रविवार, 14 नवंबर 2010

राजीव श्रीवास्तवा की बाल दिवस विशेष रचना – बचपन की शरारतें!

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आज भी जब कभी अपने अतीत
के पन्नों को टटोलता हूँ,
तो कुछ पन्नों को मैं
बड़े प्यार से खोलता हूँ
इन पन्नों से मेरी साँसे जुड़ी हैं
क्योंकि इन्हीं पे मेरी शरारतें लिखी है !

सुबह हुई नहीं की
दिमाग़ में शरारत का मीटर
भागना शुरू!
शरारत में मैं अपने
मोहल्ले का था गुरु!

घर हो या बहार
स्कूल हो या बाजार
मैं शैतानी के मौके तलाशता
किसी के कपड़ों पे स्याही गिराता
तो चोरी से किसे का नाश्ता खा जाता !

भाई-बहन की कापियाँ
बड़ी चालाकी से छुपा देता
वो ढूँढ़ कर परेशान होते
मैं मन ही मन हँसता
बाद में उन्हें जब लाकर देता
बदले में उनकी पेंसिल ले लेता !

छुटकी के जन्म दिन पर
माँ बड़ा सा केक लाई थी
बड़े चाकू से काटने को उसने
आश लगाई थी,
केक काटने के वक़्त उसका मूह
खुला रह गया था,
क्यूंकि आधा केक मैं पहले से
ही खा गया था!

बॅंटू को बापू ने दो रुपये दिए थे,
डबल करने का लालच
देकर मैंने उससे लिए थे,
फिर कहा वो रुपये परी लोक गये हैं,
लगता है वही वो चार हो गये है,
जब उसकी समझ आया
वो ज़ोर से चिल्लाया!

स्कूल में एक दबंग बच्चे के
बस्ते में रख दिया था साँप नकली
सभी को बड़ा मज़ा आया
जब हो गयी हालत उसकी पतली
साँप-साँप चिल्लाकर वो बाहर को भागा
उस दिन के बाद से वो हो गया सीधा-साधा!

और वो पड़ोस के नंदू को
मैंने एक दिन बरफी खिलाई थी
दो बरफी के बीच में
मैंने मिर्ची की परत लगाई थी
जैसे ही उसने एक टुकड़ा
अपने मुंह में डाला था ,
थू-थू कर के वो चिल्लाया
झट से मूह से निकाला था!

मेरी बचपन की शरारतें
मेरी अनमोल धरोहर हैं
जब कभी मैं अकेला महसूस करता हूँ
अपनी यादों की किताब खोल
इन्हीं पन्नों को पढ़ लेता हूँ!

--

डॉ. राजीव श्रीवास्तवा

1 blogger-facebook:

  1. शराफ़त और हक़ीक़त से लबरेज़ अच्छि कविता , बधाई।

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