मंगलवार, 23 नवंबर 2010

विजय वर्मा की ग़ज़लें

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ग़ज़ल [काश्मीरी-भाइयों के नाम]

बीते हुए दिन हम पर आज भी भारी है

गल्तियाँ कुछ तुम्हारी कुछ हमारी है.

 

संवाद के सारे रास्ते खोल के रखना

यही राह जायज़ है चाहे जो दुश्वारी है.

 

उस कश्ती का डूबना तय है दोस्तों

जिसका नाविक अनाड़ी, दुगुनी सवारी है.

 

कल जिस बस्ती में जलसे ही जलसे थे

किसकी नज़र लगी, आहो-बुका जारी है.

 

ग़ुरबतकदे में किस कंधे पे सर रख के रोये

यहाँ  खुद के कंधे पर सर रखना भारी है

 

इस माहौल में भला अपनी बात क्या रखें.

यहाँ हर एक एक चेहरे पर हैबत तारी है

 

दिलों की सरहदें आखिर मिटे भी तो कैसे

बेमन की कोशिश, ये कोशिशे सरकारी है..

.

कहते क्यूँ  नहीं  ?
दोस्त हो तो दोस्त जैसे लगते क्यूँ नहीं ?

दिल में कुछ फांस है, कहते क्यूँ नहीं?

 

तेरे हाथों में जो फूल है, कागज़ के है,

पूछते हो मुझसे ये महकते क्यूँ नहीं?

 

वही मै हूँ,वही गली है , वही फिज़ा भी है,

तेरे सूर्ख होंठ पहले -से दहकते क्यों नहीं?

 

प्यार एक चुभन है, दर्द है,अहसास है,

बयां क्या करना, इसे सहते क्यों,नहीं?

 

अभी ग़म -समंदर बहुत दूर तक बाकी है,

किनारा क्या ढूँढना, अभी बहते क्यूँ नहीं?

--
v k verma,sr.chemist,D.V.C.,btps
vijayvermavijay560@gmail.com

3 blogger-facebook:

  1. कल जिस बस्ती में जलसे ही जलसे थे
    किसकी नज़र लगी, आहो-बुका जारी है.
    सच्चाई को वयां करती रचना , बधाई

    उत्तर देंहटाएं
  2. हमारी यही हैं कि टैक्स देकर पाल रहे हैं गिलानी जैसों को और हिन्दुओं को कटवा रहे हैं कश्मीर में...

    उत्तर देंहटाएं
  3. भारतीय नागरिक - Indian Citizen Sahab.


    हमारी और भी कुछ ग़लतियाँ रही है,याद कीजिये जब
    श्रीमती इंदिरा गाँधी ने एक चुनी हुई लोकतान्त्रिक सरकार
    को बर्खास्त कर के जी .एम् शाह को गद्दी सी. एम्. की
    गद्दी पर बैठा दिया था और उन्होंने भारत-विरोधी मानसिकता वाले
    लोगों को प्रशासन में घुसा दिया
    या जब कोई कश्मीर पर्यटन के लिए जाते थे तो वंहा के लोग पूछते थे कि
    क्या आप इंडिया से आये है ---.--
    लोग भारत से दूर हो रहे थे सरकार निष्क्रिय बैठी थी.
    ऐसे हालत शुरू से नहीं थे.

    उत्तर देंहटाएं

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