शुभ शिखर मिश्र की कविता - -

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ऐसा ही कुछ-कुछ होता है

कुछ समय गुजरता है खुश-खुश

कुछ समय मुझे भरमाता है,

छोटे से बालक मुझ शुभ को

तकदीर पे गुस्सा आता है।

 

मैं नहीं खेलता जी भर के

हर रोज पढ़ाई करता हूँ,

फिर भी मम्मी की आँखों में

जाने क्यों गुस्सा रहता है।

 

एक बार गया था पापा संग

बाजार सब्जियाँ लाने को,

पापा ने जूते दिला दिए

फुटबॉल खेलकर आने को।

 

मैं निकल गया घर से अपने

बाहर से मित्र बुलाते थे,

मन को मेरे ललचाने को

फुटबॉल का खेल दिखाते थे।

 

मैं रोक सका न इस मन को

फुटबॉल की ऐसी माया है,

चुपके से निकला मैं घर से

जूतों ने ताव दिलाया है।

 

मैं खेल रहा था बस इसको

फुटबॉल तो मेरे पास रहे,

जब पास न आयी वो मेरे

तो मित्र से फरियाद करी।

 

एक मित्र ने जोर से किक मारी

फुटबॉल जो मुझको पास करी,

वो हाथ की हड्डी तोड़ गयी

उसने भी मेरे संग घात करी।

 

पापा चीखे, मम्मी रोई तो

मुझको यह एहसास हुआ,

मेरी ही थोड़ी गलती से

मेरा यह ऐसा हाल हुआ।

 

अब कभी न खेलूँगा बाहर

घर पर ही शोर मचाऊँगा,

चाहे कुछ भी हो जाए मगर

बाहर न पैर बढ़ाऊँगा।

 

एक बात सोचता हूँ ईश्वर

ऐसा क्यों तू बस करता है,

शुभ काम न करता है गंदे

क्यों उसको दण्डित करता है ?

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1 टिप्पणी "शुभ शिखर मिश्र की कविता - -"

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