रविवार, 28 नवंबर 2010

एकता नाहर की कविता - नारी तुम श्रृंगार करो, तन का नहीं मन का

nari

नारी तुम श्रृंगार करो, तन का नहीं मन का

सादगी स्वच्छता सत्य शील, लक्ष्य बनाओ जीवन का

 

हाथों में कंगन नहीं, दान को सुशोभित करो

आँखों में काजल नहीं, करुणा ममता का भाव भरो

 

वाणी में मृदुता का रस हो, मन में सेवा की भावना

मुख पर कोमल प्रेम का सौम्य, सदाचार की जीवंत प्रतिमा

 

दया त्याग का अलौकिक तेज, और फूलों सी कोमलता

शीतल गंगा सी अश्रुधारा, जैसे मोती की उज्ज्वलता

 

वीरता और कोमलता का, यह अटूट संगम

आदर्श नारी का यह श्रृंगार, अलौकिक और अनुपम

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एकता नाहर

Email id : EktaNahar5@gmail. com

hobies : writing, sketching

11 blogger-facebook:

  1. बेहद सार्थक संदेश देती रचना!!

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  2. aalokik lekhan shelly,,,,,,,, uttam rachna in rachna kar......

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  3. हाथो पर कंगन नहीं दान को सुशोभित करो
    आंखों पे काजल नहीं ममता का भाव भरो।

    सुन्दर भावपूर्ण ,सहज कविता । बधाई।

    उत्तर देंहटाएं
  4. मुंह में दांत नही, पेट में आंत नही, फिल्मत देख कर बुढा कुछ ज्या्दा ही गरम हो गया हैं, इन जुमलो के साथ लतियाऐ गऐ बुढे की आंख से चश्मात व सायकल से सीट अलग हो कर बिखर गऐ थे, स्था नीय सिनेमा हाल के सामने घटी इस घटना कुछ लोगो ने बीच बचाव कर बुढे को बचाते हुऐ बुढे से लडकी को घूरने का कारण पुछा तो जानकर हैरानी हुर्इ की दरअसल बुढे को यह शक हो गया था कि टाकीज से नकाबपोश युवा जोडी में नवयुवती उसकी लडकी थी जो घर से स्कू ल के लिऐ निकली थी इससे पहले की बुढा कुछ कह पाता, लडका बुढे से घूरने का आरोप लगाते हुऐ उलझा पडा,, इसी तारतम्य में कुछ अतिसंवेदनशील सामाजिक मर्यादा के ठेकेदार किस्मक के प्राणीयो ने भी बुढे पर दो दो हाथ अजमा हुऐ पटक दिया,लडकी के साथ साथ् लडका भी मौके से गायब हो गया, इसलिऐ सच्चाकई तो पता नही चल पाई पर नकाब का खमियाजा बुढे बाप को मिल गया था,आपकी रचना सराहनीय हैं

    --


    Satish Kumar Chouhan
    Bhilai
    कभी फुरसत मिले तो क्लिक करे
    http://satishkumarchouhan.blogspot.com

    उत्तर देंहटाएं
  5. बेनामी7:19 pm

    Hello

    how r u. i read your poem (नारी तुम श्रृंगार करो) and it's really great and i liked it so sended it to all my friends. My hobby is also poetry but i don't have much time for it but you keep it up and i want to give you a suggestion that i would like you will write on this topic if it is possible -koi sikander nahi hota samay sikander hota ha it's my dream title of poem so please................

    Thanx a lot and keep it up and my best wishes is always witu u.



    Regards:-

    Praveen Singh Rathore
    MBA(AB) II year
    Institute of Agri Business Management,
    Bikaner
    Mail ID:-praveensinghrathore.iabm@gmail.com

    उत्तर देंहटाएं
  6. aap sabhi ka bahut bahut shukriya

    Satish Kumar ji meri is rachna par ....aapki yeh tippadi....

    baat kuch samajh nhi aayi...

    thanks again to all of u..

    उत्तर देंहटाएं
  7. Nice poem and inspirable. Thx for such creation

    उत्तर देंहटाएं
  8. karan patel5:23 pm

    ati uttam kavita ka varnan,aap ek bhot kavi banongi ekta ji.........

    उत्तर देंहटाएं
  9. dear Ekta ji,
    namaste and badhaaii,ek mukmmal kavta ke lie.plese leave the greed of outer rydm(tuk)and cocentrate on internal rydm. if u like please visit my site ''http//www.gpsharma.webnode.com''.
    bhav sunder hone chaahie shilp dhire-dhire aa hii jaataa hai.is sunder rachnaa k lie ek bar fir bdhaaii.
    Dr.Gunshekhar

    उत्तर देंहटाएं

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