सोमवार, 29 नवंबर 2010

शशांक मिश्र ‘‘भारती'' की गजलें

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एकः-

विश्‍वास रूपी दीपक जो जलाते रहें,

मंजिल की समीपता आप पाते रहें।

 

गीत विश्‍वासों के निःस्‍वर होते नहीं,

सुबह के प्रिय दृश्‍य आप गाते रहें।

 

हृदय की कुण्‍ठा का पास आना क्‍या,

सत्‍य पर निष्‍ठा जब तक बनाये रहें।

 

तृष्‍णा के बढ़ने से होता भी क्‍या है,

सिन्‍धु सच का जब तक लहराता रहे।

 

छोड़ सभी मनोविकारों को अपने,

राग विश्‍वासों के यूं ही गाते रहे॥

 

दोः-

------

गैर जो कभी थे वे अपने लगे हैं,

बिछुड़े हुए साथी भी मिलने लगे हैं।

 

जैसा कि कुछ किसी से मैंने न चाहा,

वह दोष अपने बताने लगे हैं।

 

उनके तरफ की जो अड़चने हैं,

मित्रों में भेदभाव मिटने लगे हैं।

 

गैर जो कभी थे यहां तक आ गए,

खुशियों के सपने संजने लगे हैं।

 

दुश्‍मनी भुलाने का मौका जो देखा,

कई लोग मौके पर बढ़ने लगे हैं।

 

बढ़ते कदमों को इनके जो देखा,

स्‍वजन भी मन में हंसने लगे हैं।

 

आने के वायदे किये जिसने भारती',

दोस्‍ती के रिश्ते भी फलने लगे हैं॥

--

शशांक मिश्र ‘‘भारती''

दुबौला-रामेश्‍वर

पिथौरागढ़

3 blogger-facebook:

  1. ख़यालात अच्छे हैं, संयोजन पक्छ को और मजबूत करने से गज़ल ख़ूबसूरती का अहसास करायेगी।

    उत्तर देंहटाएं
  2. विश्‍वास रूपी दीपक जो जलाते रहें,
    मंजिल की समीपता आप पाते रहें।
    वाह!
    सुन्दर गज़लें!

    उत्तर देंहटाएं
  3. हर एक शब्द बोलता हुआ, लाजवाब.. कटु सत्य..

    उत्तर देंहटाएं

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