रविवार, 28 नवंबर 2010

राजीव श्रीवास्तवा के चंद मुस्कुराते शेर

चंद मुस्कुराते- शेर !

बेदर्द जमाने में कोई अपने मिल जाते हैं ,

ढूँदने से राख में अँगारे निकल आते हैं !

 

प्यार में पल-दो पल में इकरार नही होता ,

जो पल में हो जाता है वो प्यार नही होता !

 

बस यही सोच कर हम हर गम पिए जाते हैं ,

की आप की महफ़िल में मेरे शेर पढ़े जाते हैं !

 

जाम का नशा तो पल दो पल में उतर जाएगा ,

जिसे हुस्न का नशा होगा वो आशिक कहाँ जाएगा !

 

सूखे हुए फूलों से घर नहीं सजता, रेत के टीलों से महल नहीं बनता ,

जिन रिश्तों में वफ़ाई नहीं होती, उन रिश्तों से प्यार का आशियाँ नहीं बनता !

 

महफ़िल ख़त्म हो जाती है, मेहमान घर चले जाते हैं ,

उस शाम को याद करने को, बस छलके जाम रह जाते हैं !

 

दोस्त तो कई मिलते है, कुछ जिंदगी का हिस्सा बन जाते हैं

फूल भी कई खिलते है, कुछ खुशनसीब ही किताबो में जगह पाते हैं !

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