार्दिक धन्यवाद.

स्पैम टिप्पणियों (वायरस डाउनलोडर युक्त कड़ियों वाले) की रोकथाम हेतु टिप्पणियों का मॉडरेशन लागू है. अतः आपकी टिप्पणियों को यहाँ प्रकट होने में कुछ समय लग सकता है.

----

1.5 लाख गूगल+ अनुसरणकर्ता, 1500 से अधिक सदस्य

/ 2,500 से अधिक नियमित ग्राहक
/ प्रतिमाह 10,00,000(दस लाख) से अधिक पाठक
/ 10,000 से अधिक हर विधा की साहित्यिक रचनाएँ प्रकाशित
/ आप भी अपनी रचनाओं को विशाल पाठक वर्ग का नया विस्तार दें, आज ही नाका से जुड़ें. नाका में प्रकाशनार्थ रचनाओं का स्वागत है.अपनी रचनाएँ rachanakar@gmail.com पर ईमेल करें. अधिक जानकारी के लिए यह लिंक देखें - http://www.rachanakar.org/2005/09/blog-post_28.html

विश्व की पहली, यूनिकोडित हिंदी की सर्वाधिक प्रसारित, समृद्ध व लोकप्रिय ई-पत्रिका - नाका

मनपसंद रचनाएँ खोजकर पढ़ें
गूगल प्ले स्टोर से रचनाकार ऐप्प https://play.google.com/store/apps/details?id=com.rachanakar.org इंस्टाल करें. image

--------