शनिवार, 20 नवंबर 2010

प्रमोद भार्गव की कहानी – परखनली का आदमी

सुनो...! सुनाएं एक कहानी.....। परखनली के आदमी की कहानी.....। यह कहानी और कहानियों की तरह परीलोक की कथा नहीं है, न ही भूतकाल की कहानी है, न ही वर्तमान की। यह कहानी है भविष्‍य काल की...इक्‍कीसवीं सदी के दूसरे दशक की। आप प्रबुद्ध श्रोताओं में जिज्ञासा जागी होगी कि मैं भला इक्‍कीसवीं सदी के दूसरे दशक में पहुंचे बगैर इस सदी के दूसरे दशक के अंतिम चरण की कहानी कैसे सुना सकता हूं। वह भी परखनली के आदमी की, जो अभी शैश्‍व अवस्‍था में है..अभी उसे अभी आदमी बनने के लिए पच्‍चीस से तीस वर्षों का लंबा सफर तय करना होगा ? आपकी जिज्ञासा उचित है, लीजिए मैं आपको बताये देता हूं कि मैंने परखनली के आदमी के मस्‍तिष्‍क के स्‍नायु तंत्रों के बीच एक लघु कंप्‍यूटर छिपा रखा है। जिसमें परखनली के आदमी के डाटाज फिट हैं....। बस बटन दबाया और कंप्यूटर के माध्‍यम से मेरा मस्‍तिष्‍क इक्‍कीसवीं सदी के दूसरे दशक के अंतिम चरण में छलांग लगा देता है। तो अब गौर फरमाइए मैं बटन दबाता हूं....

यह सन्‌ 2020 है...।

अब इस युग को कलियुग कहने की बजाए कंप्‍यूटर युग कहना ही उचित है। बीसवीं सदी के उत्‍तरार्द्ध में मनुष्‍य के हाथों में कल-पुर्जों पर जो नियंत्रण था उस पर अब कंप्‍यूटर ने विजय पा ली थी और अब रोबोट का प्रचलन भी आमफहम हो गया है।

परखनली का आदमी इस वक्‍त इंदिरा गांधी मार्ग पर बने विजयंत अपार्टमेंट्‌स के चालीसवें माले पर एचआईजी फ्‍लैट में सो रहा है। इधर आसमान में सूरज निकलता है उधर कंप्‍यूटर स्‍क्रीन के संकेत पर स्‍वतः ही फ्‍लैट का प्रमुख द्वार खुलता है और एक औरत के प्रविष्‍ट होने के साथ ही स्‍वयंमेव बंद हो जाता है। वह औरत खाना बनाने वाली होती है। थोड़ी देर में वह चाय बनाकर टेबिल पर रख जाती है। कंप्‍यूटर बोलता है, ‘‘उठिए चाय पीजिए..।‘‘ किसी गृहिणी की तरह विनम्र और आत्‍मीय स्‍वर शयनकक्ष में तैर जाता है। वह आदमी उठकर बैठता है और चाय की चुस्‍कियां लेने लगता है। इधर कंप्‍यूटर स्‍क्रीन पर इंटरनेट के जरिए परखनली के आदमी की पसंद के समाचारों का प्रसारण प्रारंभ हो जाता है। इस आदमी की पसंद के समाचार होते हैं- राजनीति, खेल, अपराध एवं शेयर बाजार के समाचार।

इसके बाद वह उठकर दिनचर्याओं से निवृत होने के लिए स्‍नानघर में प्रवेश कर जाता है। इलेक्‍ट्रिक शेवर से दाढ़ी बनाता है और कमोड पर शौच के लिए बैठ जाता है। इस बीच वह किसी विदेशी सिगरेट को सुलगाकर लंबे-लंबे कश खींचकर धुआं उड़ाता रहता है। स्‍नान करने के लिए वह निर्वस्‍त्र होकर बाथ टब में लेट जाता है। स्‍वचालित यह बाथ-टब मनुष्‍य के शरीर के तापमान की क्षमताओं के अनुसार ठंडा और गरम होता रहता है। शैंपू और इत्र (परफ्‍यूम) एक निश्‍चित मात्रा में पानी में मिला होता है। टब से निकलकर वह गर्म वायु हीटर (हॉट एयर हीटर) चलाता है। गर्म हवा उसके शरीर को स्‍पर्श करती है और कुछ ही क्षणों में उसका बदन सूखकर खुशबू की तरह तरोताजा हो उठता है। वह बालों में कंघी करता है और गाउन ओढ़कर बाहर निकल आता है।

इस बीच नौकरानी डाइनिंग टेबिल पर नाश्‍ता लगा देती है। दो अण्‍डे का आमलेट, काजू, किसमिस युक्‍त दूध और सेब-मौसमी नाश्‍ते में खाने की उसकी आदत है। कंप्यूटर के निवेदन पर वह कुर्सी पर बैठता है और नाश्‍ता करते हुए निगाहें कंप्यूटर स्‍क्रीन पर केन्‍द्रित कर देता है। कंप्यूटर सुबह से अब तक आये दूरभाष एवं मोबाइल संदेशों का प्रसारण प्रारंभ कर देता है।

नाश्‍ता करने के बाद वह आदमी सूट पहनता है। टाई की नॉट आदमकद दर्पण के सामने जाकर ठीक करता है और जूते पहनकर ब्रीफकेस हाथ में लेकर जाने को तत्‍पर हो जाता। इसी समय नौकरानी उसके सामने जाकर गिड़गिड़ाती है ''बाबूजी....‘‘

''क्‍या है ?‘‘ झिड़कते हुए।

''बाबूजी आज मेरे बेटे की फीस जमा होनी है....। कुछ रूपये एडवांस दे दें तो बड़ी मेहरबानी होगी.....।‘‘

''तुझसे कितनी बार कहा कि तेरा महीना दस तारीख को पूरा होता है.....। पर तू है कि दस दिन पहले से पैसे मांगने लगती है....।‘‘ और वह चल पड़ता है।

''बाबूजी कॉनवेंट स्‍कूल है....आज फीस जमा नहीं हुई तो नाम कट जायेगा।‘‘

''क्‍यों पढ़ाती है कॉनवेंट स्‍कूल में बच्‍चों को ? वह तो पैसे वालों के लिए है। तुम्‍हारे लिए थोड़े ही है। वहां से नाम कटाकर निगम के या सरकारी स्‍कूल में लिखा दे। तुम लोगों के लिए तो यही स्‍कूल है....। इन स्‍कूलों में वजीफा भी मिलेगा और मध्‍यान्‍ह भोजन भी। वैसे भी इतने कॉम्‍पटीशन के युग में पढ़कर वह बनेगा भी क्‍या ?‘‘

‘‘.........''

अवाक नौकरानी जाते हुए बाबूजी को देखती रही। दरवाजा खुला। वह बाहर हुआ और दरवाजा बंद हो गया। वह सोचती रही, जरा भी सहानुभूति नहीं है। कैसा निर्मोही है यह आदमी.....मानवता पर कलंक! जिसने अपने मां बाप को नहीं बख्‍शा वह भला साधारण नौकरानी के हालातों पर क्‍या तरस खायेगा ?

वह आदमी लिफ्‍ट से उतरकर नीचे आता है। गैरेज में पहुंचकर कार का दरवाजा खोलकर बोर्ड में चॉबी लगा देता है। की बोर्ड पर रंग बिरंगी बिजलियां और संकेत चमकने लगते हैं। वह कुछ बटन दबाता है और सीट से टिक कर बैठ जाता है। कार में लगा दूरदर्शन चालू हो जाता है। स्‍क्रीन पर क्रिकेट खेलते हुए खिलाड़ी नजर आते हैं। भारत और आस्‍ट्रेलिया के बीच दिल्‍ली के जवाहर लाल नेहरू स्‍टेडियम में खेले जा रहे वन-डे मैच का प्रसारण हो रहा है।

सूरज की रोशनी से चलने वाली, कंप्यूटर - नियंत्रित यह कार अपने आप बैक होकर मार्ग पर आती है और गंतव्‍य की ओर चल देती है। अब आपको न चौराहों पर लाल या हरी बत्‍ती देखने की जरूरत और न आगे - पीछे आजू-बाजू से आने वाले वाहनों से चौकन्‍ना रहने की आवश्‍यकता।

बहुमंजिली इमारतों के बीच से गुजरती हुई परखनली के आदमी की यह कार एक तीस मंजिले विशाल भवन के तलघर में बने पार्किंग में जाकर खड़ी होती है। वह चाबी निकाल दरवाजे का ताला लगाता है और भवन में प्रवेश कर जाता है। कंप्‍युटरीकृत मैटल डिटेक्‍टरों के बीच से उसे गुजरना पड़ता है। वह लिफ्‍ट से उतरता है और कक्ष क्रमांक 522 के सामने पहुंचकर सरसरी निगाह से अपने नाम की तख्‍ती पढ़ता है। शशांक....कोष्‍टक में लिखा था-भारतीय प्रशासनिक सेवा। दरअसल इस भवन में गंतव्‍य स्‍थान को कक्ष क्रमांक पढ़कर ही पहचाना जा सकता है, क्‍योंकि इस पूरे भवन की बनावट एक जैसी है। इस भवन की दीवारें एवं छतें मानक प्‍लास्‍टिक की बनी हुई हैं। इस प्‍लास्‍टिक को निर्माण करते समय ऐसे रासायनिक घोलों (क्रियाओं) से गुजारा जाता है कि परमाणु बम जैसे भयंकर विस्‍फोटकों व जैविक हमलों का भी इस पर कोई प्रभाव नहीं पड़ता।

''शुभ प्रभात..।‘‘

स्‍वचालित यांत्रिक मानव (रोबोट) विनम्र स्‍वर प्रगट कर 'जय हिंद‘ की मुद्रा में शशांक का अभिवादन करता है।

''शुभ प्रभात....।‘‘ शशांक यंत्र चालित-सी मुस्‍काराहट प्रगट करता हुआ मजाक के लहजे में कहता है ''और कैसे हो गंगाराम....?‘‘ देश में कम्‍प्‍यूटर और रोबोट का युग भले ही अवतरित हो गया हो लेकिन आज भी काम के आधार पर नामों का चलन है। जो आर्थिक और वर्गीय विषमता को सहज ही उजागर कर देते हैं।

''अच्‍छा....बहुत सुन्‍दर, अति सुन्‍दर.....।‘‘

इतने में रोबोट के संकेत पर यंत्रचालित दरवाजा खुल जाता है और शशांक अंदर प्रविष्‍ट हो जाता है। कंप्यूटर क्रांति के बाद देश में कंप्यूटर क्रांति की ही तरह जोर-शोर से रोबो (यांत्रिक मानव) क्रांति आई थी और कार्यालयों में चपरासियों की जगह यांत्रिक मानव तैनात हो गए थे। अब फाइलें एक कमरें में से दूसरे कमरे में लाने ले जाने का काम, अधिकारियों, बाबुओं को चाय-पानी पिलाने का काम यांत्रिक मानव बखूबी करने लगे हैं। रेलवे स्‍टेशनों एवं बस अड्‌डों पर कुली का काम भी यांत्रिक मानवों ने हथिया लिया है। ये यांत्रिक मानव कुलीगिरी का काम पूरी ईमानदारी एवं जवाबदारी के साथ निभाते। निर्धारित भाड़ा अदा करने के बाद एवं लक्ष्‍य निर्धारित निर्देशन देने के बाद यात्रियों का माल असबाब निश्‍चित गाड़ी में आरक्षित शीट या बर्थ तक पहुंचा दिया जाता।

होटलों में बावर्ची का काम तथा चौराहों पर यातायात पुलिस का काम भी यांत्रिक मानवों के हाथों में आ गया है। इन यांत्रिक मानवों के मस्‍तिष्‍कों में सशक्‍त कंप्यूटर बिठा दिए गए हैं। खनखनाती हुई धातुई हिंदी का उच्‍चारण इनके मुख से एक दम स्‍पष्‍ट और शुद्ध निकलता है। जब कोई मसखरा व्‍यक्‍ति इन्‍हें बार-बार बेवजह छेड़ता तो इनका व्‍यवहार कठोर हो जाता और ये आंखें चढ़ाकर बोलते-''मेरा समय बरबाद नहीं कीजिए श्रीमान!''...स्‍त्री होती तो, ‘‘श्रीमती आगे बढ़िये और जाइये....।‘‘

यह थी परखनली के आदमी श्री शशांक की दिनचर्या के कुछ घंटों की कहानी। अब मैं दिनचर्या को यहीं स्‍थगित कर शशांक के जीवन के भूतकाल की कहानी सुनाता हूं-

श्रीमान एवं श्रीमती कुमार की जब शादी हुए पांच वर्ष गुजर जाने के बाद भी कोई संतान पैदा नहीं हुई तो उनकी संतान चाह की भावना उग्र हो गई। कुमार दंपत्‍ति ने शहर के सभी प्रमुख स्‍त्री विशेषज्ञों से चैकप कराया। महीनों दवाईयों का सेवन किया। परहेज का दृढ़ता से पालन किया। पर नाकाम रहे। साधु-संतों की शरण में भी गए। उनके द्वारा बताये गए टोनों टोटकों का भी निर्वाह किया। तांत्रिकों से बनवाकर गण्‍डे ताबीज भी पहने। व्रत भी किए। मन्‍नतें भी मांगी। पर सब चेष्‍टाएं अप्रभावी रहीं। कोई सार्थक बात बनी नहीं। अंत में सभी उम्‍मीदों को तिलांजलि देकर उन्‍होंने अपने किसी निकटतम रिश्‍तेदार की औलाद को गोद लेने की बात सोची। किसी बच्‍चे को गोद लेते, इससे पहले भारत में सफलता पूर्वक परखनली शिशु का जन्‍म हो गया था। इस नये आविष्‍कार की खूबियों से वाकिफ होने के उपरांत निसंतान दंपत्‍ति नई आशाओं से भर गए थे। कुमार दंपत्‍ति ने भी चैकप से ज्ञात कर लिया था कि श्रीमान कुमार में शुक्राणु तो ठीक थे किंतु श्रीमती कुमार का गर्भाशय गर्भ धारण करने के लायक नहीं था। उनका गर्भाशय बेहद कमजोर था। परखनली में फ्‍यूजन करने के उपरांत भ्रूण को गर्भाशय में रोपने के बाद गर्भपात होने का भय था। इस खतरे से चिकित्‍सकों ने कुमार दंपत्‍ति को अवगत कर दिया। वे फिर निराश हो गए थे। कुछ समय बाद ही आशा की नई किरण पुनः चमकी। अब गरीब महिलाओं की कोख गर्भ - धारण के लिए किराये से मिलना शुरू हो गईं थीं। इच्‍छुक दंपत्‍ति एक निश्‍चित राशि किराये के रूप में भुगतान करने के बाद मजबूर दीन-हीन महिलाओं के गर्भाशय किराये से ले सकते थे। अनेक नर्सिंग होमों ने यह धंधा प्रारंभ कर दिया था। सड़क पर गिट्‌टी-मुरम ढोने वाली तमाम महिलाओं ने गर्भधारण करने का धंधा अपना लिया था। स्‍वस्‍थ महिलाओं को इस काम में पैसे खूब मिलते और निसंतान दंपत्‍ति उनका खाने-पीने का खयाल भी खूब रखते। पर संतान जन्‍मने के बाद इन्‍हें घोर तिरस्‍कार भोगना पड़ता। संतान के पैदा होते ही इन्‍हें संतान से अलग कर दिया जाता। अब संतान का लालन-पालन आयाएं करतीं। जन्‍मदात्री....किराये की मां के आंचल के दूध की एक भी बूंद बच्‍चे के मुख में न जाने दी जाती। बालक के मुंह में बोतल ठूंस दी जाती। कुमार दंपत्‍ति ने भी यही उक्‍ति अपनाई। श्रीमती कुमार बिना किसी प्रसव पीड़ा के, बिना आंचल में दूध का अनुभव किए एक सुंदर स्‍वस्‍थ नन्‍हें मुन्‍ने बच्‍चे की मां बन गईं। इस दुधमुंहे की ज्‍योतिष विशेषज्ञ कंप्यूटर से जन्‍मपत्री बनवाई गई। उसी के आधार पर नामकरण हुआ...शशांक....। बड़े से बंगले में दो-दो आयाओं और ढेरों देशी-विदेशी विद्युती खिलौनों के बीच नन्‍हा शशांक बड़ा होने लगा।

श्री कुमार एक सॉफ्‍टवेयर कंपनी कें प्रबंधक थे। निजी संस्‍थान होने की वजह से उनकी व्‍यस्‍तता कुछ अधिक रहती। हवाई दौरों और पंचतारा होटलों में प्रायोजित कॉकटेल पार्टियों में ही उनका अधिकांश समय गुजरता। श्रीमती कुमार का याराना दोस्‍ताना कुछ ज्‍यादा ही था। अपने महिला संगठनों की वे सक्रिय सदस्‍या होने के साथ-साथ कुछेक की अध्‍यक्ष एवं सचिव भी थीं। इन्‍हीं संगठनों की गतिविधियों के क्रियान्‍वयन में लगी रहना ही उनकी प्रमुख दिनचर्या थी। जितनी गहरी रूचि उनकी इन संस्‍थाओं को सक्रिय बनाये रखने में थी उतनी दिलचस्‍पी उन्‍होंने कभी बालक शशांक के लालन-पालन में नहीं दिखाई। मातृत्‍व का वह अलौकिक भाव बेचैनी बनकर उनके जेहन में उभरता ही नहीं, जो एक आम मां के अंतःकरण में स्‍वाभाविक प्रवृति बनकर उभरता है। संभवतः यही वजह थी कि बच्‍चे के प्रति उनका आकर्षण औपचारिक ही रहता। वात्‍सल्‍य स्‍नेह के ऐसे ही औपचारिक क्षणों में एक दिन शशांक ने उनके ऊपर टट्‌टी पेशाब कर दी। घृणा और बदबू से उनका जी मिचलाने लगा। तत्‍क्षण उन्‍होंने बच्‍चे को आया को थमाया और मुख हथेली से दाबे हुए वे बाथरूम में घुस गईं। वहां उन्‍हें उल्‍टी हुईं। तब कहीं, उन्‍होंने राहत की सांस ली। इस हादसे के बाद उनका लाड़-दुलार, माई स्‍वीट बाय...माई स्‍मार्ट बाय...मेरे प्‍यारे बेटे....वाक्‍यों को बोलने तक और गालों पर एक दो चुंबन एवं चुटकियां ले लेने तक ही सीमित रह गया।

शंशाक ने जब चौथे वर्ष में प्रवेश किया तब उसे एक लाख रूपये अनुदान में देकर पब्‍लिक स्‍कूल में भर्ती कराया गया। शशांक ने जब पांचवीं कक्षा उत्‍तीर्ण कर ली तब उसे देहरादून के पब्‍लिक स्‍कूल के होस्‍टल में डाल दिया गया। जैसे-जैसे शशांक कक्षाएं उत्‍तीर्ण करता जा रहा था वैसे-वैसे उसकी मानसिकता पर अंग्रेजियत और पाश्‍चात्‍य संस्‍कृति पूरे जोर से प्रभाव जमाती जा रही थी। उसे अंग्रेजी साहित्‍य ही पढ़ने के लिए आसानी से सुलभ होता। अंग्रेजी के नये पुराने छोटे-बड़े साहित्‍यकारों की तमाम पुस्‍तकों से विद्यालय का पुस्‍तकालय भरा पड़ा था। इंटरनेट पर भी इसी भाषा का साहित्‍य बड़ी मात्रा में उपलब्‍ध था। जबकि भारतीय साहित्‍य की यहां रामायण, महाभारत, और रामचरितमानस जैसी मानक पुस्‍तकें भी उपलब्‍ध नहीं थीं। आधुनिक भारतीय साहित्‍यकारों की पुस्‍तकें इनकी कुंद मानसिकता वाली दृष्‍टि से अश्‍लील थीं। इसलिए पुस्‍तकालय में उनका खरीदा जाना सर्वथा वर्जित था। हिंदी साहित्‍य के नाम पर जहां दिखावे भर के लिए कुछ आलोचना साहित्‍य, कुछ महा पुरूषों की जीवनियां और कुछेक राष्‍ट्रीय कविताओं की पुस्‍तकें ही थीं। हालांकि लड़के-लड़कियों के इस संयुक्‍त विद्यालय में दरख्‍तों की ओट में, सीढ़ियों पर उतरने चढ़ने में, खेल के मैदान में, पुस्‍ताकलय में और केंटीन में अश्‍लील हरकतों का आदान प्रदान इतना खुलकर होता कि कभी-कभी बेहूदी हरकत लगने लगता। यहां यौनिक जागरूकता और यौन रोगों से बचाव के बहाने यौन सुरक्षा के उपाय बड़ी ही आसानी से सुलभ थे। इसीलिए यहां के छात्र-छात्राएं इंटर करते-करते देह में यौनिक आनंद के आदी थे। ऐसी ही हरकतों का आनंद लेते हुए शशांक बारहवीं कक्षा उत्‍तीर्ण कर गये।

इसके बाद शशांक ने दिल्‍ली विश्‍वविद्यालय में विज्ञान स्‍नातक में प्रवेश लिया। परिवार से अलग रहते-रहते शशांक का स्‍वभाव एकाकी हो गया था। वह घर आता तो सीधा अध्‍ययन कक्ष में बंद हो जाता। नौकर चाकर वहीं उसे खाना आदि दे जाते। माता-पिता से शशांक का वार्तालाप शुभ-प्रभात और शुभ-रात्रि तक सीमित था।

एक दिन दोपहर के समय शशांक अपने बंगले की बालकनी में बैठा हुआ कुछ सोच रहा था कि उसे बगल वाले बंगले की बालकनी से दो महिलाओं में किये जा रहे वार्तालाप की भनक लगी। वह चौकन्‍ना हुआ और चिक की ओट लेकर बगल की दीवार की ओर खिसक आया। दरअसल कानों में भनक लगते हुए शशांक को यह आभास हो गया था कि ये महिलायें उसी के बारे में कानाफूसी कर रही हैं।

''यह कुमार साहब का लड़का कैसा है...? न कभी पड़ोसियों के यहां आता-जाता है और न ही गली मोहल्‍ले के लड़कों से मिलता-जुलता है..। सुना है मां बाप से भी बहुत कम बोलता चालता है....। मुझे तो लगता है इकलौता होने के कारण घमंडी हो गया है.....।‘‘ एक महिला बोली थी।

''अरे नहीं यह बात नहीं है...इस ससुरे का ना तो बाप का पता......न मां का......। श्रीमान्‌ एवं श्रीमती तो नामर्द बांझ हैं। शादी के बाद इन्‍हें बच्‍चा-अच्‍चा तो हुआ नहीं। तब इन्‍होंने टैस्‍ट्‌यूब में फ्‍यूजन कराया और गर्भ ठहराया किसी किराये की औरत की कोख में....। ऐसी अप्राकृतिक संतान का क्‍या भरोसा....किसके सीमन से जनी हैं फिर भला जिस औरत ने प्रसव पीड़ा ही नहीं सही, वह क्‍या जाने ममता की पीर....? तभी तो श्रीमती कुमार इसे ठीक से प्‍यार नहीं करतीं। बचपन तो इसका सारा आयाओं की गोद में ही गुजरा है।‘‘ दूसरी महिला बोली थी।

एक नये रहस्‍य के खुले जाने से शशांक दंग रह गए। और उनके अंदर यह भ्रम पलना प्रारंभ हो गया कि संभवतः उनके माता-पिता उन्‍हें इसीलिए ठीक-ठीक प्‍यार नहीं करते। अब तक उनकी यह धारणा थी कि माता-पिता अपने कार्यों में अत्‍यधिक व्‍यस्‍त रहने के कारण उन्‍हें समय नहीं दे पाते। पर रहस्‍य का पर्दा हट जाने से जब उनका यह भ्रम टूट गया था।

विज्ञान स्‍नातक प्रथम श्रेणी से उत्‍तीर्ण करने के बाद शशांक ने आईएएस की प्रतिस्‍पर्धा परीक्षा में भाग लेने का निश्‍चय किया। निश्‍चित रूप से सफलता पाने के लिए उन्‍होंने कोचिंग कक्षायें भी प्रारंभ कर दीं। दिन और रात की कड़ी मेहनत के बाद वह प्रतिस्‍पर्धा परीक्षा उत्‍तीर्ण कर गए। इस तरह शशांक भारतीय प्रशासनिक सेवा में आ गये।

प्रशासनिक सेवा में आने के साथ ही शशांक के व्‍यवहार में आश्‍चर्यजनक ढंग से परिवर्तन आना प्रारंभ हो गया। वह रात को विलंब से आने लगा। शराब के नशे में धुत्‍त उसकी चाल डगमगाती सी होती। ओंठों पर सिगार दबा होता। एक दिन कार्यालय से लौटते वक्‍त शशांक की कार रास्‍ते में खराब हो गई। उन्‍होंने मोबाइल से गैरेज में कार खराब हो जाने की सूचना दी। ताले का गुप्‍त नंबर बताया और टैक्‍सी पकड़कर अधिकारी प्रकोष्‍ट (आफीसर क्‍लब) में पहुंच गया। छककर शराब पी। फिर अपने एक अधिकारी मित्र की बीबी की बांहों में डालकर गुफ्‍तगू करता रहा। जब वक्‍त मध्‍य रात्रि के करीब पहुंच गया और सुरासुंदरी के दौर की गर्माहट कुछ ठंडी हुई तब वह मित्र की बीबी की कार में बैठकर गुफ्‍तगू करता हुआ घर आया। आज श्रीमती कुमार भी किसी पार्टी में उपस्‍थिति दर्ज कराने के कारण देर से लौटी थीं। दरवाजे पर कार रूकने की आहट सुनकर वे खिड़की से बाहर झांकने लगी। उन्‍होंने देखा-शशांक के कार से उतरने के साथ ही एक महिला का खूबसूरत चेहरा खिड़की से बाहर निकला, ''हाऊ स्‍वीट‘‘ के उच्‍चारण के साथ ही उसने अपना हाथ लंबा कर दिया.....। शशांक ने तत्‍क्षण पलटकर महिला की अंगुलियों को हथेली में कसकर चुंबन लेते हुए कहा ''आई लव यू माई डार्लिंग....। ओ......के........बाय......बाय......सी.....यू.....।‘‘ और हाथ हवा में लहराते हुए गाड़ी गति में आ गई।

शशांक जब अपने शयन कक्ष में पहुंचकर टाई की नॉट ढीली कर रहा था कि उसकी मां ने एकाएक शयन कक्ष में आकर कहा- ''यह औरत कौन थी शशांक......?‘‘

ऐश ट्रे में रखे अधजले सिगार से धुआं उठ रहा था।

इस तरह यकायक पहले कभी श्रीमती कुमार शशांक के शयन कक्ष में नहीं पहुंची थीं। शशांक ने गौर से मां को देखा और उनके हाव-भाव से अहसास किया कि मां भी किसी क्‍लब अथवा पार्टी से शराब पीकर लौटी हैं। शशांक ने बहुत धीरे से कहा, ''मेरे एक अधिकारी मित्र की बीबी थी।‘‘ किसी प्रकार का संकोच अथवा शर्म शशांक के चेहरे पर नहीं थी।

''इस तरह नशे में इतनी रात को दो टके की औरतों के साथ तुम्‍हारा घर आना कतई ठीक नहीं है। जवानी का इतना ही जोश चढ़ गया है तो शादी क्‍यों नहीं कर लेते ?‘‘

''ओह.....माई...डियर मम्‍मी....शादी की ऐसी भी क्‍या जल्‍दी है? क्‍या जरूरत है.......? वह ऐसी कौन सी वस्‍तु है जो आज बिना शादी किये न मिलती हो....? खरीददार के पास खरे दाम हों, बेचने वाले तो लाईन लगाकर खड़े हैं। औरत लो.......। बच्‍चा लो.....। किराए की कोख लो.....। मम्‍मी....यह भौतिक युग है।....वैज्ञानिक युग है, यहां सब कुछ सुलभ है.....।‘‘ शशांक के व्‍यवहार में यांत्रिक सहजता और उच्‍छश्रृंखलता एक साथ थी।

''शशांक तुम्‍हें मां से बात करने की जरा भी तमीज नहीं है। जानते हो मां और बेटे के बीच एक मर्यादा की सीमा रेखा होती है.....।‘‘

''नहीं......मम्‍मी......नहीं, यह पाठ तो घर और स्‍कूल में मुझे किसी ने पढ़ाया ही नहीं.....। मैं तो मम्‍मी के मायने मां और मदर ही जानता हूं। इस शब्‍द की परिभाषा से एकदम अनभिज्ञ हूं।‘‘

शशांक का इतना उद्‌दंडतापूर्ण खुला व्‍यवहार देखकर वे आशंकित हो गईं और दो कदम पीछे खिसककर यह कहते हुए ''अभी तुम होश में नहीं हो शशांक.....सो जाओ।‘‘ वापिस हो गई। उन्‍हें लगा, ऐसी दोगली संस्‍कृति की औलाद उनकी कोख से जन्‍म ले ही नहीं सकती? यह सोचते हुए उनके मस्‍तिष्‍क में दस्‍तकों का प्रहार शुरू हो गया, तब उन्‍हें ख्‍याल आया, ‘वह उनकी कोख से जन्‍मा ही कहां है....?'

श्री कुमार दौरे पर मुंबई गए हुए थे। ऐसे में उन्‍हें नितांत अकेलापन बेहद खटक रहा था। भयभीत होकर वे शयन कक्ष के दरवाजे खिड़कियां बंद कर बिस्‍तर में दुबक गईं।

अगले दिन श्रीमती कुमार एवं शशांक में कहा सुनी हो गई। मां की मर्यादित हिदायतें शशांक के लिए बरदाश्‍त से बाहर की बातें थीं। लिहाजा शशांक एक अटैची में जरूरी कपड़े-लत्‍ते एवं कागजात डालकर साथ में ले जाते हुए घर छोड़ गए। घर छोड़ने के बाद उसने विजयंत अपार्टमेंट्‌स में फ्‍लैट आवंटित कराया और उसी में वक्‍त गुजारने लगा।

यह था श्री शशांक का जीवन इतिहास। चलिये अब पुनः वर्तमान में आते हैं और आपको शशांक के कार्यालय ले चलते हैं......।

सिगरेट, चाय, कॉफी लगातार पीने के क्रम के बीच वह सारा दिन फाइलें निपटाता रहता है। दोपहर के खाने के समय आशुलिपिक (स्‍टैनो) के साथ खाना खाने बैठता है। सुंदर, स्‍वस्‍थ हंसमुख चुलबुली आशुलिपिका और वह चुटकुलों और शगूफों के बीच किसी न किसी अधिकारी अथवा कर्मचारी को केंद्र मं रखकर चटखारे ले लेकर उसका मजाक उड़ाते रहते हैं। आलिंगन और चुंबन उनके बीच सहज प्रक्रिया बनकर क्रियारत रहते हैं।

शाम को वह कार्यालय से निकलकर सीधा पंचतारा होटल में पहुंचता है। वहां कुछ समय शापिंग सेंटर में घूमता रहता है। फिर कुछ समय के लिए कैबरे केबिन में जाकर बैठ जाता है। हर रात उन्‍हीं लड़कियों द्वारा ड्रांस की पुनरावृति देखने बैठ जाता है। वेटर के आने पर सिगरेट के कशों के बीच शराब पीने लगता है। पी चुकने के बाद खाना खाता है। फिर भुगतान अदाकर नीचे आकर कार में सवार हो इंडिया गेट पहुंच जाता है। इंडिया गेट का शीतलता से भरा सुहाना मौसम उसे बड़ा लुभावना लगता है। वह आइसक्रीम वाले से एक कप फ्रूट आइसक्रीम लेता है और घास पर बैठ चाव से खाने लगता है। खा चुकने के थोड़ी ही देर बाद कलाई घड़ी का अलार्म बजता है। इसके साथ ही उसे अहसास हो जाता है कि अब रात के ग्‍यारह बज चुके हैं। अतः फ्‍लैट पर पहुंचने के लिए रवाना हो जाना चाहिए।

साढ़े ग्‍यारह बजे के लगभग वह अपने फ्‍लैट में प्रविष्‍ट होता है। शयन कक्ष में पहुंचकर कपड़े उतारता है। पलंग पर बनी गुप्‍त अलमारी खोलकर कामुक गुड़िया (सैक्‍सीडाल) निकालकर बिस्‍तर पर रखता है। ऐसे समय कंप्यूटर उनके लिए जरूरी दूरभाष संदेश प्रसारित करता है, ''आपकी माताजी की तबीयत बहुत खराब है, वे आपसे मिलना चाहती हैं। यह संदेश आपके पिताजी ने दिया है।‘‘

शशांक के चेहरे पर कुटिलता पूर्ण मुस्‍कान तैर जाती है। वह बिस्‍तर पर पैर फैलाकर बैठ जाता है और उस गुड़िया में यंत्र से हवा भरने लगता है। अब हिन्‍दुस्‍तान के बाजारों में कृत्रिम सैक्‍सी बॉय व सेक्‍सी गर्ल खुले आम मिलने लगे हैं। एकाकी जीवन व्‍यतीत करने वाले स्‍त्री - पुरूषों के लिए ये गुड्‌डा - गुड़िया फ्‍लैट में रखना दस्‍तकारी की वस्‍तुओं की तरह शोभा एवं शान की चीजें हो गईं हैं।

हवा भर जाने के बाद गुड़िया फुटबाल ब्‍लेडर की तरह फूल गई थी। खजुराहों की मूर्तियों की तरह तराशा गया उसका रूप निखर आया है। प्राकृतिक औरतों की देहदृष्‍टि की तरह वह भी बेहद सुगठित स्‍वस्‍थ एवं सुंदर लग रही है। गुड़िया के सिर के बालों के नीचे लगे बटन के दबाने पर जब उसके मुख से आग्रहपूर्ण, मादक, मीठा, स्‍वर फूटना प्रारंभ हो जाता है तो उसकी सजीवता के प्रति एकाएक शंका करना मुश्‍किल की बात है। शशांक ने उसके बालों पर हल्‍के से चुंबन लिए और उसकी कृत्रिम मखमली देह को अपने आगोश में ले लिया। शशांक की अंगुली गुड़िया के बालों के नीचे दबे बटन पर दबाव बना रही है। एकाएक कमरे में मादक एवं कामुक स्‍वर लहरियां खन-खना उठीं।

विज्ञान ने मानवता को चुनौती दे दी है और इंसान मानवता को पैरों तले रौंद कर ज्‍यादा से ज्‍यादा यंत्रों से संबंध स्‍थापित करता चला जा रहा है। जीवन में भावना और सहानुभूति औपचारिक भर रह गई है।

सुबह जब शशांक कंप्यूटर के विनम्र निवेदन पर उठा तो कंप्यूटर ने एक जरूरी संदेश प्रसारित किया, ''आपकी माता जी का स्‍वर्गवास हो गया है।‘‘

शशांक का चेहरा निर्लिप्‍त रहा । कोई खेद का भाव प्रगट ही नहीं हुआ। तुरंत उसने कंप्यूटर की-बोर्ड के निकट जाकर कुछ बटन दबाते हए अपने पिता को शोक संदेश प्रेषित कर दिया, ''मम्‍मी के देहांत का समाचार प्राप्‍त हुआ। मम्‍मी की आकस्‍मिक मृत्‍यु पर मुझे बेहद दुख हुआ। ईश्‍वर उनकी आत्‍मा को शांति प्रदान करे। मेरी ओर से विनम्र श्रद्धांजलि अर्पित।‘‘ और शशांक निर्विकार भाव लिए स्‍नानघर में घुस गया।

यह थी मानवता और रिश्‍तों को विकृत रूप दे देने वाली परखनली के आदमी की कहानी।....लीजिए अब मैं पुनः अपने मस्‍तिष्‍क में विराजमान लघु कंप्यूटर के बटन को दबाता हूं और इक्‍कीसवीं सदी के दूसरे दशक के अंतिम साल की कंप्‍यूटरी गुफा से निकलकर वर्तमान में आता हूं......।

प्रमोद भार्गव

शब्‍दार्थ, 49 श्रीराम कॉलोनी,

शिवपुरी (म.प्र.) पिन 473-551

4 blogger-facebook:

  1. .

    yaथार्थ को बयान करती बढ़िया कहानी। मानव अब संवेदनाओं से शून्य होकर एक मशीन ही रह गया है। रोबोट और हममें कुछ ख़ास फरक नहीं है अब।

    .

    उत्तर देंहटाएं
  2. विज्ञान और मानव की भावनाओ से जुड़े पहलू रचना बेहद सुन्दर है …. उम्दा … शुभकामनाएं

    उत्तर देंहटाएं
  3. भार्गव जी ! यह मात्र गल्प नहीं ...एक भयावह duhsvapn भी नहीं .....कठोर भविष्य वाणी है

    उत्तर देंहटाएं

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