मंगलवार, 23 नवंबर 2010

संजय दानी की ग़ज़लें

।वंश का हल खींचते हैं।


शौक के बादल घने हैं
दिल के ज़र्रे अनमने हैं।


दीन का तालाब उथला
ज़ुल्म के दरिया चढ़े हैं।


अब मुहब्बत की गली में
घर,हवस के बन रहे हैं।


मुल्क ख़तरों से घिरा है
क़ौमी छाते तन चुके हैं।


बेवफ़ाई खेल उनका
हम वफ़ा के झुनझुने हैं।


ख़ौफ़ बारिश का किसे है
शहर वाले बेवड़े हैं।


चार बातें क्या की उनसे
लोग क्या क्या सोचते हैं।


हम ग़रीबों की नदी हैं
वो अमीरों के घड़े हैं।


लहरों पे सुख की ज़ीनत
ग़म किनारों पे खड़े हैं।


रोल जग में" दानी" का क्या
वंश का रथ खींचते हैं।

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(2)

जागे से दिल के अरमान हैं
इश्क़ का सर पे सामान है।


कुछ दिखाई नहीं देता अब
सोच की गलियां सुनसान हैं।


दुश्मनी हो गई नींद से
आंखों के पट परेशान हैं।


मेरी तनहाई की तू ख़ुदा
महफ़िले ग़म की तू जान है।


काम में मन नहीं लगता कुछ
बेबसी ही निगहबान है।


मुझको दरवेशी का धन दिया
तू फ़कीरों की भगवान है।


दर हवस के खुले रह गये
बंद तहज़ीब की खान है।


सब्र मेरा चराग़ों सा है
वो हवस की ही तूफ़ान है।


ज़र ज़मीं जाह क्या चीज़ है
प्यार में जान कुरबान है।


दिल की छत पे वो फ़िर बैठी है
मन का मंदिर बियाबान है।


दानी को बेवफ़ाई अजीज़
इल्म ये सबसे आसान है।

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