बुधवार, 3 नवंबर 2010

सतीश चन्द्र श्रीवास्तव की कविताएँ

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सत्य बोलने की सज़ा

कब तक आखिर कब तक

सहनी पड़ेगी

सत्य बोलने की सज़ा

मुझे याद है, पहली बार

जब मैंने सत्य बोला था

कि / मेरे पास कुछ हो या न हो

पर दो हाथ तो है

पर उसकी सज़ा यह मिली

कि / काट लिये गए

मेरे दोनों हाथ !

इतने पर भी आक्रोश नही रूका

मैंने यह भी कहा

कि मेरे पास दो आँखें भी है

जो लगातार तुम्हारे षडयंत्रों को

भेद रही है

पर नहीं मालूम था

कि आक्रोश के बदले

खोना होगा दो आँखें भी

मैंने सोच लिया था

कि कुछ नहीं कहूँगा

न आदि , न अन्त ,न भला न बुरा

पर न जाने उन्हें कैसे मालूम पड़ गया

कि मेरे पास एक अदद मस्तिष्क भी है

अब उनकी कोशिशें

जारी है लगातार

मेरे मस्तिष्क को नकारा कर देने की।

 

जिन्दगी जो कुछ देती है सुबह

जिन्दगी जो कुछ देती है सुबह ,

रात होते होते ले लेती है वापस।

न रह पाते हैं विचार,

न ही रह पाता है आकार

बिगड़ जाता रूप

ग़ुम हो जाता है नाम

चटकने लगते सम्बंध

पुरानी पड़ने लगती है देहगंध

रह जाता है एक खालीपन बस।

 

परास्त करने का प्रपंच

मैं जानता हूँ कि

मेरा कवच और कुण्डल

छीन लिया गया है

फिर भी मुझे युद्ध में जाना होगा

अपने वचन को पूरा कर दिखाना होगा

अर्जुन को मारने का आक्रोश

अब अमोघ शक्ति से जुड़ गया

पर मुझे फिर छला गया

मुझे परास्त करने का प्रपंच रचा गया

अर्जुन के लिए एक घटोत्कच रचा गया

मैं फिर छला गया

और चला गया

वह अमोघ शक्ति

अनियति के सिर पर

अर्जुन का अट्टहास

अब भी कानों मे गूंजता है।

 

दर्द की परिभाषा

तुम अपने पराये के भेद को जानते हो

फिर भी बताते हो

कि तुम दर्द की परिभाषा जानते हो

जब कि दर्द अपना और पराया नहीं होता

दर्द सिर्फ दर्द होता है

वह स्थूल नहीं सूक्ष्म होता है

भाव और अनुभूति में होता है

दर्द की तुम्हारी व्याख्या

महज शब्द तक की है

शब्दों की चाशनी बना कर

चाशनी का शर्बत बनाकर

तुम दर्द की अभिव्यक्ति करते हो

जब कि दर्द स्वयं समर्थ है

न अभिव्यक्ति है न अर्थ है

सीने की दरख्त से

ज्वालामुखी की तरह

जो फूट कर बह निकलता है

दर्द होता है

तुम्हारा दर्द अपना है

पराया एक सपना है

वर्गवादी होकर भी , कहते हो

कि दर्द की परिभाषा जानते हो

जब कि दर्द अपना पराया नहीं होता

दर्द सिर्फ दर्द होता है।

 

दंश का दर्द

सर्प की तरह

तुम एक दिन निकल आए थे

और मैं तुम्हें दूध का प्याला

देकर चला गया था

क्योंकि उस दिन नाग पंचमी थी

पर मैं नहीं जानता था कि

दूध की लालच में

तुम रोज मेरे सामने

फन काढ़ कर बैठ जाओगे

और दूध की फरमाईश करोगे

दूध के अभाव में

तुम रोज मुझे दंश कर चले जाते हो

मीरा की भक्ति, शिव का त्याग

सड़क के किनारे खड़े

याचक की तरह

अस्तित्वहीन सा हो जाता है

जब तुम स्वार्थ पर उतर आते हो

किन्तु सावधान

तेरे दंश से अब मैं विषैला हो उठा हूँ

किसी दिन -झपटूंगा तुम पर

तब तुम चखोगे

दंश का अंश

तब तुम समझ सकोगे

दंश का दर्द।

 

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प्रतीक्षा की अनुभूति

तुम्हारी आदत है अपने अनुसार

सबको ढालने की

जैसे साँचे का पत्थर

किसी पदार्थ को ढाल लेता है

तुम्हारे गिरने का अंदाज़ बेआवाज़ है

तभी तो तुम

दूसरों को गिरते देख

उसे सम्भालने के बजाय

कहकहे लगाते हो।

तुम्हारी व्यस्तता यह प्रकट कर जाती है

कि आज सब कुछ व्यस्त सा है

और जब तुम होते हो खाली

तब तुम्हें होने लगती है

प्रतीक्षा की अनुभूति।

 

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कैसे कहूँ मैं

कैसे कहूँ मैं

राजनीति करने वाले

मज़दूरों को भोगने के लिए

मज़दूरों से जुड़ने की

सुविधा ढ़ूढँ रहे हैं

कैसे कहूँ मैं

उस विकलाँग सभ्यता के

गर्भ की दास्तान

जो देगी एक लिजलिजी सन्तान

कीड़ों की तरह जीने , और मरने की तरह।

कैसे कहूँ मैं

औज़ार बनते उस आदमी की कहानी

जो पैदा होते ही काट रही अपनी नस्ल

अपने बौनेपन के बावजूद

आदमी ने नाप ली एक पाँव से वासना

एक से हिंसा और आधे से स्वार्थ।

 

अविश्वास का बीज

अविश्वास का बीज

अपनी बंजर सोच पर छोड़ कर

जब हम गा रहे थे खुशी के गीत

किसी ने घृणा से उसे सींच कर

आतंक का वृक्ष बना दिया।

घर हमारे जैसे बन गए हो किले

देखते ही देखते मन्दिर की चोटियाँ

मस्जिद के गुम्बद, गुरुद्धारों की मीनारें

नरमुण्डों से सज गयी।

व्यर्थ हवा में उठते हैं हाथ

अपने ही खेतों में लगा के आग

ख़ुद अपनी ही गर्दन कलम करके

गाने लगे फागुनी गीत

बेजान पत्थर और इस्पात में ढ़ली गोलियाँ

अगर बोल सकती तो पूछती

क्या गुनाह था उनका

क्यों उन्हें बेवजह जाना पड़ा

किसी के सीने में

और अपने माथे पर लगाना पड़ा

आदमी के खून का कलंक !

 

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जिन्दगी की आस

जिन्दगी की आस थी,

जिन्दगी के बाद भी।

जिन्दगी की आस में,

जिन्दगी गुज़र गयी।

वक़्त ने कहा बहुत,

वक़्त ने सुना बहुत,

वक़्त की कहा सुनी में,

ज़िन्दगी गुज़र गयी।

सच था कोई

और था ग़लत कोई,

सच झूठ के द्वंद में ,

जिन्दगी गुज़र गयी।

जिन्दगी की राह में

फासले हज़ार थे,

काटने में ये फसल

जिन्दगी गुज़र गयी।

 

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मैं एक पल का होना नहीं चाहता

मैं जिन्दगी के एक मुकाम पर

ठहरना चाहता हूँ

क्योंकि पीछे मुड़ कर

देखना नहीं चाहता हूँ

हर पल को जीने की

ललक है मुझमें

मैं किसी एक पल का

होना नहीं चाहता हूँ

कुछ फर्क़ नहीं

दूसरे क्या सोचते हैं

मैं अपनी जिन्दगी

आप सोचना चाहता हूँ

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3 blogger-facebook:

  1. एक से बड़ कर एक सुंदर कविताये बहुत बहुत बधाई

    उत्तर देंहटाएं
  2. अब उनकी कोशिश है मेरे मस्तिषक को नकारा करने की,

    सुन्दर अभिव्यक्ति। बधाई।

    उत्तर देंहटाएं
  3. धन्यवाद सभी को !

    उत्तर देंहटाएं

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