मंगलवार, 23 नवंबर 2010

शुभ शिखर मिश्र की कविता - -

art2

ऐसा ही कुछ-कुछ होता है

कुछ समय गुजरता है खुश-खुश

कुछ समय मुझे भरमाता है,

छोटे से बालक मुझ शुभ को

तकदीर पे गुस्सा आता है।

 

मैं नहीं खेलता जी भर के

हर रोज पढ़ाई करता हूँ,

फिर भी मम्मी की आँखों में

जाने क्यों गुस्सा रहता है।

 

एक बार गया था पापा संग

बाजार सब्जियाँ लाने को,

पापा ने जूते दिला दिए

फुटबॉल खेलकर आने को।

 

मैं निकल गया घर से अपने

बाहर से मित्र बुलाते थे,

मन को मेरे ललचाने को

फुटबॉल का खेल दिखाते थे।

 

मैं रोक सका न इस मन को

फुटबॉल की ऐसी माया है,

चुपके से निकला मैं घर से

जूतों ने ताव दिलाया है।

 

मैं खेल रहा था बस इसको

फुटबॉल तो मेरे पास रहे,

जब पास न आयी वो मेरे

तो मित्र से फरियाद करी।

 

एक मित्र ने जोर से किक मारी

फुटबॉल जो मुझको पास करी,

वो हाथ की हड्डी तोड़ गयी

उसने भी मेरे संग घात करी।

 

पापा चीखे, मम्मी रोई तो

मुझको यह एहसास हुआ,

मेरी ही थोड़ी गलती से

मेरा यह ऐसा हाल हुआ।

 

अब कभी न खेलूँगा बाहर

घर पर ही शोर मचाऊँगा,

चाहे कुछ भी हो जाए मगर

बाहर न पैर बढ़ाऊँगा।

 

एक बात सोचता हूँ ईश्वर

ऐसा क्यों तू बस करता है,

शुभ काम न करता है गंदे

क्यों उसको दण्डित करता है ?

----

1 blogger-facebook:

रचनाओं पर आपकी बेबाक समीक्षा व अमूल्य टिप्पणियों के लिए आपका हार्दिक धन्यवाद.

स्पैम टिप्पणियों (वायरस डाउनलोडर युक्त कड़ियों वाले) की रोकथाम हेतु टिप्पणियों का मॉडरेशन लागू है. अतः आपकी टिप्पणियों को यहाँ प्रकट होने में कुछ समय लग सकता है.

----

1.5 लाख गूगल+ अनुसरणकर्ता, 1500 से अधिक सदस्य

/ 2,500 से अधिक नियमित ग्राहक
/ प्रतिमाह 10,00,000(दस लाख) से अधिक पाठक
/ 10,000 से अधिक हर विधा की साहित्यिक रचनाएँ प्रकाशित
/ आप भी अपनी रचनाओं को विशाल पाठक वर्ग का नया विस्तार दें, आज ही नाका से जुड़ें. नाका में प्रकाशनार्थ रचनाओं का स्वागत है.अपनी रचनाएँ rachanakar@gmail.com पर ईमेल करें. अधिक जानकारी के लिए यह लिंक देखें - http://www.rachanakar.org/2005/09/blog-post_28.html

विश्व की पहली, यूनिकोडित हिंदी की सर्वाधिक प्रसारित, समृद्ध व लोकप्रिय ई-पत्रिका - नाका

मनपसंद रचनाएँ खोजकर पढ़ें
गूगल प्ले स्टोर से रचनाकार ऐप्प https://play.google.com/store/apps/details?id=com.rachanakar.org इंस्टाल करें. image

--------