सुरेन्‍द्र अग्‍निहोत्री की कविता – चारों ओर अजीब अन्धेरा है

--- विज्ञापन ---

----------- *** -----------

चारों ओर अजीब घना अन्‍धेरा है

लोकतन्‍त्र का रहबर ही लुटेरा है

 

कोयले अब क्‍या करें बेचारी

कागों ने चारों तरफ से घेरा है

 

सँपेरा क्‍या करेगा अब बेचारा

चारों तरफ जब विषघरों का डेरा है

 

कैसे जी सकेगी तालाब में मछलियाँ

जब उनका कातिल ही तो मछेरा है

 

जिनके हाथों में है न्‍याय की तुला

वही मुंसिफ कातिल और लुटेरा है

 

एक दीप सत्‍य का जला दो मगर

धरा से कुछ खत्‍म होगा तो अन्‍धेरा है।

---

सुरेन्‍द्र अग्‍निहोत्री

राजसदन-120/132 बेलदारी लेन

लालबाग, लखनऊ

--- विज्ञापन ---

----------- *** -----------

_____________________________________

1 टिप्पणी "सुरेन्‍द्र अग्‍निहोत्री की कविता – चारों ओर अजीब अन्धेरा है"

रचनाओं पर आपकी बेबाक समीक्षा व अमूल्य टिप्पणियों के लिए आपका हार्दिक धन्यवाद.

स्पैम टिप्पणियों (वायरस डाउनलोडर युक्त कड़ियों वाले) की रोकथाम हेतु टिप्पणियों का मॉडरेशन लागू है. अतः आपकी टिप्पणियों को यहाँ प्रकट होने में कुछ समय लग सकता है.