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23 नवंबर 2010

रामदीन की कविता–अर्ध सत्य

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अर्ध सत्‍य''

प्रजापति'

दीवाली की धुरी आप हो आप ही सिरजनहार

पारस जैसा पावन करते महिमा अपरम्‍पार।

 

पड़ी अपावन अनगढ़ मिट्‌टी देते तुम आकार

जैसे करते रोज धरा पर अहिल्‍या उद्‌धार।

 

मिट्‌टी को पावन करने में सुबह से हो गई शाम

साथ ही रही घरैतिन लेकिन काम न हुआ तमाम।

 

बहुत रही सकुचाय घरैतिन पैबन्‍द लगा है धोती में

अबकी किरपा करहु लक्ष्‍मी मिले बिलाउज धोती में।

 

सांझ भये घिर आये बदरा अब मुश्‍किल में जान,

मेघदेव की करते विनती फिर से हुआ विहान।

 

धीर, वीर, संयमी तुम्‍हीं तुम कितनी चाक चलाते हो

उस मेहनत के बदले में तुम तो कुछ ना पाते हो।

 

तुम सा शिल्‍पी निश दिन खोजूं लेकिन कहीं न पाऊं

संस्‍कृति और धैर्य के साधक तुमको शीश नवॉऊं।

 

दीवाली की धुरी आप हो आप ही सिरज़नहार

एक तुम्‍ही हो आज भी पावन तुम पर सब न्‍यौछार।

 

बनावटी नकली दीयों से है कलुषित है संसार,

असली एक तुम्‍ही निर्माता तुम हो रचनाकार।

 

दीवाली पर लेकिन फिर परिवार की पीड़ा सहते हो

औरों को दे देते अमृत नीलकंठ बन जाते हो।

 

करवा, दीपक, सुत्‍ती, गगरी लक्ष्‍मी और गणेश,

रचना करते इन सबकी हो पाकर कठिन कलेश।

 

आदि अनन्‍त काल के जब खंडहर खुदवाये जाते हैं

रचना आप की नीचे पाकर सबके सिर चकराते है।

 

दीवाली की धुरी आप हो आप ही सिरज़नहार

पारस जैसा पावन करते महिमा अपरम्‍पार।

---

रामदीन

जे-431, इन्‍द्रलोक कालोनी

कृष्‍णा नगर, कानपुर रेाड, लखनऊ।

1 टिप्पणी:

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