सोमवार, 29 नवंबर 2010

मालिनी गौतम की कविताएँ - मेरे बच्चे, होस्टेल में तुम्हारा सामान जमाते समय मैं कुछ छोड़कर आई हूँ तुम्हारे लिये…

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परवरिश

सबेरे की हल्की बारिश में

नहाई हुई सुबह के माथे पर

अब चमकने लगी है

सोनेरी सूरज की बिदिंया

अलसाये से शरीर को लिये

मैं बैठी हूँ बगीचे में

और देख रही हूँ

एक चिड़िया और उसके छोटे से बच्चे को

 

चिड़िया फुदक-फुदक कर

बड़ी सतर्कता से चारों तरफ देखकर

चोंच नीचे झुकाकर

दाना उठाती है और

पीछे-पीछे आ रहे

बच्चे के मुँह में डाल देती है

एक मूक पक्षी में भी

समझ है अपने बच्चे की

परवरिश करने की

और मेरी आँखों के सामने

छा जाता है कपड़ों में लिपटा हुआ

एक नवजात शिशु

जिसे एक अभागन माँ

छोड़ गई है गाँव के बाहर झाड़ियों में

 

एक पाती मुक्तक के नाम

मुक्तक, मेरे बच्चे,

आज तुम फिर चले गये

मेरे मन को रीता-रीता करके।

स्कूल के गेट पर

विदा लेते हुए, हाथ हिलाते हुए

तुम्हें कुछ कहना चाहती थी

पर कह नहीं पाई।

 

मेरे बच्चे,

होस्टेल में

तुम्हारा सामान जमाते समय,

तुम्हारा बिस्तर लगाते समय,

मैं कुछ छोड़कर आई हूँ तुम्हारे लिये,

तुम्हारे पसंद के नाश्ते के डब्बे के साथ

वहीं पास में

रखकर आई हूँ

एक छलकता हुआ घड़ा

जो भरा हुआ है

मेरे प्रेम और स्नेह के जल से।

 

बेटा, जब कभी किसी परेशानी से

तुम निराश हो जाओ

और आँखें नम हो जायें

तो थोड़ा सा पानी लेकर

अपना चेहरा धोना

तुम्हारी आँखों पर छाया धुँधलापन

हट जायेगा

और तुम्हारी आँखों में बसे मेरे सपनों

तक पहुँचने की डगर

तुम्हे स्पष्ट दिखाई देने लगेगी।

 

दिन भर की कठिन मेहनत के बाद

अगर तुम्हारा गला सूखने लगे

तो घड़े का एक घूँट पानी पीना

मुझे विश्वास है मेरे बच्चे

कि चिलचिलाती धूप में भी

तुम्हें बारिश का अहसास होगा।

 

अरे हाँ,मेरे बच्चे,

जरा उपर तो नजर करना

वहीं कहीं तुम्हारे बिस्तर के उपर

मच्छरदानी के साथ

मैं लटका के आई हूँ

मेरी साड़ी का आँचल

रात को जब थककर सो जाओ

तो उसे ओढ़ लेना

सबेरे माँ तुम्हारे माथे को चूमकर

तुम्हें जगा रही है, यह अहसास होगा।

 

मैं तो यहाँ हर पल काटती हूँ

तुम्हारी यादों के सहारे

क्योंकि मेरे पास तो नहीं है

किसी के स्नेह का छलकता घड़ा,

किसी के आँचल का पल्लू

मैं तो बस कैलेंडर के पन्ने पलटते हुए

करती रहती हूँ तुम्हारी

अगली छुट्टियों का इंतज़ार।

----

 

डॉ. मालिनी गौतम

मंगलज्योत सोसाइटी

संतरामपुर-३८९२६०,गुजरात

4 blogger-facebook:

  1. डॉक्टर गौतम जी !
    बेहद संवेदनशील ......
    माँ के दो रूप .......नवजात का निर्मम परित्याग ........और अपनी रचना.....अपने प्रतिरूप पर पर बलिहारी माँ !
    भोले बचपन पर माँ की ममता का बरसता नेह.......... मन को छूती .....कोमल रचना ............

    उत्तर देंहटाएं
  2. हृदयस्पर्शी रचनाएँ!!!

    उत्तर देंहटाएं
  3. दोनों कवितायें बेहद भावपूर्ण है,अहसास जगाती है.
    बधाई.

    उत्तर देंहटाएं
  4. maa ki mamta adbhut hai jise ek maa hi samajh sakti hai

    उत्तर देंहटाएं

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