गुरुवार, 4 नवंबर 2010

प्रभुद‌याल‌ श्रीवास्तव‌ की बुंदेली कविता–कुर्ता पे चूं रई है लार, पान खा रओ सैंयाँ लंबरदार

कुर्ता पे चूं रई है लार
पान खा रओ सैंयाँ लंबरदार
अरे कुर्ता पे चूं रई है लार
लार लार लार लार लार......


अरे कुर्ता पे चूं रई है लार
कुर्ता धुवाकें कलफ कर कें दओतो
मेलो ने करिओ जो बेर बेर कओ तो
पे कच्छू निकरो ने सार..
कुर्ता पे..............|

 
पानों की गिनती ने जरदा की गिनती
घर वारे करत फिरें हाथ् जोड़ बिनती
इत्ते जादा ने खाओ सरकार..
कुर्ता पे...............|

 
बड़ीं बड़ीं बैठीं हैं बिटिंयाँ ब्याबे
लगे रहत दद्दा बौ कब सेँ समझाबे
के के कें सबरे गये हार..
कुर्ता पे................|

 
गेहूं भी नैयाँ और चांउर भी नैयाँ
मैं भी थक गई हूं पर पर तोरे पैंयाँ
ले आओ कहूँ सें उधार...
कुर्ता पे ................|

 
पान खाये सें पेट ने भ्रर हे
गुटखा चबाबे सें घर ने सुधर है
अपनईं पर जेहो बीमार...
कुर्ता पे..................|

 

खाबे की चिंता ने पीबे की चिंता
तुमपे हँस रई है मुलक भर की जनता
अब तो सरम कर लो यार...
कुर्ता पे चूं रई है लार.... |.

2 blogger-facebook:

  1. पानों की गिनती ने जरदा की गिनती
    घर वारे करत फिरें हाथ् जोड़ बिनती
    इत्ते जादा ने खाओ सरकार..
    कुर्ता पे...............|

    waah !...gajab ki prastuti !

    .

    उत्तर देंहटाएं
  2. बेनामी12:21 pm

    डा. दिव्या श्रीवास्तव
    बुंदेलखंड लोक में बसा है|यहाँ की धरती लोक नृत्य करती है लोक गीत गाती है और लोक परंपराओं में

    जीती है|आर्थिक अभावों में जीता हुआ भी यहाँ का लोक मानस गाते नाचते हुये अपने आप में आनंदित‌
    होता रहता है|आपने लोक गीत की सराहना की है इसके लिये धन्यवाद|


    प्रभुदयाल श्रीवास्तव‌

    उत्तर देंहटाएं

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