रविवार, 28 नवंबर 2010

दीनदयाल शर्मा की कविता - समर्पण

Deendayal Sharma, Author new (Custom)

समर्पण

माँ

बहिन

बीवी

बेटी

और न जाने

कितने रूपों में

तू

समर्पित है

तेरा जीवन

सबके लिए अर्पित है

ममता उड़ेलती

प्यार बांटती

तू

अंतत:

बंट जाती है  

पञ्च तत्वों में

और

हो जाती है लीन

ब्रह्म में

बुनती ताना - बाना

नारी !

तुझे हर रूप में

पड़ा है

कड़वा घूँट पीना

फिर भी

छोड़ा नहीं है

तूने

बार- बार जीना..

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- दीनदयाल शर्मा

अध्यक्ष, राजस्थान साहित्य परिषद् , 

हनुमानगढ़  - 335512  

9 blogger-facebook:

  1. इसी समर्पण की भावना के साथ खुद भी समर्पित हो जाती है... परन्तु किसी से तुच्छ मात्र समर्पण की मांग नहीं करती...

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  2. sahi kaha aap ne--naari har roopo main balidan ki murat hoti hai--sunder rachna

    उत्तर देंहटाएं
  3. आपकी रचनात्मक ,खूबसूरत और भावमयी
    प्रस्तुति कल के चर्चा मंच का आकर्षण बनी है
    कल (29/11/2010) के चर्चा मंच पर अपनी पोस्ट
    देखियेगा और अपने विचारों से चर्चामंच पर आकर
    अवगत कराइयेगा।
    http://charchamanch.blogspot.com

    उत्तर देंहटाएं
  4. सर्वोपरी तो वो ही है माँ जिसे कहते हैं

    उत्तर देंहटाएं
  5. भावना प्रधान सफल अभिव्यक्ति।

    उत्तर देंहटाएं
  6. नारी के सम्मान में लिखी एक सार्थक रचना के लिये बधाई।

    उत्तर देंहटाएं
  7. ap sabne meri kavita "Samrpan" pasand ki..iske liya ap sabka bahut bahut abhaar..fir se apka Thanks.

    उत्तर देंहटाएं

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