बुधवार, 3 नवंबर 2010

सुरेन्‍द्र अग्‍निहोत्री की कविता – चारों ओर अजीब अन्धेरा है

चारों ओर अजीब घना अन्‍धेरा है

लोकतन्‍त्र का रहबर ही लुटेरा है

 

कोयले अब क्‍या करें बेचारी

कागों ने चारों तरफ से घेरा है

 

सँपेरा क्‍या करेगा अब बेचारा

चारों तरफ जब विषघरों का डेरा है

 

कैसे जी सकेगी तालाब में मछलियाँ

जब उनका कातिल ही तो मछेरा है

 

जिनके हाथों में है न्‍याय की तुला

वही मुंसिफ कातिल और लुटेरा है

 

एक दीप सत्‍य का जला दो मगर

धरा से कुछ खत्‍म होगा तो अन्‍धेरा है।

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सुरेन्‍द्र अग्‍निहोत्री

राजसदन-120/132 बेलदारी लेन

लालबाग, लखनऊ

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