मंगलवार, 23 नवंबर 2010

एस के पाण्डेय की लघुकथा – प्रमाणपत्र

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*प्रमाणपत्र*

एक बुढ्ढा बैंक में क्लर्क से जोर-जोर कह रहा था कि मैं जिन्दा तुम्हारे सामने खड़ा हूँ। इससे बड़ा मेरे जीवित होने का दूसरा और क्या प्रमाण हो सकता है ? और तुम कहते हो कि मैंने अपने जीवित होने का प्रमाणपत्र अभी तक जमा नहीं किया है। क्लर्क का कहना था कि मुझे सिर्फ प्रमाणपत्र चाहिये। तुम जिन्दा हो या मुर्दा मैं कुछ नहीं जानता। पेंशन चाहिये तो प्रमाणपत्र लेकर आओ। बुढ्ढा बुदबुदाते हुए निकला कि बुढ़ापा भी क्या चीज है कि कोई जीवित भी नहीं समझता। जो हाल घर में वही बाहर भी, यह सोचकर रुआंसा हो गया।

संयोग से मैं भी बैंक गया था। मैंने कहा बाबाजी आप दो प्रमाणपत्र बनवा लीजिये। एक बैंक और दूसरा घर के लिए। शायद आपको पता नहीं, अभी हाल में एक आदमी मरा हुआ सड़क के किनारे पड़ा था। पोलिस आई और उसे जिन्दा बताकर चली गयी। कारण, उसके जेब में जीवित होने का प्रमाणपत्र था। एक आदमी बोला कि यह जिन्दा नहीं मुर्दा है। शायद इसे मरे हुए कई दिन हो गये । लाश से बदबू आ रही है। तो पोलिस उसे साथ ले गयी। वह झूठा बयान देने तथा कानून के आँख में धूल झोंकने के आरोप में जेल में बंद है।

बाबाजी प्रमाणपत्र बनवाने चले गए। बहरहाल उनके दिमाग में यह बात अच्छी तरह से घर कर चुकी है कि यहाँ मुर्दे को जीवित होने का प्रमाणपत्र तो आसानी से मिल सकता है, लेकिन जीवित व्यक्ति को जीवित होने का उतनी आसानी से नहीं।

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एस के पाण्डेय, समशापुर (उ.प्र.)।

URL: http://sites.google.com/site/skpvinyavali/

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2 blogger-facebook:

  1. अदभुद लघु कथा.. भीतर तक हिल गया मैं.. खुद को चिकोटी काट रहा हूँ कि जिन्दा हूँ या मुर्दा...

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  2. जिन्दा रहना अधिक मुश्किल है..

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