राकेश शर्मा की कविता - थम जाऊं देख पहाड़ अगर फिर कैसी राह, फिर क्या है डगर

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इतनी भी दीनता ठीक नहीं

जीवन उपहार है भीख नहीं

बस यही राह है चलने की

ऐसी ही तो कोई लीक नहीं

इतनी भी......(1)

 

थम जाऊं देख पहाड़ अगर

फिर कैसी राह, फिर क्या है डगर

किंतु-परंतु, शायद और यदि

बस यही गलतियों की सीख नहीं

इतनी भी......(2)

 

निज स्वार्थ जहां देखा मन ने

गौरव ने घुटने टेक दिए

बिक गया जमीर इंसां का यहां

पर अंतर की कोई चीख नहीं

इतनी भी.....(3)

 

मुट्ठी भर सांसों की थाती

निजता परता में बिखर गई

धन पे जिए धन पर ही मरे

पर क्षण भर रुकने की दीक नहीं

इतनी भी.....(4)

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डॉ. राकेश शर्मा

हिंदी अधिकारी

राष्ट्रीय समुद्र विज्ञान संस्थान

दोना पावला, गोवा

इ-मेल rksh99@gmail.com

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4 टिप्पणियाँ "राकेश शर्मा की कविता - थम जाऊं देख पहाड़ अगर फिर कैसी राह, फिर क्या है डगर"

  1. किन्तु परन्तु, शायद ,यदि,बस यही ग़ल्तियों की सीख नही।
    बहुत सुन्दर भावपूर्ण कविता , बधाई।

    उत्तर देंहटाएं
  2. सुंदर प्रस्तुति राकेश शर्मा जी| हमारे ब्लॉग पर भी पधारिएगा http://thalebaithe.blogspot.com

    उत्तर देंहटाएं

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